आपको-हमको ‘संजू’ इसलिए नहीं देखना चाहिए?


संजय दत्त की ज़िंदगी पर बनी फिल्म संजू कई कारणों से चर्चा में है। अव्वल तो ये कि फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बहुत ही शानदार प्रदर्शन कर रही है। पहले एक हफ़्ते में ही वह डेढ़ सौ करोड़ से ऊपर का कारोबार कर चुकी है।

दूसरे, मीडिया संजू की फिल्म की समीक्षाओं से भरा पड़ा है। आम तौर पर ये समीक्षाएं तारीफ़ से लबालब हैं। ये मीडिया के कारोबारी चरित्र के अनुरूप ही हैं। प्रमोशन के इस दौर में ज़्यादातर समीक्षाएं प्रायोजित होती हैं या फिर जन संपर्क की कवायद का हिस्सा, इसलिए उवकी कोई विश्सनीयता नहीं रह गई है। अलबत्ता वे हवा बनाने का काम तो करती ही हैं।
आपको-हमको ‘संजू’ इसलिए नहीं देखना चाहिए?


वैसे फिल्म देखने के बाद स्वतंत्र रूप से सोशल मीडिया या वेब पोर्टल में प्रकाशित समीक्षाएं ज़रूर स्पष्ट राय ज़ाहिर कर रही हैं। मैंने अपना निर्णय मुख्य रूप से इन्ही प्रतिक्रियाओं के आधार पर बनाया है और ये निर्णय अभी तक यही है कि ये फिल्म देखने की ज़रूरत नहीं है, इसे न देखने से कुछ खोने नहीं जा रहा, बल्कि समय और पैसा दोनों बचेगा।




इसमें कोई संदेह नहीं कि संजय दत्त का जीवन इतनी उथल-पुथल से भरा रहा है कि उस पर एक बायोपिक फिल्म बनाने की पूरी गुंज़ाइश थी और है। इसीलिए इस पर कोई सवाल भी नहीं उठा रहा। सवाल उठाए जा रहे हैं उसे जिस ढंग से बनाया गया है।

किसी भी बायोपिक का महत्व तभी होता है जब वह तथ्यों-कथ्यों के प्रति जहाँ तक हो सके ईमानदारी बरते। लेकिन संजू को देखकर कोई ये नहीं कह सकता। संजय दत्त के जीवन के बहुत से पहलुओं और विवादास्पद घटनाओं को फिल्म में शामिल ही नहीं किया गया है।

ज़ाहिर है जिसकी ज़िंदगी पर बायोपिक बनाई जा रही है उसके मामले में सेलेक्टिव नज़रिया अपनाने से निर्माता निर्देशक की नीयत पर सवाल खड़े होते हैं। निर्देशक राजकुमार हीरानी मुन्ना भाई यानी संजू के दोस्त और कारोबारी पार्टनर दोनों रहे हैं इसलिए उसका असर फिल्म पर साफ़ दिखलाई देता है।

यही वज़ह है कि संजू को एक अच्छी बायोपिक फिल्म की बजाय प्रोपेगंडा फिल्म के रूप में भी देखा जा रहा है। कहा जा लहा है कि फिल्म का एक मक़सद संजय दत्त की छवि को चमकाना है। एक नशेड़ी और अंडरवर्ल्ड से संबंध रखने वाले व्यक्ति के रूप में अभी भी उनकी छवि दाग़दार ही है। वे घातक हथियार रखने के मामले में सज़ा काट चुके हैं ये सभी जानते हैं।




सबसे ज़्यादा आपत्तिजनक उनकी पूर्व पत्नी और बेटी के संबंधों को गायब कर देना है। संजय दत्त के जीवन का ये अभिन्न हिस्सा है और उसके बिना उनकी बायोपिक की कल्पना करना ही मुश्किल है। इसके अलावा विभिन्न महिलाओं के साथ उनके संबंधों को भी फिल्म में जगह नहीं मिली है।

लेकिन प्रोपेगंडा फिल्म होने के आरोप को जो चीज़ सबसे ज़्यादा पुख्ता करती है, वह है संजय दत्त और उनके परिवार द्वारा कानूनी लड़ाई में सियासत का इस्तेमाल। सुनील दत्त अपने बेटे की रिहाई के लिए तत्कालीन शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के दरबार में मत्था टेकने गए थे और संजू बाबा भी उनके साथ थे। शिवसेना की सरकार बनने के बाद संजय को राहत भी मिली थी।

इस पूरे प्रसंग को राजकुमार हीरानी खा गए हैं। उन्होंने पूरी फिल्म में संजय दत्त को पीड़ित के तौर पर पेश किया है, जबकि वे एक बिगड़ैल बेटे और अपराधी भी थे। अब हिरानी सिनेमाई स्वतंत्रता का हवाला देकर अपना बचाव करने की कोशिश कर रहे हैं, मगर उसका कोई मतलब नहीं है।

ऐसे में इस फिल्म को देखने का भी कोई औचित्य नहीं है। ये और बात है कि लोग फिल्म देख रहे हैं और निर्माता-निर्देशक की तिजोड़ियाँ भी भर रहे हैं।

आपको-हमको ‘संजू’ इसलिए नहीं देखना चाहिए?
Written by शैबाल दास


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