न मीडिया पवित्र-स्थली है न राजनीति बदनाम गली


क्या किसी पत्रकार का राजनीति में आना गुनाह है? क्या ये उसका लोकतांत्रिक अधिकार नहीं है कि वह राजनीति में हिस्सा ले, चुनाव लड़े और अगर मौक़ा मिले तो सरकार में भी शामिल हो? ज़ाहिर है कि जब दूसरे क्षेत्रों के लोग ऐसा कर सकते हैं तो पत्रकारों को भी ये हक़ है। फिर क्या वजह है कि एमजे अकबर के केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होने पर पहाड़ टूट पड़ा और पत्रकार बिरादरी हाय-हाय करते हुए छाती पीटने लगी? वैसे भी वे पहले पत्रकार तो नहीं हैं जो पत्रकारिता की गलियों से गुज़रते हुए राजनीति के राजमार्ग पर पहुँचे हैं या उनके जैसी अवसरवादिता पहले किसी ने नहीं दिखाई और ये भी तय है कि वे अंतिम व्यक्ति नहीं होंगे। ऐसे में सवाल उठना लाज़िमी है कि फिर उन्हीं से तकलीफ़ क्यों और आज ही क्यों? राजनीति में तो वे बहुत पहले क़दम रख चुके थे। काँग्रेस की ओर से संसद भी पहुँच चुके थे। क्या तब उन्होंने पत्रकारिता के साथ कथित बेवफाई नहीं की थी?

M-J-Akbar-Ravish-Kumar-deshkaal
ये सही है कि जब एक ऐसा पत्रकार पलटी मारता है जो सांप्रदायिकता के खिलाफ़ झंडा उठाए घूमता रहा हो और जिसने गुजरात दंगों पर उसी शख्स की भूमिका के खिलाफ़ बेहद तीखेपन के साथ लिखा हो जिसके मंत्रिमंडल में शामिल होने में उसने कोई लाज-शरम नहीं दिखाई तो दुख एवं क्षोभ होता है। ये बेहद अनैतिक और घनघोर अवसरवाद तो है ही, एक तरह से उनके साथ गद्दारी भी है जो उन्हें उनके पत्रकारीय कौशल के अलावा धर्मनिरपेक्षता के प्रति उनकी कटिबद्धता की वजह से भी मानते-सराहते रहे थे। लेकिन यहाँ पत्रकारिता का मामला कहाँ से आ गया और वह भी आज इस वक़्त? वे पिछले कई वर्षों से राजनीति में हैं और यही उनकी असली पहचान बन गई है। तेज़तर्रार पत्रकार वाली छवि कब की खंडित हो चुकी थी और अगर इसके बाद भी वे पत्रकार बने रहे तो उसे किसी ने गंभीरता से नहीं लिया। वे एक व्यवसायी के रूप में ज़्यादा जाने गए और इस तरह से उन्होने धन भी खूब कमाया। ये तथ्य है कि वे मोदी मंत्रिमंडल में सर्वाधिक धनी व्यक्तियों में से एक हैं।


एनडीटीवी के एंकर रवीश कुमार का अपना दर्द हो सकता है। अंधराष्ट्रावादियों, मोदी-भक्तों और हिंदू कट्टरपंथियों ने उन्हें निशाना बना रखा है और सारी मर्यादाओं को लाँघते हुए उनके लिए भद्दी गालियों का इस्तेमाल किया है। यहां तक कि उनके चरित्र पर उँगलियाँ उठाईं और उनके परिजनों को भी नहीं बख्शा। लेकिन जब वे अपनी पीड़ा को केवल अकबर से जोड़ देते हैं तो तर्कसंगत नहीं लगता। तर्कसंगत इसलिए भी नहीं लगता कि उन्होंने इसके लिए उसी पत्रकार को चुना जो उनकी विरोधी विचारधारा वाले राजनीतिक दल का था। इसीलिए इसमें उनके पूर्वाग्रहों को देखा गया। चिट्ठी के लिए उन्हें वाहवाही तो खूब मिली, मिलनी भी चाहिए थी क्योंकि उन्होंने सवाल सही उठाए और मौजूदा माहौल के हिसाब से इसके लिए अतिरिक्त साहस भी दिखाया। लेकिन इसे सही परिप्रक्ष्य में सही संदर्भों के साथ न देख पाने की चूक उनसे हुई, जिस पर तालियाँ पीटने वालों ने ग़ौर ही नहीं किया। वे चिट्ठी में बहती भावुकता में बह गए।

इस चिट्ठी प्रकरण और अकबर पर लानतें भेजने वाले प्रसंग से एक तस्वीर ये उभरती है कि मीडिया एक पवित्र स्थली है और राजनीति बदनाम गली। यानी अकबर जब तक पत्रकार थे देवता थे, मगर राजनीति में जाते ही उनका महापतन हो गया वे खलनायक बन गए। हम सब जानते हैं कि सारे पत्रकार पाक-साफ़ नहीं हैं और राजनीति में भी सब दलाल और भ्रष्ट नहीं हैं। जिंदल मामले में सुधीर चौधरी का नाम भले ही प्रमाणों के साथ सबके सामने आ गया हो, मगर मीडिया में ढेरों लोग यही काम कर रहे हैं। राडिया मामले में वीर संघवी, प्रभु चावला, बरखा दत्त आदि के नाम तो उछले ही थे। हमें ये भी नहीं भूलना चाहिए कि पिछले दो दशकों में मालिकों और कार्पोरेट की दलाली करने की नई संस्कृति भी पत्रकारिता में खूब पुष्पित-पल्लवित हुई है। बहुत से पत्रकार इसके ज़रिए मालामाल हुए हैं, उन्होंने अपने चैनल तथा अख़बार शुरू कर दिए हैं। इसलिए ये मिथ अब टूटना चाहिए कि मीडिया में हैं तो साधु और राजनीति में चले गए तो शैतान हो गए।



दूसरी बात ये ध्यान में रखने की है कि मीडिया भी राजनीति का ही हिस्सा है। वह कोई स्वतंत्र टापू नहीं है जहाँ राजनीति कंटेंट को किसी भी तरह से प्रभावित या प्रदूषित नहीं करती। वास्तविकता तो ये है कि मीडिया उद्योग उसी राजनीति का हिस्सा है जो व्यवस्था को संचालित करती है। बहुत से लोग इस बड़ी सचाई को भूलकर दलगत राजनीति के संदर्भ में ही मीडिया की स्वतंत्रता एवं निष्पक्षता का आकलन करने की नासमझी करते हैं। लेकिन अगर दलगत राजनीति के संदर्भ में ही देखना हो तो ये भी एक जगज़ाहिर तथ्य है कि हर मीडिया संस्थान की अपनी राजनीतिक नीति होती है और वह उसी के आधार पर चलता है। इसीलिए ज़ी न्यूज़ और इंडिया टीवी बीजेपी के चैनलों के रूप में पहचाने जाते हैं। कुछ मीडिया संस्थान सत्ता प्रतिष्ठान से दोस्ती का खुलकर इज़हार नहीं करते और संतुलन का नाटक करके अपनी साख बनाते हैं।

न मीडिया पवित्र-स्थली है न राजनीति बदनाम गली


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