नाकाम शिवराज की नाकामी की तस्वीर


होमगार्ड के जवानों की गोद में बैठकर नाला पार करते शिवराज सिंह चौहान की तस्वीर ने बारिश और बाढ़ के बहाने ही पूरे देश की जनता को मध्यप्रदेश की बदहाली पर ध्यान देने का मौका दिया है। यह इसलिए भी ज़रूरी था कि राष्ट्रीय मीडिया को मध्यप्रदेश की बदहाली के बारे में कुछ कहने की जरूरत बहुत कम ही महसूस होती है।

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शिवराज सिंह 29 नवंबर 2005 को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे और तब से लेकर अब तक करीब साढ़े 11 साल से वे लगातार मुख्यमंत्री हैं। 2008 और 2013 के चुनाव उनकी सरकार रहते ही भाजपा ने मध्य प्रदेश में जीते, लेकिन विकास की दृष्टि से उनका पूरा कार्यकाल निहायत ही असफल साबित हुआ है। वैसे असफलता से ज्यादा अकर्मण्यता कहा जाना चाहिए और इस अकर्मण्यता का सिलसिला 8 दिसंबर 2003 से प्रदेश में उमा भारती के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनने से ही शुरू हो गया था। 23 अगस्त 2004 को उमा की जगह बाबूलाल गौर भी मुख्यमंत्री बने लेकिन प्रदेश की स्थिति के बदतर होते जाने का सिलसिला थमा नहीं।



हैरानी की बात है कि मध्य प्रदेश की जनता शिवराज और भाजपा की हर तरह की असफलता को झेलते हुए क्यों लगातार तीन-तीन बार जिताती जा रही है। राजनीतिक सफलता-असफलता और सरकारों के कामकाज के बीच किसी तरह का अंतर्संबंध अगर होता है तो उसे समझने के लिए मध्य प्रदेश को लेकर ज़रूर शोध करने की ज़रूरत है। ऐसे शोध होते भी हैं, और ऐसे विषयों पर किताबें आती भी हैं, लेकिन उनका फोकस मध्य प्रदेश पर नहीं, अन्य राज्यों पर होता है।

मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार की असफलता कम से कम उन मुद्दों पर तो परखी ही जानी चाहिए जिन मुद्दों पर अन्य राज्यों या अन्य दलों की सरकारों को दिन-रात कोसा जाता है और जंगल राज जैसे जुमले गढ़े जाते हैं। ऐसा करना इसलिए भी उचित होगा क्योंकि भाजपा 2003 में विकास के मुद्दे पर ही जीतने का दावा करती रही है।

बिजली, पानी, सड़क के इन मुद्दों में कानून और व्यवस्था का एक मुद्दा और भी जोड़ा जाना ज़रूरी है क्योंकि अन्य दलों की सरकारों में भाजपा इसी मुद्दे पर सबसे ज्यादा ज़ोर देती रही है। सोशल मीडिया की बदौलत यह तथ्य छिपा नहीं रहा है कि आबादी के लिहाज से उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र से कहीं छोटा होने के बावजूद, हर तरह के अपराधों में मध्य प्रदेश ही सबसे आगे है। इस बारे में कभी शिवराज सरकार को मीडिया ने भी कभी नहीं घेरा और प्रदेश की बदहाली के बराबरी से जिम्मेदार रही कांग्रेस तो इस मुद्दे को उठाने लायक रही ही नहीं।



नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़े पिछले कई सालों से बताते आ रहे हैं कि मध्य प्रदेश में हत्याएँ सबसे ज्यादा होती हैं, बलात्कार सबसे ज्यादा होते हैं, महिलाओं और लड़कियों के गायब होने की घटनाएँ सबसे ज्यादा होती हैं। अन्य राज्यों की तुलना में ये अंतर मामूली ज्यादा नहीं है, कि भाजपा इसको अपराध दर्ज किए जाने की प्रवृत्ति कहकर बच निकले। इसके बावजूद खराब कानून-व्यवस्था के लिए मध्य प्रदेश को शायद ही कभी याद किया जाता है।

व्यापम घोटाले ने कितनी पीढ़ियों का भविष्य चौपट किया और प्रतिभाओं का कितना हनन किया, इसकी तुलना किसी अन्य घोटाले से नहीं की जा सकती। थोड़े हो-हल्ले के बाद अब मामला शांत है और ऐसा लगता है कि शिवराज ये झटका सहन कर गए हैं। व्यापम से जुड़े लोगों की सिलसिलेवार हत्याएँ होती रहीं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर इनकी चर्चा तभी हुई जब पत्रकार अक्षय कुमार की संदिग्ध मौत हुई। उसके बाद दो-चार हत्याओं को और सुर्खियों में जगह मिली तथा उसके बाद मान लिया गया कि व्यापम और इससे जुड़ी हत्याओं को इससे ज्यादा मुद्दा बनाना भाजपा के प्रति अन्याय होगा।

किसानों की और खेतिहर मजदूरों की बदहाली का भी ऐसा ही मुद्दा है। पिछले कई सालों से प्रदेश में बाढ़ का भी प्रकोप होता है और सूखे का भी। कई भयावह खबरें भी आती हैं, लेकिन वो अखबारों के जिला संस्करणों के अंदर के पन्नों तक ही सिमटकर रह जाती हैं। किसानों की आत्महत्याओं की खबरों के बारे में भी यही चलन है कि अगर घटना म.प्र. की है, तो उसे महत्व नहीं देना है। पिछले चार-चार साल से किसानों को दिया जाने वाला मुआवज़ा लंबित है, लेकिन ये कोई मुद्दा बनता ही नहीं।

मजदूरों का पलायन तो लगातार चलने वाला ऐसा सिलसिला हो गया है जो पिछले कई सालों से जारी है और निरंतर तेज भी होता जा रहा है। दिल्ली और इसके आसपास चलने वाले निर्माण कार्यों में लगे मजदूर अब बिहार के नहीं, बुंदेलखंटड के ज्यादा मिलने लगे हैं। न तो मनरेगा का कोई काम दिखता है और न ही मजदूरों को और किसी तरह की राहत। मनरेगा के तहत बने पुल और बांध अगली ही बारिश में ढहने की कई खबरें आईं लेकिन नेशनल मीडिया तक नहीं पहुँचीं।



अटल ज्योति योजना के तहत चौबीस घंटों बिजली देने की बहुप्रचारित योजना में मंदसौर और कई जगह ऐसा हुआ कि जिस दिन मुख्यमंत्री ने योजना का शुभारंभ किया उसी के अगले दिन खंभे तक उखड़ गए। अन्य प्रदेशों में ऐसा हुआ होता तो भ्रष्टाचार और झूठ की राजनीति का नया अध्याय लिखा जा चुका होता और संबंधित सरकारों पर इतना बड़ा कलंक लगता कि दशकों तक नहीं धुलता।

अभी हाल की बारिश और बाढ़ से प्रदेश के बुंदेलखंड और कई अन्य जिलों में बेहद तबाही हुई है, लेकिन इन्हें महज एक हादसा और प्राकृतिक आपदा की तरह लिया जा रहा है। इस बात को शायद ही किसी ने रेखांकित किया हो कि ऐसी स्थिति जब हर साल बनती है तो सरकार ने उपायों के नाम पर क्या किया।

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 सुस्त और पस्त कांग्रेस और भ्रष्टाचार में डूबी निकम्मी सरकार के बीच मध्य प्रदेश की जनता भी अपनी बदहाली को अपनी नियति मानकर बैठ गई है। जन समस्याओं को लेकर पहले भी मध्य प्रदेश में उग्र आंदोलनों की कोई बहुत ज्यादा परंपरा नहीं रही है, लेकिन अब किसी कारगर विपक्ष के अभाव में तो जनता का ही नहीं, सामाजिक संगठनों का भी ध्यान इस ओर नहीं जाता।

Written by-महेंद्र नारायण सिंह

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नाकाम शिवराज की नाकामी की तस्वीर
Failure photo of shivraj singh chouhan failure


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