पत्रकार जी, अपनी राष्ट्रभक्ति सिद्ध कीजिए!


अजब आलम है। कुछ पत्रकार हैं जो ताल ठोंककर कह रहे हैं कि वे राष्ट्रवादी हैं। उन्हें उठते-बैठते राष्ट्रवाद के सिवा कुछ सूझ ही नहीं रहा। मानो अफीम की पिनक में हैं इसलिए हर समय राष्ट्रवाद-राष्ट्रवाद बड़बड़ाते रहते हैं। कभी अनाप-शनाप भी बकने लगते हैं। उन्माद जब बढ़ जाता है तो असंसदीय और ग़ैर कानूनी भी हो जाते हैं, लड़ने-लड़ाने और मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं। अख़बार के पन्नों और स्टूडियो को जंग का मैदान बना देते हैं।

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कुछ पत्रकारों पर तो राष्ट्रवाद का ऐसा भूत सवार है कि वे डंडा लेकर दूसरों के पीछे पड़े गए हैं।पूछते रहते हैं कि बताओ राष्ट्रवादी हो या नहीं। भले ही पत्रकारिता के नाम पर दलाली करते रहे हों, जेल आना-जाना होता रहता हो मगर खुद को सबसे बड़ा देशभक्त बताते हैं। शायद राष्ट्वाद के साबुन से अपना मैल छुड़ाकर चमकदार दिखना चाहते हों। ये नए मुल्ले ऐसे हैं कि कोई ज़रा सा असहमत हुआ नहीं कि उसकी वहीं अग्नि परीक्षा शुरू कर देते हैं। ज़बरन भारत माता की जय बुलवाने लगते हैं। गाय की महिमा गाने लगते हैं। पाकिस्तान और कश्मीरियों को गरियाने लगते हैं। मंद बुद्धियों के लिए बुद्धिजीवी तो जन्मजात दुश्मन ठहरे, इसलिए उनका मान-मर्दन करना शुरू कर देते है।



इस टुच्चे राष्ट्रवाद के चौधरी पत्रकार हर घटना को हम और वे के नज़रिए से देखते हैं। हम यानी राष्ट्रवादी और वे मतलब देशद्रोही। उनके लिए बीच में या इधर-उधर कुछ है ही नहीं। इसलिए उनके लिए राष्ट्रवाद के अनुयायियों के अलावा सब दुश्मन हैं। अगर कोई मानवाधिकारों की बात करे तो देशद्रोही, सेना की ज़्यादतियों की बात करे तो देशद्रोही, पाकिस्तान या कश्मीरियों के हक़ में कोई तर्कसंगत बात कहे तो तब सबसे बड़ा देशद्रोही। लब्बोलुआब ये कि आपने उनसे असहमति दिखाई नहीं कि आप देशद्रोही करार दिए गए। अरुंधति रॉय, प्रशांत भूषण,गौहर रज़ा वगैरा याद हैं न?

शत्रुओं में भी वे शत्रु नंबर वन हैं जो प्रधानमंत्री और सरकार की आलोचना करता हो। उनके हिसाब से प्रधानमंत्री और उनकी सरकार ही राष्ट्वाद का पर्याय हैं। वह जो कहे-करे राष्ट्रवाद, जो न करे वह भी राष्ट्रवाद। इसी कसौटी पर वे सबकी राष्ट्रभक्ति परखते रहते हैं। लोकतंत्र और संविधान से इन्हें कोई मतलब नहीं। किसी ने कहा नहीं कि असहिष्णुता बढ़ गई है, बस चारों ओर से मारो मारो का शोर गूँजने लगता है। सोशल मीडिया पर तो गाली-गलौज़ और धमकियां भी शुरू हो जाती हैं।



इन्हीं पत्रकारों में से कुछ ऐसे भी हैं जो फतवे जारी कर रहे हैं कि फलाँ राष्ट्रवादी नहीं है और इसलिए राष्ट्रद्रोही है।  उसे पकड़ो, मारो, जेल में ठूँसो, सबक सिखाओ। वे देख रहे हैं कि उनकी इन हरकतों से उनके मालिकान खुश हैं, उनके राजनीतिक आका शाबाशियाँ दे रहे हैं। आगे इनाम-ओ-इकराम भी मिलेगा है, इसलिए लगे रहो। पत्रकारिता करने की ज़रूरत क्या है? गिरोह बनाओ, भजन मंडली बनाओ और खूब पैसा तथा नाम कमाओ। उन्हें लगता है कि वे पत्रकारिता कर रहे हैं और यही पत्रकारिता है। बल्कि पत्रकारिता जाए भाड़ में। जिसमें माल काटने को मिले वही करो। यही युग धर्म है, यही राष्ट्र धर्म है।

अब ऐसे माहौल में जो होता है वही हो रहा है। कुछ पत्रकार आपस में गुत्थमगुत्था हैं। एक दूसरे के कपड़े फाड़ने में लग गए हैं। बरखा अर्नब गोस्वामी पर बरस रही हैं। राजदीप भी उन पर छिप-छिपकर गोले दाग़ रहे हैं। कोई किसी को चिट्ठी लिख रहा है तो कोई किसी के पक्ष में जवाबी बयान जारी कर रहा है। अर्नब उन्हें घुमा-फिराकर देशद्रोही घोषित करते हुए सरकार को उकसा रहे है कि इनको धर लो, बख्शो मत। ये पाकिस्तानी हैं, कश्मीरी अलगवावादियों के समर्थक हैं। इस लड़ाई में पत्रकार भी बँट गए हैं। कुछ इधर हैं, कुछ उधर हैं। कुछ न इधर हैं न उधर हैं बस ही ही करके मजे ले रहे हैं। कह रहे हैं सानू की।

कोई इसकी चिंता नहीं कर रहा खि राजनीति के लिए राष्ट्रवाद किस तरह से इस्तेमाल किया जा रहा है। कोई नहीं कह रहा कि जिस राष्ट्रवाद के झंडाबरदार आप बने हुए हो, वह और कुछ नहीं नफ़रत और हिंसा का पिटारा है। इससे मीडिया का तो बैंड बज ही रहा है, देश भी रसातल की तरफ जा रहा है। लोकतंत्र खतरे में है। पहले से ही सीमित अभिव्यक्ति की आज़ादी घटती जा रही है। पत्रकार-लेखक बोलने से, लिखने से घबराने लगे हैं। बहुतों ने पाला बदल लिया है। बहुत से धंधा बदल रहे हैं।

अब इस माहौल में पत्रकारिता वही कर सकता है जो शीश काटकर हाथ में धरने को तैयार हो। जिसमें पत्रकारिता का जुनून इस कदर हावी हो कि आग का दरिया पार कर सके। ये आग का दरिया अंधराष्ट्रवादी ज्वालाओं से लहलहा रहा है। तो पत्रकार जी, अपनी राष्ट्रभक्ति सिद्ध कीजिए, अग्नि परीक्षा दीजिए।


Written by-डॉ. मुकेश कुमार


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