तवलीन सिंह मोदी-राज से इतनी दुखी और हताश क्यों हैं?


अभी साल भर पहले तक पत्रकार तवलीन सिंह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की कट्टर समर्थक हुआ करती थीं। इतनी पक्की समर्थक कि उन्हें महाभक्तिन कहा जा सकता था। इंडियन एक्सप्रेस में छपने वाले अपने स्तंभ में वे हर हफ़्ते उनकी तारीफ़ में कसीदे काढ़ती थीं।

अगर किसी ने कहीं मोदी की आलोचना की होती थी तो वे अपने स्तंभ के ज़रिए जवाब देती थीं। विपक्षी दलों और उनके नेताओं के ख़िलाफ़ तो वे ज़हरबुझी क़लम का इस्तेमाल करती थीं। ख़ास तौर पर काँग्रेस के प्रति उनका रवैया तो और भी दुराग्रहपूर्ण हुआ करता था। गाँधी परिवार को लाँछित-अपमानित करना मानो उनके नित्यकर्म का हिस्सा था।
मोदी-राज से तवेलीन सिंह इतने दुखी और हताश क्यों हैं?


यही वजह थी कि तवलीन सिंह का लिखा लोगों ने पढ़ना बंद कर दिया था। उनके पाठकों की संख्या में इज़ाफ़ा हुआ होगा तो भक्तगणों का। उन्हें इसमें भरपूर भक्ति-रस मिलता था। अपने परमप्रिय देवाधिदेव की वंदना करने का सुख प्राप्त होता था।




लेकिन अब उनके सुर बदले हुए हैं। पिछले छह महीनों के उनके स्तंभों को पढ़ लीजिए, आपको समझ में आ जाएगा कि वे किस कदर दुखी हैं। वे बुरी तरह से हताश हैं और अब यहाँ तक लिखने लगी हैं कि सन् 2019 में बीजेपी का हारना तय है। वे उन्हें संदेह का लाभ भी नहीं देतीं और ये भी नहीं सोचतीं कि अभी साल भर का वक़्त है जिसमें मोदी कुछ ऐसा कर सकते हैं जिससे सूरत-ए-हाल उनके पक्ष में हो जाएगी।

आख़िर क्या वज़ह है कि तवलीन इस बुरी तरह हताश हो गई हैं कि उन्हें अपने प्रिय नेता के लिए कोई उम्मीद ही नहीं दिख रही? अपने इस हफ़्ते के स्तंभ में उन्होंने ये क्यों लिखा कि समाजवादियों का पुराना शासन लौटता दिख रहा है?

दरअसल, तवलीन सिंह मोदी की समर्थक इसलिए बनी थीं कि उन्हें लग रहा था कि मोदी देश को पूरी तरह से बाज़ारवादी ताक़तों के हवाले कर देंगे। उन्हें भरोसा था कि चुनाव पूर्व जिस तरह मोदी पूँजीपतियों और बड़े उद्योगपतियों के साथ खड़े थे, चुनाव बाद तो उनके दिखाए रास्ते पर चल पड़ेंगे।




मोदी उस राह पर चले भी और चल भी रहे हैं। मिनिमम गवर्नमेंट एंड मैक्सिमम गवर्नेंस नारे का मतलब ही यही था।  लेकिन उनकी निराशा का कारण ये है कि वे बहुत धीमी रफ़्तार से चल रहे हैं औरइस दिसा में उन्होंनने बहुत कम काम किया है। दूसरे, चुने हुए कारोबारियों और उद्योगपतियों को ही रियायतें दीं हैं।

पहले उन्होंने नोटबंदी और जीएसटी का बढ़-चढ़कर समर्थन किया था, मगर अब उन्हें पता चल रहा है कि मोदी के इन तुगलकी फरमानो ने छोटे व्यापारियों की कमर तोड़ दी है और फिर से इंस्पेक्टर राज की वापसी कर दी है। इन फ़ैसलों की वज़र से अर्थव्यवस्था मंदी की गर्त में चली गई है।

तवलीन की निराशा की दूसरी वज़ह ये है कि मोदी सरकार हिंदुत्ववादियों की हिंसक गतिविधियों पर रोक लगाने में नाक़ाम रही है। पहले वे धर्मनिरपेक्षता का मज़ाक उड़ाते हुए बीजेपी का समर्थन करती थीं, उसकी ढाल बन जाती थीं। लेकिन हिंदुत्ववादियों ने जिस तरह से उत्पात मचा रखा है, उससे उनका विश्वास हिल गया है।
शुरू में उन्होंने मोदी से अपील की कि वे इन तत्वों पर रोक लगाएं नहीं तो उनका परिवर्तन एवं विकास का एजेंडा पटरी से उतर जाएगा। लेकिन बाद में उन्हें ये एहसास हो गया होगा कि वे तो ऐसा करने के बजाय परोक्ष रूप से बढावा देने में ही लगे हैं।




वे जिस आर्थिक वर्ग से आती हैं, वह बाज़ारवादी आर्थिक तरक्की चाहता है, मगर नस्लवादी नफ़रत और हिंसा को नापसंद करता है।  लिहाज़ा, उनका सोच उनके लेखन में भी प्रकट होता है।

तो लब्बोलुआब ये निकला कि तवलीन सिंह का पूरी तरह से मोहभंग हो चुका है। इस तरह का मोहभंग उनकी तरह के और भी लोगों का हुआ है और होता जा रहा है। मतदाताओं में तो ये और भी तेज़ी से हुआ है। ऐसे में कोई हैरत नहीं यदि तवलीन सिंह कि आशंका या भविष्यववाणी सच साबित हो जाए।

तवलीन सिंह मोदी-राज से इतनी दुखी और हताश क्यों हैं?
Why Tavleen Singh is so sad and desperate from the Modi-Raj?

Written by-डॉ. मुकेश कुमार















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