अगर कोई शर्त नहीं है तो सिद्धू की दुविधा क्या है?


नवजोत सिंह सिद्धू ने जब राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दिया था तो लगा था कि वे अमृतसर पहुँचते ही आम आदमी पार्टी में शामिल होने की घोषणा कर देंगे। ये भी तय माना जा रहा था कि आप के साथ उनकी डील हो चुकी है और इसीलिए उन्होंने इतना बड़ा क़दम उठाया है। डील के बारे में भी लगभग तय अंदाज़ में कहा जा रहा था कि वे पंजाब चुनाव में आप का चेहरा ही नहीं, उसकी ओर से मुख्यमंत्री पद के दावेदार भी होंगे। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। सवाल उठता है कि मामला कहां अटका हुआ है।

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अरविंद केजरीवाल कह रहे हैं कि सिद्धू की ओर से आप में शामिल होने के लिए कोई शर्त नहीं रखी गई है। वे ये भी कह रहे हैं कि सिद्धू पार्टी में आएँ या न आएं उनके लिए सम्मान बना रहेगा। उनके इन बयानों का क्या मतलब निकाला जाए? क्या सिद्धू की शर्त आप नेतृत्व ने स्वीकार नहीं की है और पार्टी में उनके शामिल होने के आसार अब क्षीण हो चुके हैं?

मुमकिन है कि बातचीत अभी जारी हो और सिद्धू अपनी शर्ते मनवाने के लिए ज़ोर लगा रहे हों, मगर पार्टी के अंदर से हो रहा विरोध उन्हें स्वीकार न करने के लिए दबाव बनाने में लगा हो। ये तो ज़ाहिर हो चुका है कि पार्टी का एक धड़ा नहीं चाहता कि सिद्धू को बतौर मुख्यमंत्री पेश किया जाए। एक गुट भगवंत सिंह मान को भावी मुख्यमंत्री के रूप में पेश करने की माँग भी कर रहा है।



इस खींचतान की वजह से आप नेतृत्व को फैसला लेने में दिक्कत आ रही होगी। पहले ही आप की पंजाब यूनिट में टूट-फूट हो चुकी है और वर्तमान इकाई भी अंदर ही अंदर बँटी हुई है। जोर-आज़माइश की एक वजह ये अनुमान भी है कि आप पंजाब चुनाव में एकतरफा तौर पर जीतने जा रही है। उसे 117 में से सौ से भी ज़्यादा सीटें मिलने की भविष्यवाणियाँ की जा रही हैं। ऐसे में सत्ता में आने की संभावना ने अभी से घमासान मचा दिया हो तो किं आश्चर्यम्।

ये भी देखने वाली बात है कि सिद्धू को इस्तीफा दिए एक पखवाड़े से ज़्यादा हो चुका है मगर अभी भी उन्होंने अपने पत्ते खोले नहीं है। पता नहीं वे किसी गुणा-भाग में लगे हुए हैं या फिर उनकी कोई दुविधा है जो उन्हें कोई फ़ैसला लेने से रोक रही है। उनकी पत्नी ने ज़रूर कहा है कि सिद्धू को न्यौता तो काँग्रेस से भी मिला हुआ है मगर वे आप की तरफ झुके हुए हैं। साफ़ है कि सिद्धू आप में जाना चाहते हैं मगर कुछ ठोस हासिल करके।
यानी मामला अब पूरी तरह से सौदेबाजी पर ही अटका है। आप नेतृत्व के सामने दो चुनौतियाँ हैं। पहली चुनौती ये है कि वह कैसे पार्टी के अंदर किसी तरह का असंतोष न पैदा होने दे अन्यथा उसका बना-बनाया खेल बिगड़ सकता है। दूसरी ओर, सिद्धू के सामने आत्मसमर्पण न करते हुए उन्हें साथ भी लाना है क्योकि चुनाव जीतने के लिहाज से एक लुभाऊ चेहरे हैं।



सिद्धू को भी दुविधा से उबरकर तुरंत फैसला लेना होगा। अगर वे ज़्यादा ज़िद करेंगे तो बहुत मुमकिन है कि वे कहीं के न रहें या उन्हें ऐसी पार्टी का दामन थामना पड़े जिसकी जीत की संभावनाएं बहुत कम हैं। ज़्यादा हठ करने का एक नतीजा ये भी हो सकता है कि वे आप में शामिल तो हो जाएं मगर उन्हें पार्टी कार्यकर्ताओं का सहयोग ही न मिले।

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