केवल चार साल में लोकतंत्र कैसे बन गया भीड़तंत्र?


सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी महत्वपूर्ण है। अव्वल तो वह हवा-हाई नहीं है, बल्कि ठोस तथ्यों पर आधारित है। आखिरकार देश की सर्वोच्च अदालत बिला वजह इस तरह की टिप्णी तो करने से रही। वास्तव में उसका आकलन न केवल देश की वर्तमान अवस्था के बारे में बताता है, बल्कि मौजूदा सरकार को कठघरे में भी खड़ा करता है, उसे एक तरह से दोषी करार देती है।

बेशक़ सरकार इससे टस से मस होती नहीं दिख रही। ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को वह ज़्यादा महत्व नहीं देना चाहती। इसीलिए वह न तो चिंतित दिखलाई दे रही है और न ही उसमें कोई हरकत नज़र आ रही है।
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मॉब लिंचिंग में सत्ताईस से ज़्यादा मौतों के बाद भी उसने अभी तक कोई ठोस क़दम नहीं उठाए हैं। इसके उलट उसके मंत्री और नेता वारदातों को जायज़ ठहराने से बाज नहीं आ रहे। एक केंद्रीय मंत्री ने तो बाकायदा लिंचिंग मे शामिल लोगों को सम्मानित भी कर डाला।




दरअसल, सरकार माँब लिंचिंग के मामले में खामोश इसलिए है कि ज़्यादातर वारदातों में उसी के लोग शामिल हैं। ख़ास तौर पर गौरक्षा के नाम पर की जाने वाली लिंचिंग में तो शत-प्रतिशत कट्टर हिंदूवादी ही शामिल रहे हैं।
इसके अलावा विरोधी विचार रखने वालों को निशाना बनाने वालों में भी वही लोग हैं।

झारखंड मे स्वामी अग्निवेश पर दिन दहाड़े हमला इसका ताज़ातरीन उदाहरण है। शशि थरूर के दफ़्तर में तोड़-फोड़ करने वाले और बहुतों को जान से मार देने की धमकी वाले भी और कोई नहीं बल्कि हिंदुत्ववादी ही हैं।
माँब लिंचिंग की सबसे अधिक वारदातें भी बीजेपी के शासन वाले राज्यो में ही हुई हैं। उत्तरप्रदेश, झारखंड और राजस्थान इसमें अव्वल रहे हैं। महाराष्ट्र, त्रिपुरा और असम भी उनसे मुक़ाबला करते नज़र आ रहे हैं।




दुख की बात ये है कि जनता में भी उसे लेकर बहुत चिंता और सक्रियता नहीं दिखलाई दे रही। क्या ये माना जाए कि वह माँब लिंचिंग को सही मान रही है? या फिर उसमें बेबसी इतनी पैठ गई है कि वह विरोध करने के लिए भी तैयार नहीं है।

इससे पता चलता है कि जनमानस किस हद तक संवेदनहीन बना दिया गया है, क्योंकि जब इतने बर्बर तरीके से हत्याएं हो रही हों और वह चुपचाप देखती रहे तो ये मानना चाहिए कि इस समाज की अंतरात्मा भी मर गई है।

ये स्थिति बताती है कि हम कहाँ पहुँच गए हैं और ये हुआ पिछले चार सालों में। ऐसा नहीं है कि 2014 के पहले मॉब लिंचिंग नहीं होती थी। होती थी मगर उन्हें समाज और सरकार का समर्थन एवं संरक्षण नहीं मिलता था।
यही वजह है कि लोग अब कहने लगे हैं कि हिंदुस्तान अब लिंचिस्तान बन गया है। और ये धारणा केवल देश के भीतर ही नहीं बन रही, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी देश की छवि बिगड़ चुकी है। पर्यटक अब भारत आने के बारे में दस बार सोचने लगे हैं।




डर इस बात का है कि अगर सरकार का यही रवैया रहा तो आने वाले दिनों में भीड़तंत्र देश को अराजकता की ओर न ले जाए। अगर ऐसा हुआ तो मार-काट बढ़ सकती है और देश गृहयुद्ध की चपेट मे आ सकता है। अगर ऐसा हुआ तो हमने पिछले पैंसठ साल में अर्जित किया है वह पाँच साल में गँवा देंगे।

केवल चार साल में लोकतंत्र कैसे बन गया भीड़तंत्र?

Written by-डॉ. मुकेश कुमार















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