केश खुले ही रहने दो याज्ञसेनी - कवयित्री कोरोबी डेका हजारिका की कविता


काव्य-धारा में आज देशकाल की ओर से पेश है असमिया की जानी मानी कवयित्री कोरोबी डेका हजारिका की कविता-केश खुले ही रहने दो याज्ञसेनी। कविता को असमिया से हिंदी में अनुवाद किया है सुपरिचित लेखिका एवं अनुवादक पापोरी गोस्वामी ने।





केश खुले ही रहने दो याज्ञसेनी - कवयित्री कोरोबी डेका हजारिका की कविता

Translated by Papori Goswami

kesh khule hee rahane do yaagyasenee

Share on Google Plus

0 comments:

Post a comment