मजदूर हड़ताल मोदी की आर्थिक नीतियों को खुली चुनौती है


देश के मेहनतकश आज सड़कों पर हैं । 11 केंद्रीय श्रम संगठनों के बुलावे पर हड़ताल है । कल कारखाने बंद हैं । व्यवस्था की रक्तवाहिका बैंक और इनश्योरेन्स के सफेदपोश कर्मचारी भी इन हड़तालियों के साथ हैं । रेल से लेकर तमाम सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठान इसमें अगुवा भूमिका निभा रहे हैं । यह पहली दफा है जब मजदूरों से इतर समाज के दूसरे तबकों का इसे खुला समर्थन है। किसानों के संगठन इसमें बढ़ चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं । हड़ताल की पूरी कमान असंगठित क्षेत्र के मजदूरों ने संभाल रखी है ।

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दरअसल मोदी सरकार ने सबसे तगड़ा हमला मजदूरों पर बोला है । इस मामले में उसने सुधारों के पितामह मनमोहन सिंह का भी कान काट लिया है । जो काम मनमोहन चाह कर भी नहीं कर सके । मोदी जी उसे डंके की चोट पर कर रहे हैं । पीएम साहब कॉर्पोरेट के खुले पैरोकार हैं । योजना आयोग की समाप्ति के फैसले के साथ उन्होंने अपने तरीके से संकेत दे दिया कि देश की अगुवाई अब कॉर्पोरेट करेगा । लिहाजा सारी मलाई दौलतमंदों की झोली में और जनता के हिस्से में जुमले । मोदी जी ने इसमें कोई दुराव-छुपाव नहीं किया ।



दो सालों में सरकार की यही दिशा रही है । सरकार का एक मात्र काम इस झोली के वजन को बढ़ाना है । इसके लिए उसे जो भी उपाय करने पड़े । अनायास नहीं खजाना मंत्री अरुण जेटली ने अपने पहले ही बजट में कॉर्पोरेट टैक्स को 30 फीसदी से घटा कर 25 कर दिया । और छोटी बचतों के व्याज दर में तक़रीबन 1.50 फीसदी की कटौती कर दी । जमीन और खनिज सम्पदा समेत तमाम प्राकृतिक संसाधनों की लूट में सरकार हर स्तर पर कॉर्पोरेट की मददगार है । अडानी-अम्बानी और बाबा रामदेव को सरकार से नजदीकियों का पूरा फायदा मिल रहा है । अनायास नहीं देखते-देखते अडानी की संपत्ति में एकमुश्त 25 हजार करोड़ की बढ़त हो गई । तो बाबा का कारोबार दिन दूना रात चौगुना की गति से फलने-फूलने लगा ।

 कोई ऐसा हफ्ता नहीं होगा जिसमें किसी बीजेपी शासित राज्य में उनके कारोबार के लिए सैकड़ों एकड़ जमीनों का आवंटन न हुआ हो । अम्बानी सरकारी कंपनी ओएनजीसी के 30 हजार करोड़ रूपये गड़प कर गए। और सांस भी नहीं लिए । यह घटना न मीडिया की आवाज बनी न ही उस पर किसी ने कान दिया ।

देश के इन खुदमुख्तारों को इतने से भी संतोष नहीं हुआ । तो अब इन्होंने मजदूरों का खून चूसने का मन बना लिया है । इस कड़ी में वो सरकार पर श्रम कानूनों में सुधार का दबाव डाल रहे हैं। इस मामले में बीजेपी शासित राजस्थान मॉडल बनकर उभरा है । यहां विधान सभा में पारित कानून में मेहनतकशों के अधिकारों पर बड़े स्तर पर कटौती हुई है । जिसे मोदी सरकार अब केंद्र में लागू करने की फ़िराक में है । इसके लागू होते ही कर्मचारियों को नौकरी से निकालना आसान हो जाएगा ।

यूनियन बीते दिनों की बात हो जाएगी । 100 कर्मचारियों वाली यूनिट में मजदूरों को कोई सुरक्षा नहीं प्राप्त होगी। मालिक किसी को कभी भी कान पकड़ कर बाहर कर सकता है । इसके अलावा एक माह में ओवर टाइम की सीमा 50 से बढ़ाकर 100 घंटे करने का प्रस्ताव है । ऐसा होने पर मजदूरों की 8 घंटे की जगह 12 घंटे की नियमित ड्यूटी हो जाएगी। इसके साथ ही 44 श्रम कानूनो को ख़त्म करके 4 करने का प्रावधान है । इसी तरह से ढेर सारे मजदूर विरोधी प्रावधान इसके हिस्से हैं ।



फलते-फूलते बीमा क्षेत्र का सरकार बीच में ही गाला घोंटने पर उतारू है । 1971 में 19 करोड़ की पूंजी से शुरू होने वाला सरकार का यह सार्वजनिक क्षेत्र आज 650 करोड़ की पूंजी का मालिक है । लेकिन इस क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लाकर सरकार बसी बसाई बस्ती को उजाड़ने पर तुल गई है । सरकार का कहना है कि बहुराष्ट्रीय बीमा कंपनियां ग्रामीण क्षेत्रों का रुख करेंगी । लेकिन हकीकत बिल्कुल उलट है । कोई भी कंपनी शहर की दहलीज पार करने को राजी नहीं है ।

पिछली सरकार तक कमोबेश नवरत्न कंपनियां महफूज थीं । लेकिन मोदी के सत्ता में आते ही सबकी गर्दन पर तलवार लटकी हुई है । गेल, इंडियन ऑयल से लेकर ओएनजीसी पर पूँजीपतियों की गिध्द दृष्टि लगी है । और बीच-बीच में इनके शेयर भी सरकार नीलाम करती रहती है । फायदे में चलने वाली इन कंपनियों को घाटे में लाने की सरकार पुरजोर कोशिश कर रही है । इसके अलावा देश के सबसे बड़े सेक्टर रेलवे के निजीकरण का सरकार ने मन बना लिया है । उसकी कई तरह से शुरुआत हो चुकी है । वह दिन दूर नहीं जब रेलवे स्टेशनों की खुले बाजार में बोली लगे । कमोवेश यही हाल बैंकों और विमान सेवा क्षेत्र का भी है ।

देश के दूसरे तबके भी बदहाल हैं । किसानों की आत्महत्याएं हैं कि थमने का नाम ही नहीं ले रहीं । ऊपर से कभी सूखा तो कभी बाढ़ और कभी ओला वृष्टि ने उनका जीना दूभर कर दिया है । मुआवजे के नाम पर सरकार के 2 और चार रूपये के चेक की कहानियां हैं । देश में किसान नाम के जीव भी रहते हैं । सरकार इस चीज को भूल जाना चाहती है ।

और इन सबसे ऊपर महंगाई ने लोगों को मौत के कगार पर खड़ा कर दिया है । मध्य वर्ग को पहली बार भोजन का बजट बनाते देखा गया । ऐसे में गरीबों की बदहाली का आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है ।

ऊपर से बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मार ने छोटी पूँजी और मध्यम उद्यमियों की कमर तोड़ दी है । और सस्ते श्रम के कंधे पर वो अपने लूट का साम्राज्य खड़ा करना चाहती हैं । इन्ही सब हालातों में इस हड़ताल के जरिये मजदूर सरकार को एक कड़ा सन्देश देना चाहते हैं । बढ़ती मंहगाई पर लगाम लगाने, न्यूनतम मजदूरी 18000 हजार रूपये प्रतिमाह करने, पुरानी पेंशन योजना को बहाल करने, एफडीआई और श्रम कानूनों में संसोधन की प्रकिया पर तत्काल रोक लगाने समेत आदि मुद्दे इसमें शामिल हैं । इसके अलावा सांप्रदयिकता के खिलाफ पुरजोर अभियान इस आंदोलन का अभिन्न हिस्सा है ।

साथ ही साम्रज्यवाद के बढ़ते खूनी पंजे को तोड़कर एक स्वतन्त्र और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण इसकी मंजिल।

Written By महेन्द्र मिश्र


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