दलितों के लिए मुख्यधारा का मीडिया एक बड़ी चुनौती


पंद्रह अगस्त को देश में एक बड़ी घटना घट रही थी मगर मीडिया का ध्यान उस पर नहीं था। उसके सारे साधन-संसाधन छब्बीस जनवरी की परेड और लाल क़िले की प्राचीर से होने वाले प्रधानमंत्री के संबोधन पर लगे हुए थे। इसके बाद वह भाषण के मुख्य अंशों में उलझ गया। बलूचिस्तान के बहाने पाकिस्तान को लपटने पर वह लहालोट हो गया और गुलाटियाँ खाते हुए खुशी मनाने लगा। मोदी की जय-जय करने में जुट गया। उसे उस बड़ी घटना से कोई मतलब नहीं था, क्योंकि उसके सरोकार दूसरे थे, उसका वर्ग-चरित्र उसे इसकी इजाज़त नहीं दे ऱहा था।

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ये घटना थी गुजरात में अहमदाबाद से उना तक दलितों का ऐतिहासिक अस्मिता मार्च। हज़ारों की तादाद में दलित उना पहुँचे। उन्होंने ऊँची जातियों के आतंक का साहस के साथ विरोध किया और संकल्प किया कि तब तक उनकी माँगें पूरी नहीं होंगी वे संघर्ष जारी रखेंगे। मीडिया को इसमें अभूतपूर्व और ऐतिहासिक जैसा कुछ नहीं दिखा, जैसा कि वे प्रधानमंत्री के भाषण में देखने की कोशिश कर रहे थे।




हालाँकि हर लिहाज़ से ये ऐतिहासिक था। अव्वल तो अरसे बाद हिंदू समाज के भीतर जातिवादी वर्चस्व के खिलाफ़ इतने संगठित ढंग से आवाज़ उठी। दूसरे, ये ऐसे समय उठी जब ऊँची जातियाँ हिंदुत्व के नाम पर उन्हें एक करके सत्ता पर अपनी पकड़ मज़बूत करने में जुटी हुई हैं। तीसरे, ये सब उस राज्य में हो रहा था जहाँ संघ की प्रयोगशाला चलाई जा रही है, तरह-तरह के जातीय-सामाजिक गठबंधन आज़माए जा रहे हैं। चौथे, दलितों का ये आंदोलन उस नेता के प्रदेश में हो रहा है जो देश का प्रधानमंत्री यही कहकर बना था कि उसके गुजरात मॉडल में सब कुछ चकाचक है, सब जाति-धर्म के लोग खुशहाल हैं।

वैसे मीडिया ने अगर इस बहुत बड़ी घटना को नज़रअंदाज़ कर दिया तो ये कोई नई बात भी नहीं थी। वह जिनकी सेवा में लगा है, उनके हित इस तरह के कवरेज से सधते नहीं बिगड़ते हैं। ये उसकी अघोषित नीति है जिससे वह खबरों को सेंसर करता है। उसके नियंताओं ने जो हिदायतें उसे दी हैं, वह उनके पार नहीं जाता, जा भी नहीं सकता। ये और बात है कि सोशल मीडिया ने दलित मार्च पर इतना काम किया कि मुख्यधारा के मीडिया को थोड़ी-बहुत ही सही उसकी भी सुध लेनी पड़ गई, वह उसे दबा या निगल नहीं पाया।

दरअसल, किसी भी पूँजीवादी लोकतंत्र में व्यवस्था का नियंत्रण उनके हाथ में होता है जिनके हाथ में पूँजी होती है। ये एक अलिखित नियम की तरह है कि जिसके पास जितनी पूँजी होती है, वह उतना ताक़तवर होता है और उसी शक्ति के बल पर वह व्यवस्था के विभिन्न पक्षों में अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित करता है, उसे अपने हिसाब से चलाता है।

मीडिया के साथ भी यही है। वह भी पूँजी के खेल में शामिल है बल्कि ये कहना ज़्यादा ठीक होगा कि पूँजी से नियंत्रित एवं संचालित होता है। इसीलिए वह उनकी उपेक्षा करता है जिनके पास धनशक्ति नहीं है और उनके चरणों में लोटने लगता है जो किसी भी रूप में उसकी पूँजी का विस्तार कर सकता है। इसीलिए वह सरकार से लेकर विज्ञापनदाताओं तक हर किसी को अपना ख़ुदा मानकर चलता है।




दर्शकों को भी वह इसी नज़रिए से देखता है। वह उनकी क्रयशक्ति के आधार पर उपयोगिता और महत्व निर्धारित करता है। यानी जिन दर्शकों के पास खरीदने की क्षमता ज़्यादा है, उनकी ख़बरों, रुचियों और सरोकारों को ज़्यादा महत्व देता है। ऐसे में ये स्वाभाविक है कि वे लोग छूट जाएं जो किसी भी तरह से उसके उद्देश्यों में सहायक नहीं हो सकते। मीडिया का यही मॉडल है जो वंचितों एवं शोषितों को हाशिए पर रखता है।

हाँ, कभी-कभी हमारा मीडिया ये आभास देने की कोशिश करता है कि वह जन-दबाव की चिंता भी करता है, जनशक्ति का खयाल रखता है। कई बारगी ऐसा दिखने लगता है कि वह सत्ता, यहाँ तक कि व्यवस्था के खिलाफ़ खड़ा है, बड़े पूँजीपतियों तक से लोहा लेने की हिम्मत दिखा रहा है। लेकिन वास्तविकता यही होती है कि वह लोकशक्ति का इस्तेमाल अपनी वैधता बढ़ाने के लिए करता है, विश्वसनीयता को कायम करने के लिए करता है। लेकिन ऐसा करते समय भी वह उस सीमा के अंदर ही रहता है, जिससे उसके स्वामित्व का और उस वर्ग का किसी भी तरह से अहित न हो जो उसका नियंता भी है, पोषक भी।

लोकतंत्र में जनशक्ति की महिमा का गान बहुत होता है, मगर हक़ीक़त यही है कि उसे भी एक दायरे के अंदर रहने की छूट दी जाती है। जैसे ही वह उससे बाहर निकलती है, उस पर लोकंतत्र विरोधी, देशद्रोही, असामाजिक, हिंसक आदि के लेबल चस्पाँ करके बदनाम कर दिया जाता है और फिर दमनकारी उपायों से दबा भी दिया जाता है। इसीलिए मीडिया के उस हिस्से को अक्सर शासन-प्रशासन का कोपभाजन बनना पड़ता है जो शासक वर्ग की इच्छाओं के विरूद्ध जाने का जोखिम उठाता है।

दलितों के लिए ये मीडिया एक बड़ी चुनौती है। उनके पास धनशक्ति नहीं है। क्रयशक्ति भी नहीं है। केवल जनशक्ति है, जिसकी वजह से अभी मीडिया उस पर हमलावर नहीं हुआ है। लेकिन इतना तय है कि वह उन्हें कभी उनको उतना स्पेस नहीं देगा, जितने के वे हक़दार हैं। कभी वह उनकी बातों को उतनी तवज्जो नहीं देगा और एक समय आएगा जब सत्ता के इशारों पर उन्हें बदनाम करने से भी नहीं चूकेगा। इसलिए आंदोलनकारियों को इस चुनौती से निपटने की रणनीति बनानी होगी, अन्यथा उनकी मात तय है।

दलितों के लिए मुख्यधारा का मीडिया एक बड़ी चुनौती
Themainstream media is a huge challenge for Dalits

Neither media is a sacred place nor politics is infamous area




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