क्या संसद की बहसें अभी भी राजनीति का एजेंडा तय करती हैं?


संसद में अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चाएं अभी कुछ दिन चलेंगी। मीडिया में राहुल गाँधी के मास्टर स्ट्रोक या सेल्फ गोल का आकलन जारी रहेगा और मोदीजी के अंदाज़-ए-बयाँ का पोस्ट मार्टम भी चलेगा। मगर क्या ये सब जनमानस पर कितने दिन काबिज़ रहेगा और क्या चुनाव की दृष्टि से इसका कोई महत् है?

अव्वल तो ये कि वे दिन अब नहीं रहे जब संसद में होने वाली तक़रीरें जनता के बीच अरसे तक लहलें पैदा करती थीं। मीडिया का असर बहुत कम था और लोग पढ़ने-लिखने, बहस करके राय बनाने में रुचि रखते थे। इसीलिए संसद में नेहरू, लोहिया या दूसरे बड़े नेताओं द्वारा व्य्कत् किए गए विचार आकर गुज़र नहीं जाते थे। वे मानस पटल पर अंकित हो जाते थे और चुनाव में अपना असर भी दिखाते थे।
Do Parliament's debates still decide the agenda of politics?


आज का दौर तमाशेबाज़ी का है, नाटक और नौटंकी का है। उस प्रतिस्पर्धा का है जिसमें कुछ नया या अनोखा करके मीडिया में छा जाने का खेल खेला जाता है। इस कला में जो जितना निपुण होता है वह उतना लोकप्रिय और सक्रिय नज़र आता है। उसका महत्व भी मीडिया कवरेज के हिसाब से घटता-बढ़ता रहता है।

कहने की ज़रूरत नहीं कि मोदी इस खेल के उस्ताद हैं। वे मजमा लूटने वाले उस कवि की तरह हैं जो अपनी कविताओं से नहीं बल्कि अपने हाव-भाव से तालियाँ पिटवा लेता है। अच्छे कवि इसलिए मंच के लिए उपयोगी नहीं समझे जाते। पहले समझे जाते थे क्योंकि वह दौर दूसरा था।

फिर ये बात ध्यान में रखने की ज़रूरत है कि अब हर दो-चार दिन में मुद्दे बदल जाते हैं और पुराने मुद्दे कहीं गुम हो जाते हैं। ऐसे में अगर आप एकाध मौके पर कामयाब हो जाते हैं तो वह बहुत काम नही आता। हाँ, अगर आप लगातार ऐसे तमाशे करते रहें कि मीडिया को झख मारकर आपको फॉलो करना पडे तो और बात है।

अन्ना हज़ारे और केजरीवाल एक समय ऐसा करके जनता जुटाने मे सफल रहे थे। मोदी देश-विदेश में इवेंट करके यही करते आए हैं। हालाँकि अब लोग उनसे बोर हो गए हैं और मोदीजी कुछ नया सोचना पड़ेगा और उनमें इसके लिए पर्याप्त प्रतिभा है। राहुल गाँधी और उनकी टीम ने इक्का-दुक्का मौक़ों पर ही दिखाया है कि वे भी उनसे लोहा ले सकते हैं।
लगातार कुछ न कुछ करते रहकर ही आप चुनाव तक अपने हक़ में माहौल बनाने का काम कर सकते हैं। और अगर आप ऐसा करने में सक्षम नहीं है तो आपको दूसरी रणनीति पर काम करना होगा। मसलन, कोई ऐसा मुद्दा उछालना होगा जो चुनाव के एजेंडे को ही बदल डाले।

मोदी और शाह की जोड़ी इसी पर काम कर रही होगी क्योंकि तमाम मोर्चों पर फेल होने के बाद उनके पास और कोई रास्ता नहीं बचा है। यही वज़ह है कि पाकिस्तान पर हमला, हिंदू-मुस्लिम दंगे, धारा 370 को समाप्त करना या लोकसभा और विधानसभों के चुनाव एक साथ करवाने या कोई बड़ी आर्थिक राहत जैसा खेल वे खेल सकते हैं।

चूँकि काँग्रेस सत्ता में नहीं है इसलिए उसके पास विकल्प सीमित हो जाते हैं। वह ईवीएम को हथियार नहीं बना सकती और न ही मीडिया को मैनेज कर सकती है। उसके पास पैसे भी नहीं है और सीबीआई, इनकम टैक्स या दूसरी एजेंसी भी नहीं। उसे ज़्यादा दिमाग़ भी लगाना पड़ेगा और मेहनत भी करनी पड़ेगी।

कुल मिलाकर चुनाव तक अविश्वास प्रस्ताव पर होने वाली बहस ब्रम्हांड में विलीन हो चुकी होगी। या शायद याद भी रह जाएगी तो राहुल की झप्पी और आँख मारना, जो वोट दिलाने में कतई मददगार साबित नहीं होने वाली।

क्या संसद की बहसें अभी भी राजनीति का एजेंडा तय करती हैं?
Do Parliament's debates still decide the agenda of politics?
Written by कुमार उज्ज्वल


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