न्यूज़ ऐंकरिंग के नए गुरु-मंत्र


हम जैसे बहुत से लोगों को पता ही नहीं चला और दुनिया बदल गई। हम अपने पुराने अनुभवों और मान्यताओं के हिसाब से चीज़ों को देख रहे थे, परिभाषित कर रहे थे। अपेक्षा करते थे कि सब कुछ उन्हीं के हिसाब से चल रहा होगा। मसलन, हमें लगता था कि ऐसे नेताओं की इज्ज़त होती है जो शांत, गंभीर और मर्यादाओं का ध्यान रखने वाले हों, मगर अब पता चल रहा है कि बड़बोले, फेंकू, नौटंकीबाज़, आत्ममुग्ध और अहंकारी नेता ज़्यादा लोकप्रिय हैं। कम बोलने वाले और संयम रखने वालों को कोई पूछता नहीं।

New Mantra of news anchoring
मीडिया के मामले में भी हमने कुछ ऐसा ही गच्चा खाया है। कभी दूरदर्शन पर मंद स्वरों में लगभग जड़ होकर समाचार पढ़ने वाले ऐंकर हमारी यादों पर काबिज़ थे, मगर अब वे परिदृश्य से गायब हो चुके हैं। उनकी जगह बहुत ज़्यादा और अनावश्यक बोलने वाले ड्रामाई ऐंकर ने ले ली है। जो जितना बोलता है, वह उतना देखा जाता है, जो जितना बदतमीज़ी करता है, चीखता-गुर्राता है, फुँफकारता है, वह उतना ही पॉपुलर है। इसके विपरीत अच्छा पत्रकार होना उसके नंबर कम कर सकता है। ईमानदारी उसके करियर के लिए नुकसानदेह हो सकती है। मालिकों तथा सत्त्तारूढ़ दल की राजनीतिक अपेक्षाओं पर खरा उतरना तो अनिवार्य शर्त है ही।

पता नहीं कि पत्रकारिता का पाठ्यक्रम बनाने और उसका प्रशिक्षण देने वालों की नज़र इस ओर गई है या नहीं मगर यदि गई होगी तो वे भी महसूस कर रहे होंगे कि ऐंकरिंग के प्रशिक्षण में अब बड़े पैमाने पर बदलाव की ज़रूरत है। उन्हें समझ में आ रहा होगा कि उनका पाठ्यक्रम बहुत पुराना पड़ चुका है और पढ़ाने का तरीक़ा भी। ख़बरें बदल गईं, ख़बरनवीस और ख़बरिया चैनल बदल गए इसलिए ज़ाहिर है कि ऐंकर को भी बदलना था इसलिए वह भी बदल गया है। ऐसे में पढाई-सिखाई के तरीक़े भी बदलने का वक़्त है। अगर उन्होंने ऐसा न किया तो छात्र उनसे शिक्षा लेने के बजाय कहीं और से सीखने लगेंगे।

मौजूदा दौर में कामयाब ऐंकर बनने के लिए कुछ गुरु-मंत्र पूरी तरह से मुफ़्त यहाँ दिए जा रहे हैं। वे चाहें तो इन्हें आज़मा सकते हैं। सबसे पहला मंत्र तो यही है कि एंकरिंग के छात्र के पास औसत से ज़्यादा बुद्धि नहीं होनी चाहिए, क्योंकि वह उसकी प्रगति का रास्ता रोक सकती है। अगर उसके अधिक बुद्धि है तो कैसे उसे वांछित स्तर पर लाया जा सकता है इसके लिए प्रयास करने होंगे। हिंदी न्यूज़ चैनल दिखाकर ये लक्ष्य आसानी से हासिल किया जा सकता है। साथ ही उसे ये भी बताया जाना चाहिए कि वह विवेक से ज्यादा भावनाओं पर ज़ोर दे। यानी उसके पास ये कौशल होना चाहिए कि किस ख़बर में भावनाओं को भड़काने की कितनी गुंज़ाइश है इसे समझ सके और फिर उसका इस्तेमाल कर सके।

दूसरा, ऐंकर का गला खुला होना चाहिए, ताकि वह खूब चीख-चिल्ला सके। इसका अभ्यास ट्रेनिंग के दौरान हो सकता है। लेकिन चिल्लाना ही काफी नहीं होगा, बल्कि उसके अंदाज़-ए-बयाँ में किसी मदारी या दंत-मंजन बेचने वाले की तरह नाटकीयता भी होनी चाहिए। प्रशिक्षक छात्रों को हाट-बाज़ार में ले जाकर आलू-प्याज़ या मूँगफली बेचने वालों को दिखाकर बता सकते हैं कि उन्हें ख़बरें कैसे पढ़नी चाहिए। चाहें तो कुछ सब्ज़ी विक्रेताओं या रेह़ड़ी लगाने वालों को ठेके पर रखकर उनसे प्रशिक्षण दिलवाया जा सकता हैं। अपराध और मनोरंजन के कार्यक्रमों की ऐंकरिंग करने वालों को तो अभिनय में माहिर होना ही चाहिए, मगर ख़बर पढ़ने वाले और बहस का संचालन करने वाले ऐंकर भी यदि कुशल अभिनेता होंगे तो कामयाबी उनके क़दम चूमेगी। वे कार्यक्रम में एक्शन, इमोशन, ड्रामा भरकर उसे दर्शनीय बना सकेंगे।

तीसरा गुरुमंत्र ये है कि ऐंकर को लड़ाने-भिड़ाने वाला होना चाहिए। अगर उसमें ये गुण पैदाइशी हो तो अच्छा है मगर यदि न हो तो उसे मिथकों, फिल्मों एवं टीवी धारावाहिकों के ऐसे पात्रों से सीखना चाहिए जो ये काम करके भारी लोकप्रियता हासिल करते हैं। उदाहरण के लिए नारद मुनि, शकुनि या मंथरा वगैरा की चालबाज़ियों को वह ऐंकरिंग में इस्तेमाल कर सकता है। चौथी बात ऐंकर को ये सिखाई जानी चाहिए कि उन्हें ढीठ, बल्कि बेशर्म ही होना चाहिए। भले ही उसके कदाचार के किस्से सबको पता हों या वह जेल ही क्यों न जा चुका हो, मगर उसे विचलित नहीं होना चाहिए। कभी किसी बहस के दौरान यदि कोई मेहमान उसकी ग़लती को पकड़कर उसे बेइज्ज़त करे तो उसे शर्मसार नहीं होना चाहिए, बल्कि दोगुनी ताक़त से उस पर टूट पड़ना चाहिए। पैनल में मौजूद समर्थक मेहमानों का साथ लेकर हमला करने वाले को कैसे धुना जाए, इसके गुर उसे सिखाए जाने चाहिए। इसके लिए कुछ अनुभवी टीवी एंकर की मदद भी ली जा सकती है।

उपरोक्त योग्यताएं मार्केट की डिमांड के अनुरूप हैं और चूँकि ऐंकर को मार्केट में ख़बरों के सेल्समैन की तरह काम करना होता है इसलिए उसकी तैयारी भी वैसी ही होनी चाहिए। अगर मीडिया का प्रशिक्षण देने वाले संस्थान इस बात का ध्यान रखेंगे तो उनकी अहमियत बढ़ेगी, अन्यथा उनका भविष्य अंधकारमय है।

न्यूज़ ऐंकरिंग के नए गुरु-मंत्र

Written by-डॉ. मुकेश कुमार
डॉ. मुकेश कुमार










अन्य पोस्ट :
मीडिया को जंगखोर किसने बनाया?
Who made media war hungry?
प्रायोजित स्वच्छता अभियानों का कूड़ा-करकट
प्रोपेगंडा मशीनरी से चमकता नक़ली विकास
Fake development is shining with the little help of propaganda machinery
अमिताभ बच्चन भाँड़ हैं भाँड़, जया उनसे ज़्यादा ईमानदार इंसान-काटजू
मेरा मुँह न खुलवाएं, एक-एक आदमी नंगा हो जाएगा-अमर सिंह
बलूचिस्तान से तो मेरी बल्ले-बल्ले हो गई, लॉटरी लग गई-नवाज़ शरीफ़


Share on Google Plus

0 comments:

Post a comment