क्या अरुणाचल में हुए एकमुश्त फेरबदल के पीछे केंद्र सरकार का हाथ है?


अरुणाचल प्रदेश की हालिया घटनाओं ने साबित कर दिया है कि सचमुच राजनीति में कुछ भी संभव है। साम नहीं तो दाम, वह भी नहीं तो दंड किसी भी रीति से लोकतंत्र और सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को धता बताया जा सकता है।

Defection-in-Arunachal-Pradesh
राज्यपाल बनाए जाने के बाद ज्योति प्रसाद राजखोवा के माध्यम से नबाम तुकी सरकार को गिराने की घटना पुरानी हो चुकी है। कुछ समय के लिए मुख्यमंत्री बने कलिखो पुल एक अस्वाभाविक परिस्थिति में मौत के शिकार हो चुके हैं। तुकी देश की सबसे बड़ी अदालत के आदेश से फिर मुख्यमंत्री तो बने लेकिन नेतृत्व ने उनकी जगह प्रेमा खांडू को यह कुर्सी दे दी।



राजखोवा से नाखुश केंद्र ने उन्हें राजभवन से बाहर कर मेघालय के राज्यपाल वी षणमुगनाथन को ईटानगर में बैठा दिया। बस क्या है,  तीन दिन के भीतर ही  मुख्यमंत्री प्रेमा खांडू और पार्टी अध्यक्ष पादी रिचो सहित सहित कांगे्रस के 46 में 42 विधायक पीपुल्स पार्टी आफ अरुणाचल प्रदेश (पीपीए) के हो गए। नौ माह के भीतर तीसरी बार कांग्रेस की खुशियां देखते-देखते काफूर हो गईं।

कांग्रेस इसे केंद्र की भाजपा सरकार की ब्लैकमेलिंग बता रही है। असम प्रदेश कांगे्रस के अध्यक्ष और राज्यसभा सदस्य रिपुन बोरा कहते हैं कि हर तरह की केंद्रीय सहायता रोकने का भय दिखा कर ऐसा कराया गया होगा। क्योंकि अरुणाचल प्रदेश जैसा छोटा राज्य पूरी तरह से केंद्र की सहायता पर निर्भर है। वहां के मुख्यमंत्री के सामने और कोई रास्ता नहीं बचा होगा।

कहना मुश्किल है कि इस दल बदल में केंद्र सरकार की कोई भूमिका थी या नहीं। लेकिन परिस्थितियाँ इसी ओर इशारा कर रही हैं कि ये बिना केंद्र के इशारे के संभव नहीं हुआ होगा। राज्यपाल बदले जाने और मुख्यमंत्री समेत विधायकों का एकमुश्त पाला बदलने की टायमिंग संदेह पैदा करती है। बहुत मुमकिन है कि कुछ समय बाद पीपीए बीजेपी में समा जाए।



चीन सीमा से सटे अरुणाचल प्रदेश में राजनीतिक उठापटक अपने पूरे सवाब पर है। बीते साल दिसंबर के दौरान वहां सरकार पलटने का किस्सा शुरू हुआ था। इस शुक्रवार ने तो एक और नजीर दे दी है।

लोकतंत्र में विचारधारा के स्तर पर  पार्टियों के बीच राजनीतिक टकराव कोई अनहोनी तो नहीं है। लेकिन जिस तरह से केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार आने के बाद टकराव बढ़े हैं, सोचने को मजबूर होना पड़ रहा  है। क्या संघीय लोकतंत्र में ऐसी अप्रिय स्थितियों से बचा नहीं जा सकता।

मुख्य सचिव रहे राजखोवा को पिछले साल 12 मई को मौजूदा केंद्र सरकार ने अरुणाचल प्रदेश का राज्यपाल बनाया था। कुछ दिनों के भीतर ही उनसे तुकी सरकार की खटपट सामने आने लगी थी। मध्य दिसंबर तक ये वैचारिक मतभेद कटुता की सीमा पार कर गए थे।

राज्यपाल राजखोवा ने तब बिना राज्य सरकार से परामर्श किए विधानसभा का विशेष सत्र बुला लिया था। राज्य ने देखा था कि तब की सरकार ने राज्यपाल के कदम को असंवैधानिक बताते हुए विधानसभा का ही एक तरह से घेराव कर डाला था। विधायकों को विधानसभा के भीतर नहीं जाने दिया था।

समूचे अरुणाचल प्रदेश में ऐसी अभूतपूर्व तनाव पैदा हो गया था। देश के किसी हिस्से में राज्यपाल और चुनी गई राज्य सरकार के बीच तनाव की वह स्थिति पहले कहीं नहीं देखी गई थी। सुप्रीम कोर्ट की ओर से राज्यपाल के रूप में राजखोवा के कदम को अवैधानिक करार देने और फिर तुकी सरकार को बहाल करने के आदेश से केंद्र सरकार को करारा झटका लगा था।

शायद राजखोवा अपने काम को उस तरह अंजाम नहीं दे पाए थे कि अदालत से वैसी फजीहत नहीं हो पाती। इसका दंड भी उन्हें दे दिया गया। कुछ माह बाद ही उनके पास (जैसा कि खुद राजखोवा ने मीडिया में कहा) असम के एक व्यापारी का फोन गया। उन्हें किसी अति प्रभावशाली राजनीतिक का हवाला दे स्वास्थ्य कारणों से ससम्मान राज्यपाल पद छोड़ने की सलाह दी गई।

बाद का सारा घटनाक्रम सबको मालूम है। इस्तीफा नहीं देने पर राष्ट्रपति ने राजखोवा को बर्खास्त कर दिया। राजखोवा अभी भी कह रहे हैं कि उन्हें बर्खास्त करने का कारण बताया जाना चाहिए था। ऐसा तो किसी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के मामले में भी नहीं होता। फिर वे तो राज्यपाल थे।

क्या अरुणाचल में हुए एकमुश्त फेरबदल के पीछे केंद्र सरकार का हाथ है?
Is central govt. behind the whole sale defection in Arunachal Pradesh?

Written by-सत्यनारायण मिश्र, गुवाहाटी








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