मोदी सरकार लगातार यह ढिंढोरा पीटती रहती है कि भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। यह एक ऐसा नैरेटिव बनाता है जिससे लगता है मानो भारत ने आर्थिक विकास में दुनिया भर के देशों को पछाड़ दिया हो। लेकिन क्या यह दावा जीडीपी वृद्धि के headline प्रतिशत से आगे की पड़ताल में खरा उतरता है? जब हम अन्य महत्वपूर्ण आर्थिक संकेतकों की जांच करते हैं तो तस्वीर क्या कहती है? यह लेख 2020 से 2025 तक के आंकड़ों का विश्लेषण करेगा ताकि इस दावे के पीछे की हकीकत को उजागर किया जा सके।
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1. प्रतिशत का दावा और उस पर संदेह
सरकार का नैरेटिव इस बात पर आधारित है कि भारत की अर्थव्यवस्था 6.5% से 7.5% की दर से बढ़ रही है, जो चीन (4-5%) और अमेरिका (2-2.5%) की तुलना में अधिक है। इसी जीडीपी ग्रोथ रेट के आधार पर "सबसे तेज़" होने का दावा किया जाता है।
हालाँकि, कई अर्थशास्त्री इन सरकारी आंकड़ों पर संदेह जताते हैं। उनका मानना है कि वास्तविक विकास दर लगभग 4% के करीब है, न कि वह जो दावा किया जा रहा है। समस्या यह है कि IMF जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं भी अक्सर अपने अनुमानों के लिए इन्हीं सरकारी आंकड़ों को आधार मान लेती हैं। लेकिन अगर हम अर्थशास्त्रियों की बात मानें और भारत की विकास दर 4% के करीब मान भी लें, तो भी भारत सिर्फ अमेरिका से ही आगे रहता है; चीन तब भी उससे आगे निकल जाता है। यह समझने के लिए कि कौन वास्तव में सबसे तेज़ी से बढ़ रहा है, हमें केवल प्रतिशत पर नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था में जोड़े गए कुल मूल्य (absolute value) पर भी ध्यान देना होगा।

Fastest-Growing Economy or Just a Narrative?
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2. असल बढ़त का हिसाब: 5 सालों में किसने जोड़े कितने खरब डॉलर?
अर्थव्यवस्था की वास्तविक वृद्धि को मापने का एक सीधा तरीका यह देखना है कि 2020 और 2025 के बीच अमेरिकी डॉलर में अर्थव्यवस्था के आकार में कुल कितनी वृद्धि हुई। आइए इन पांच वर्षों के आंकड़ों को देखें:
अमेरिका (USA): अर्थव्यवस्था में $9.2 ट्रिलियन डॉलर की वृद्धि हुई (जो $21.4 ट्रिलियन से बढ़कर $30.6 ट्रिलियन हो गई)।
चीन (China): अर्थव्यवस्था में $4.7 ट्रिलियन डॉलर की वृद्धि हुई (जो $14.7 ट्रिलियन से बढ़कर $19.4 ट्रिलियन हो गई)।
भारत (India): अर्थव्यवस्था में $1.5 ट्रिलियन डॉलर की वृद्धि हुई (जो $2.7 ट्रिलियन से बढ़कर $4.2 ट्रिलियन हो गई)।
ये आंकड़े स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि कुल वृद्धि के मामले में, अमेरिका पहले स्थान पर, चीन दूसरे और भारत तीसरे स्थान पर है। यह "सबसे तेज़ बढ़ती अर्थव्यवस्था" के नैरेटिव का सीधे तौर पर खंडन करता है।
कहाँ 1.5 ट्रिलियन डॉलर भारत ने जोड़े और कहाँ अमेरिका ने 9.2 ट्रिलियन डॉलर... यह तीन आंकड़े आपके सामने हैं। इनके आधार पर आप क्या निष्कर्ष निकालेंगे इन पांच वर्षों में फास्टेस्ट ग्रोइंग इकॉनमी कौन सी रही है?
यह ध्यान रखना भी महत्वपूर्ण है कि भारत के 4.2 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था के आकार को भी IMF सहित तमाम अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां संदिग्ध मानती हैं। कई विश्वसनीय अर्थशास्त्रियों के अनुसार, भारत की अर्थव्यवस्था का वास्तविक आकार केवल **2.5 से $3 ट्रिलियन डॉलर** के बीच है, जिसका अर्थ है कि आधिकारिक आंकड़े बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए हैं।
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3. खरीदने की क्षमता (PPP) का पैमाना: यहाँ भी कहानी वही है
अर्थव्यवस्थाओं की तुलना करने का एक और पैमाना परचेजिंग पावर पैरिटी (PPP) है, जो विभिन्न देशों में कीमतों के अंतर को समायोजित करता है। यदि हम इसी पांच साल की अवधि में PPP के संदर्भ में जोड़ी गई कुल वैल्यू को देखें, तो परिणाम पूरी तस्वीर सामने रख देते हैं:
चीन (China): लगभग $17 ट्रिलियन डॉलर जोड़े।
अमेरिका (USA): $9 से $10 ट्रिलियन डॉलर जोड़े।
भारत (India): $8 से $9 ट्रिलियन डॉलर जोड़े।
PPP के आंकड़े इस कहानी को और भी स्पष्ट कर देते हैं: इन पांच सालों में चीन ने भारत से लगभग दोगुनी रफ़्तार से अपनी अर्थव्यवस्था में मूल्य जोड़ा, जिससे वह निर्विवाद रूप से पहले स्थान पर है। अमेरिका दूसरे स्थान पर है, और भारत एक बार फिर तीसरे स्थान पर आता है। यह विश्लेषण इस तर्क को और मज़बूत करता है कि केवल प्रतिशत के आधार पर किया गया दावा भ्रामक है।
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आंकड़ों की बाजीगरी
संक्षेप में, जबकि सरकार एक जीडीपी प्रतिशत के आंकड़े के आधार पर "सबसे तेज़ बढ़ती अर्थव्यवस्था" के नैरेटिव को बढ़ावा देती है, डॉलर के संदर्भ में कुल वृद्धि और परचेजिंग पावर पैरिटी (PPP) के आंकड़ों की एक गहरी जाँच से पता चलता है कि भारत वास्तव में अमेरिका और चीन के बाद तीसरे स्थान पर है।
यह "आंकड़ों की बाजीगरी" का एक क्लासिक उदाहरण है, जहां एक नैरेटिव बनाने के लिए एक विशेष, अनुकूल मीट्रिक को चुना जाता है, जबकि अन्य महत्वपूर्ण संकेतक एक अलग कहानी बताते हैं।
तो अगली बार जब आप 'सबसे तेज़ बढ़ती अर्थव्यवस्था' का नारा सुनें, तो क्या आप सिर्फ़ प्रतिशत पर ध्यान देंगे, या उसके पीछे छिपे खरबों डॉलर का हिसाब भी पूछेंगे?