कौन भर रहा है स्विस बैंक की तिजोड़ियाँ और क्यों सोया हुआ है चौकीदार?


मोदी सरकार ये कहते हुए सत्ता में आई थी कि वह विदेशों में जमा काला धन वापस लाएगी, मगर अभी तक इसके एक भी संकेत नहीं मिल रहे। उल्टे विदेशी बैंकों में धन जमा करने की रफ़्तार तेज़ होती जा रही है।
स्विस बैंक में भारतीयों द्वारा धन जमा करने में पचास फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई है और ये इस बात का प्रमाण है कि सरकार गाल चाहे कितने ही बजाय मगर हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं।

ध्यान देने की बात ये है कि स्विस बैंक ने काला धन जमा होने के मामले में भारत सरकार से सूचना साझा करने का सिलसिला पिछले दो साल से चला रखा है। स्विस संसद का रुख़ भी इस मुद्दे पर कड़ा है। मगर इसके बावजूद सरकार लगाम लगा पाने में नाकाम साबित हो रही है।

साफ़ है कि न खाऊँगा, न खाने दूँगा भी एक चुनावी जुमला साबित हो रहा है। भारतीय खज़ाने की चौकीदारी करने का दम भरने वाला या तो सोया हुआ है या फिर काले धन वालों के साथ उसकी मिलीभगत चल रही है।
काले धन पर मुहिम चलाने वाले  स्वयंभू बाबा रामदेव ने तो ज़ुबान बंद ही कर रखी है। उन्हें अब विदेशों में जमा धन से ज़्यादा चिंता शैम्पू और मंजन बेचने की सता रही है। उन्हें तो अब महँगाई की चिंता भी नहीं सता रही और रूपए की क़ीमत में असाधारण गिरावट तो नज़र ही नहीं आ रही।




प्रधानमंत्री और सत्तारूढ़ दल के नेता बार-बार ये दोहराते हैं कि भ्रष्टाचार का कोई आरोप बीते चार सालों में नहीं लगा है। लेकिन असलियत ये है कि सब कुछ पहले जैसा ही चल रहा है, बस भ्रष्टाचार को छिपाने के उन्होंने पुख्ता इंतज़ाम कर रखे हैं।

उनकी सीधी सी रणनीति यही है कि भ्रष्टाचार की ख़बरें ही न बनने दो। इसीलिए उन्होंने न लोकपाल बनने दिया और न हीं लोकायुक्त नियुक्त करने पर ज़ोर डाला।

भ्रष्टाचार वाली जगहों की नाकेबंदी कर दी गई है। ऐसी जगहों पर पत्रकारों की आवाजाही पर रोक लगा दी गई है और अधिकारियों को बात करने से मना कर दिया गया है। यहाँ तक कि मंत्रीगण भी मीडिया से नहीं मिलते।
इस बीच भ्रष्टाचार करने वाले सरकार समर्थक कई कारोबारी विदेश भाग गए या उन्हें सुनियोजित तरीक़े से भगा दिया गया। भ्रष्टाचार पर परदा डालने की एक ये भी चाल थी। भ्रष्टाचार की कुछ ख़बरें उजागर हुईं तो उन्हें दबा दिया गया।

अमित साह के बेटे का मामला हो या फिर नोटबंदी में उनकी अध्यक्षता वाला कोआपरेटिव बैंक के घोटाले का, सच पर काला परदा ओढ़ा दिया गया है। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान सरकार के घोटालों को भी दबा ही दिया गया है।




पिछले चार साल से सरकार विदेशी बैंको में धन जमा करने वालों की सूची को जगजाहिर करने से कतरा रही है। पनामा पेपर्स के ज़रिए जो नाम सामने आए उनके ख़िलाफ़ क्या कार्रवाई हो रही है, इसकी कोई जानकारी नहीं दी जा रही। अमिताभ बच्चन के खाते के सारे विवरण आ चुके हैं मगर सरकार चुप है।

साफ़ है कि सरकार की कथनी और करनी में ज़मीन-आसमान का फ़र्क है। वह मीडिया को नियंत्रित करके अपनी छवि चमकाने में विश्वास करती है, न कि अपराधियों की पकड़-धकड़ और उन्हें सज़ा दिलाने में।


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Written by-डॉ. मुकेश कुमार















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