खुले स्तन, हिज़ाब, बुर्कीनी, स्कर्ट-हमें सभ्यताओं के टकराव की ओर धकेला जा रहा है


फ्रांस के प्रधानमंत्री मैनुअल वाल्स के इस बयान की चौतरफा निंदा हो रही है कि हिजाब से बेहतर स्तनों का खुला रहना है और खुले स्तन ही फ्रांसीसी गणतंत्र की पहचान है। निंदा लाज़िमी है, क्योंकि इसमें दूसरे धर्मों और संस्कृतियों के प्रति उनकी असहिष्णुता साफ़ दिख रही है। उन्हें ये बर्दाश्त नहीं हो रहा है कि फ्रांस में कोई अपनी पसंद के हिसाब से रहे। वे सबको अपने साँचे में ढाल देना चाहते हैं।

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बेशक़ ये उनका नस्ली श्रेष्ठताबोध भी है। वे मानकर चल रहे हैं कि फ्रांसीसी नस्ल विशेष है। ज़ाहिर है कि उसकी सारी चीज़ें विशिष्ट हैं इसलिए सभी को उनको मंज़ूर करना चाहिए, उन्हें अपनाना चाहिए। ये स्त्री विरोधी मर्दवादी सोच भी है। वे खुले स्तनों की मिसाल दे रहे हैं यानी स्वतंत्रता के सवाल पर केवल स्त्रियाँ और उनका जिस्म ही उनके दिमाग़ में है, उनकी समस्याएं नहीं।



ये दूसरी संस्कृतियों को कमतर बताने की कोशिश भी है, क्योंकि हिज़ाब या बुर्किनी को वे पिछड़ेपन की कसौटी के रूप में देख रहे हैं। यही नहीं, जिस संदर्भ में उन्होंने ये बयान दिया है वह दूसरों पर अपनी संस्कृति थोपने का एक अवांछित प्रयास भी है। ये प्रयास वहां के कई शहरों के मेयरों ने भी किया है, मगर वहाँ की सर्वोच्च अदालत ने उसे अवैध करार दिया है।

अफ़सोस की बात ये है कि अदालती आदेश के बावजूद मंत्री महोदय ने उसकी परवाह नहीं की और अपनी धारणाओं को थोपने की कोशिश की। इस मामले में वे शिक्षा मंत्री से भी भिड़ गए। ज़ाहिर है कि हिज़ाब आदि के मामले में सरकार भी अंदर ही अंदर विभाजित है।

दरअसल, आतंकवाद और फिर पश्चिमी एशिया और मध्यपूर्व से आए शरणार्थियों की बाढ़ ने यूरोप को विचलित कर ऱखा है और बहुसंख्यकों के मन में पहले से जमा असुरक्षा बोध बढ़ गया है। इसलिए वे नस्ली अंदाज़ में व्यवहार करने लगे हैं। इसका दबाव सभी राजनीतिक दलों पर पड़ रहा है।

कुछ विपक्षी दल इसका फ़ायदा उठाने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं। कई ने तो खुल्लमखुल्ला बुर्कीनी पर प्रतिबंध लगाने को जायज़ ठहराया था और ये भी कहा है कि अगर वे सत्ता में आए तो बुर्कीनी तथा हिज़ाब आदि पर रोक लगा देंगे। उनके इस भड़काऊ रवैये की वजह से तनाव और टकराव बढ़ रहा है।

मैनुअल वाल्श ने खुले स्तनों की वकालत करते हुए फ्रांसीसी क्रांति की प्रतीक मैरीऐन के खुले हुए स्तनों की मिसाल देते हुए कहा कि वे बच्चों को दूध पिलाती हैं। लेकिन उनकी ये मिसाल ग़लत है। अव्वल तो केवल स्तनों से क्रांति के सबकों को जोड़ देना ठीक नहीं है। फ्रांसीसी क्रांति का लक्ष्य यदि स्वतंत्रता था तो समानता भी था। समानता के बारे में वे कुछ नहीं कह रहे। स्वतंत्रता की परिभाषा भी वे संकुचित दिमाग़ से देख रहे हैं।



अच्छी बात ये है कि उनके इस बयान पर लगभग सभी तरफ से प्रहार हो रहे हैं। बुद्धिजीवियों ने उनकी इस असहिष्णुता को उनकी अज्ञानता बताया है। फ्रांसीसी क्रांति के प्रसिद्ध इतिहासकार के मुताबिक सिंबल ऑफ लिबर्टी के स्तन खुले हुए हैं तो इसलिए कि वह एक रूपक भर है और इससे भी आगे बढ़कर वह एक क्लासिकल इलुजन यानी भ्रांति है।

एक अन्य इतिहासकार का कहना है कि वाल्श 1830 की पेंटिंग ऑफ लिबर्टी से भ्रमित हो रहे हैं। इस पेंटिंग में लिबर्टी के स्तन खुले हुए हैं, जबकि मैरिऐन के स्तन खुले नहीं हैं। नारीवादियों का कहना है कि वाल्श ने खुले स्तनों की तारीफ़ करके अपने नारी विरोधी सोच का परिचय दिया है।

सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात ये है कि इस तरह के विवादों को जन्म देकर वाल्श और उन जैसे तमाम लोग पूरी दुनिया को सभ्यताओं के टकराव की ओर धकेल रहे हैं, जो कि बहुत ही ख़तरनाक़ साबित हो सकता है। अभी इसे इस्लाम बनाम शेष विश्व के तौर पर पेश किया जा रहा है। कहीं-कहीं इसे पूर्व और पश्चिम के टकराव के रूप में भी देख रहे हैं तो कुछ इस्लाम बनाम ईसाइयत के मुक़ाबले में तब्दील होते हुए।

रूप चाहे कोई हो मगर अंतत ये हिंसा को जन्म दे रहा है।

Written by-डॉ. मुकेश कुमार











खुले स्तन, हिज़ाब, बुर्कीनी, स्कर्ट-हमें सभ्यताओं के टकराव की ओर धकेला जा रहा है
Open breast, Hizab, Burkini, Skirts-are we being pushed towards clash of civilizations


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