सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से उपराज्यपाल की कम और केंद्र सरकार की फ़ज़ीहत ज़्यादा हुई है


सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले ने एक साथ कई काम कर दिए हैं। अव्वल तो उसने केजरीवाल सरकार के इस तर्क को सही ठहरा दिया है कि वह चुनी हुई है और उसे लोकतांत्रिक ढंग से काम करने दिया जाए। यानी केंद्र सरकार और उनके एजेंट उपराज्यपाल महोदय जिस आधार पर उसे काम नहीं करने दे रहे थे वही उसने ध्वस्त कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से उपराज्यपाल की कम और केंद्र सरकार की फ़ज़ीहत ज़्यादा हुई है

दूसरे, सर्वोच्च अदालत का फ़ैसला बताता है कि दिल्ली सरकार को भले ही पूर्ण राज्य का दर्ज़ा न दिया गया हो, मगर कानून उसे इतना भी पंगु नहीं बनाता कि केंद्र सरकार उपराज्यपाल के ज़रिए मनमानी करे। मौजूदा ढाँचे में भी उसे बहुत सारे अधिकार मिले हुए हैं और केंद्र को उसमें दखल देने का हक़ नहीं है।

पिछले तीन साल में उपराज्यपाल ने दिल्ली सरकार की हर योजना में अड़ंगा लगाया है। चाहे वह घर-घर राशन बाँटने की योजना हो या फिर मोहल्ला क्लीनिक। यहाँ तक उसने पूरी ब्यूरोक्रेसी को भी राज्य सरकार के प्रति असयोगात्मक रवैया अपनाने के लिए उकसाया। इसका नतीजा ये हुआ कि चार महीने तक दिल्ली सरकार लगभग ठप पड़ी रही।




ज़ाहिर है कि ये दिल्ली सरकार की एक बड़ी जीत है और उससे भी बड़ी जीत है लोकतंत्र की। लेकिन सवाल उठता है कि फिर हार किसकी है?

कहने की ज़रूरत नहीं है कि ये हार केवल और केवल मोदी सरकार की है। दिल्ली सरकार को परेशान करने की नीति उसी की थी, उपराज्यपाल तो उसके इशारे पर नाचने वाली कठपुतली भर थी। उसने वही किया जो केंद्र ने उसे करने को कहा। ये सही है कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से उपराज्यपाल की किरकिरी हुई है और अब उसे पद से फ़ौरन इस्तीफ़ा दे देना चाहिए, मगर उससे कहीं ज्यादा फ़ज़ीहत तो केंद्र सरकार की हुई है।

मोदी सरकार ये ढिंढोरा पीटते नहीं थकती थी कि वह संविधान के संघीय ढाँचे का सम्मान करती है और राज्यों के अधिकारों का सम्मान करती है। हालाँकि ये पहले ही साबित हो चुका है कि वह ढोंग करती रही है। कई राज्यों की सरकार को गिराने-बनाने के खेल ने उसकी नीयत का परदाफ़ाश कब का कर दिया था, मगर अब ये और भी स्पष्ट रूप से जनता के सामने आ गया है।




केंद्र के पास अब मुँह छिपाने के लिए कोई आड़ नहीं है। उसके पास एक भी बहाना है जिससे वह अपनी करतूतों के सही ठहरा सके। इसके ठीक उलट केजरीवाल सरकार के पास अपनी नाक़ामियों पर परदा डालने का ये तर्क है कि वह तो बहुत कुछ करना चाहती थी मगर केंद्र ने उसे काम ही नहीं करने दिया।

केंद्र के लिए इससे भी बड़ी मुश्किल अब ये होगी कि केजरीवाल सरकार आक्रामक रुख़ अख़्तियार कर सकती है। केजरीवाल सरकार के पास अब वक़्त कम है। उसे अगले डेढ़ साल में उसे साबित करना है कि वह काम कर सकती है, लिहाज़ा वह सुपरफास्ट की गति से काम करना चाहेगी। यानी जितने भी प्रस्ताव अटके पड़े हैं उन सब पर फ़ौरन कार्रवाई शुरू करेगी और केंद्र को उसकी बात माननी पड़ेगी।

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से उपराज्यपाल की कम और केंद्र सरकार की फ़ज़ीहत ज़्यादा हुई है

Written by-विश्वदीपक श्रीवास्तव

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