एक रिपोर्टर के ये तज़ुर्बे पत्रकारिता की धरोहर हैं


एबीपी न्यूज़ के वरिष्ठ संवाददाता (मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़) ब्रजेश राजपूत की किताब ऑफ द स्कीन  मीडिया पर एक और किताब भर नहीं है। वह एक अलग किताब है, ख़ास किताब है। वह एक ज़रूरी किताब भी है, क्योंकि ये हिंदी पत्रकारिता से जुड़ी किताबों के संसार मे मौजूद एक बड़ी कमी को एक हद तक पूरा करती है।
बड़ी-बड़ी घटनाओं के कवरेज पर बहुत सारी किताबें लिखी गई हैं और वे चर्चित भी रही हैं। उनका अपना महत्व भी होगा लेकिन एक रिपोर्टर कोई रिपोर्ट करते हुए किन हालात और कैसी मानसिक उलझनों से गुज़रता है इसका लेखा-जोखा देने वाली किताब कहीं नहीं है। कम से कम मेरी जानकारी में तो नहीं ही है।

ek riportar ke ye tazurbe patrakaarita kee dharohar hain

रिपोर्टिंग के जोखिम समझने के लिए उनके साथ घटी मंडला की घटना को लिया जा सकता है जहाँ वे पुलिस स्टेशन में भी सुरक्षित नहीं थे और किसी तरह से जान बचा पाए थे। ऐसा ही कुछ मंदसौर में किसान आंदोलन कवर करते हुआ जब वे खुद ख़बर बन गए थे। छतरपुर की चुनावी मुठभेड़ में फँसना या आँध्र में समुद्री तूफान हुदहुद के कवरेज के ख़तरे से बच निकलना इसकी कुछ और बानगियाँ हैं।

टीवी पत्रकारिता के अपने दुख-दर्द हैं, चुनौतियाँ हैं। वे आपके निजी एवं पारिवारिक जीवन को भी अस्त-व्यस्त बनाए रखते हैं। प्रिंट के मुक़ाबले यहाँ दौड़-भाग ज़्यादा होती है, क्योंकि टीवी का पेट बड़ा होता है, उसे चौबीस घंटे खाना चाहिए होता है। फिर टीवी बाज़ार की होड़ का अतिरिक्त दबाव तो होता ही है। कई बार मन मारकर भी वह सब करना होता है जो पत्रकार नहीं करना चाहता। होशंगाबाद के कुंजीलाल की नौटंकी का कवरेज इसकी मिसाल है।

ऑफ द स्क्रीन में ब्रजेश राजपूत के 75 संस्मरणों के आईने में ये तमाम चीज़ें देखी जा सकती हैं। वे बगैर कोई रोना रोए ईमानदारी के साथ बताते जाते हैं कि टीवी न्यूज़ के बाज़ार में एक पत्रकार की दिनचर्या कैसी होती है और वह उसे किस तरह निभाता है। कई बार दफ़्तर बहुत निर्मम हो जाता है। उसे मतलब नहीं कि आप किस हाल में हैं या आपकी पारिवारिक ज़रूरियात भी कुछ हो सकती हैं। उसे जो चाहिए वह उसमें कोई छूट नहीं दे सकता क्योंकि उसे प्रतिद्वंद्वियों से आगे निकलना है।

ब्रजेश के संस्मरण खुद को महिमामंडित करने वाले नहीं हैं जो कि अधिकांश पत्रकार लेखकों का बड़ा दुर्गुण होता है। नेताओं और अफसरों से अपने संबंधों को बखानना संवाददताओं की आदत होती है, मगर इस बीमारी का प्रदर्शन उन्होंने नहीं किया है। उन्होंने अपने पैर ज़मीन पर ही रहने दिए हैं और बहुत ही सहज भाव से खुद को व्यक्त किया है। रिपोर्टिंग में बहुत सारे बड़े काम संयोगवश हो जाते हैं, मगर रिपोर्टर उसका श्रेय अपने खाते में डालना चाहते हैं। ब्रजेश ने ऐसा बिल्कुल भी नहीं किया है।

ब्रजेश की भाषा बहुत सजीव और दृश्यात्मक है टीवी की भाषा की तरह। संस्मरण पढ़ते वक़्त आप उन्हें घटते हुए देखते हैं। वे एक टीवी स्टोरी का आनंद देते हैं। कई जगह उन्होंने व्यंग्यात्मक शैली का सहारा भी लिया है। मसलन एक संस्मरण है-तुम यहाँ हो और वहाँ चप्पल चल गई। इसमें उन्होंने बताया है कि कैसे उन्हें बिना घटनास्थल पर गए आंखों देखा हाल बताना पड़ा, हालाँकि वह सही ही साबित हुआ।




उन्होंने भाषा और शैली दोनों में ही सरलता बनाए रखी है। ऐसे में अगर कोई उनमें बौद्धिकता ढूँढ़ेगा तो उसे निराशा होगी। ये संस्मरण उसके लिए हैं ही नहीं।

इन संस्मरणों में रिपोर्टर की ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव देखने को मिलते हैं। उनमें छोटी सी गुड़िया की ज़िदगी बचने पर खुशी देने वाले क्षण हैं तो अंतर्द्वंद्व और विवशताएं भी। मसलन, बहुत सारी ऐसी कहानियाँ जिन्हें वे करना चाहते होंगे नहीं करने दी गई होंगी और बहुत सारी ऐसी ख़बरें मन मारकर की होंगी जो वे करना नहीं चाहते थे। अच्छी बात ये है कि ब्रजेश ने ये बात छिपाई नहीं है। उनका असंतोष झलक जाता है, बेशक़ वह गुस्से के रूप में प्रकट नहीं होता, क्योंकि वे बाज़ार के डायनामिक्स को समझते हैं और जानते है कि उसी के दायरे में रहकर काम करना है।

ब्रजेश मेरे पुराने मित्र हैं और साथ में काम भी किया है। उनसे लगातार बातें होती रहती हैं, उनके काम के बारे में भी। वे जब कभी भी कोई अनुभव सुनाते थे, तो मैं उनसे कहता था इसे लिख डालो। संभव है कि और लोगों ने भी उनसे ऐसा कहा हो और ये उनकी अंत: प्रेरणा का परिणाम भी हो कि वे निरंतर लिख रहे हैं। उनकी पिछली किताब भी चर्चा में रही थी। वह चुनाव रिपोर्टिंग पर थी।

वर्षों पहले राजेंद्र यादव ने हंस का मीडिया विशेषांक निकालकर बहुत सारे पत्रकारों को लिखने के लिए उकसाया था। उसके बाद कुछ कथाकार बन गए, कुछ स्तंभ लिखने लगे और बहुत से लोग मीडिया पर टीका-टिप्पणी में सिद्धहस्त हो गए। पत्रकारों का लेखन में इस तरह सक्रिय होना अच्छा ट्रेंड है।

ब्रजेश राजपूत ने ये संस्मरण लिखकर एक नई शुरूआत कर दी है। इससे प्रेरणा लेकर और भी पत्रकार यदि लिखना शुरू करेंगे तो पत्रकारिता और पत्रकारों के ऐसे बहुत सारे सच सामने आएंगे जिनसे लोग या तो वाकिफ़ नहीं है या फिर बहुत कम वाकिफ़ हैं। उम्मीद तो ये भी की जानी चाहिए कि जल्द ही उनके संस्मरणों का दूसरा हिस्सा भी आएगा।

एक रिपोर्टर के ये तज़ुर्बे पत्रकारिता की धरोहर हैं
Written by-डॉ. मुकेश कुमार















अन्य पोस्ट :
केवल चार साल में लोकतंत्र कैसे बन गया भीड़तंत्र?
काँग्रेस को हिंदू विरोधी और मुस्लिमपरस्त पार्टी घोषित करने की रणनीति है ये
कृपया सड़े आम उसी टोकरी में ही रहने दें, लार न टपकाएं
     तवलीन सिंह मोदी-राज से इतनी दुखी और हताश क्यों हैं?
    Why Tavleen Singh is so sad and desperate from the Modi-Raj?
     दिल्ली में दिखने वाली बर्बरता की ये हैं वज़हें

Share on Google Plus

0 comments:

Post a comment