बस यही नहीं कर सका इसलिए जाना पड़ा-नजीब जंग


दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग के इस्तीफ़े पर केंद्र सरकार को छोड़कर सब हैरानी में हैं। काँग्रेस तो हैरानी में है ही कि उसके द्वारा प्यादे से वज़ीर बनाया गया जो शख्स दूसरी सेना में जा मिला था वह अचानक उससे बाहर कैसे हो गया। जंग के जानी दुश्मन अरविंद केजरीवाल भी हैरान हैं कि आख़िर ये चमत्कार हुआ कैसे। वे तो इस पर भी हैरान होंगे कि भगवान ने उनकी सुन कैसे ली। हालाँकि उनकी साँसें अभी भी अटकी हुई है क्योंकि पता नहीं सरकार अब किसको बैठाकर क्या-क्या करवाएगी।

So had to go - najeeb-jung
दिल्ली और देश की आम जनता तो ख़ैर भौंचक है ही। उसे लग रहा है कि जो जंग इतनी निर्लज्जता से मोहरा बना हुआ हुआ था, अचानक कैसे पूरे कपड़े पहनकर और तनकर खड़ा हो गया। वह इसमें भी कोई डील देख रही है। जंग साहब की इस कैफ़ियत पर कोई भरोसा करने को तैयार है ही नहीं कि वे अकादमिक दुनिया में लौटना चाहते हैं या परिवार के साथ वक़्त बिताना चाहते हैं। उसे लगता है कि अगर ऐसा था तो उन्हें तो कब का चले जाना चाहिए था।

मेरे पिछले एनकाउंटर से दुखी और नाराज़ नजीब जंग ने पहले तो बात करने से ही मना कर दिया। फिर जब तीन-चार बार फोन किया और समझाया-बुझाया तो बमुश्किल राज़ी हुए, वह भी इस शर्त पर कि मोदी और केजरीवाल का भी तीखा एनकाउंटर करोगे। मैंने हाँ भर दी। क्या करें पत्रकारों को झूठी हामियाँ भी भरनी पड़ती हैं। आख़िर एनकाउंटर कोई मोदीजी का फिक्स इंटरव्यू तो है नहीं कि अर्नब या राहुल की तरह पहुंच गए लेने। बहरहाल, चाय-पानी के बाद फायरिंग शुरू हुई।

नजीब साहब, आज की तारीख़ में लाख टके का सवाल तो यही है कि आपने इस्तीफ़ा दिया क्यों? आपने जो कारण बताए हैं उनसे कोई राज़ी नहीं है। सबको लग रहा है कि परदे के पीछे ज़रूर कुछ हुआ है। 
देखिए, जो परदे के पीछे हुआ है उसे परदे में ही रहने दीजिए, परदा न उठाइए, क्योंकि भेद खुल जाएगा और भेद खुल जाएगा तो भूकम्प आ जाएगा।

ये भूकम्प वाला मुहावरा राहुल गाँधी के लिए छोड़ दीजिए और बताइए कि आपने ऐसा कर डाला जिसमें भूकम्प लाने की गुंज़ाइश हो?
अभी सही वक़्त नहीं आया है ये बतने का। इंतज़ार कीजिए मैं इसका परदाफ़ाश ज़रूर करूँगा, मगर सही वक़्त पर और सही जगह पर।

सही वक़्त से आपका क्या मतलब है? क्या ये वक्त इसलिए मुनासिब नहीं लग रहा क्योंकि आपको सरकार से कुछ और की उम्मीद है?
उम्मीदों पर तो आसमान टिका हुआ है और ग़ालिब तो कह ही गए हैं कि हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पर दम निकले। मगर वजह इससे कहीं बड़ी है।

क्या पीएम आपसे नाराज़ थे? आपने तो उनके एजेंडे पर काम करने में किसी तरह की हीला-हवाली नहीं की। अपनी हँसी उड़वाते रहे, गालियाँ खाते रहे, मगर सरकार की कठपुतली बनने से कभी ऐतराज़ भी नहीं किया?
आप सही कह रहे हैं कि मैंने पीएम के हर निर्देश को चाहे वह संविधान सम्मत हो या न हो या उससे दिल्ली का नुकसान ही क्यों न होता हो, पूरी वफ़ादारी से माना और उस पर अमल किया।

फिर क्या हुआ? क्या भाजपाईयों को आपका अहमद पटेल और दूसरे काँग्रेसियों से मिलना रास नहीं आ रहा था और उन्होंने आपकी चुगली कर दी?
वे तो पहले ही दिन से चुगली कर रहे थे और उनका वश चलता तो मुझे एक मिनट भी राजभवन में न टिकने देते। बीजेपी और आरएसएस के कई लोग मेरी कुर्सी पर आँखें गड़ाए हुए बैठे थे और मुझे धक्का देकर बैठने की कोशिश में थे। लेकिन पीएम को लगा कि मैं उनके काम ज़्यादा अच्छे से कर सकता हूँ इसलिए उन्होंने किसी की नहीं सुनी।

फिर अब क्या हो गया? अट्ठारह महीने पहले आपकी विदाई क्यों हो गई, वह भी अचानक?
सियासत में कुछ भी अचानक नहीं होता। जो अचानक दिखता है वह भी प्रीप्लांड होता है। अचानक उन्हें लगता है जो सियासत को अंदर तक नहीं देख पा रहे होते।

चलिए मैं और तमाम लोग सियासत को नहीं समझते। अब आप ही समझाइए कि क्या हुआ और कैसे हुआ?
अब आप इतना इसरार कर रहे हैं तो बताना ही पड़ेगा। देखिए मैं तो सेंटर की सब बातें मान ही रहा था। दिल्ली सरकार को काम नहीं करने देना, मुख्यमंत्री को परेशान करना, आप के विधायकों को इधर-उधर फँसाने में गृह मंत्रालय का साथ देना, सब कुछ उसी के मुताबिक कर रहा था। मेरी तो कोई हैसियत ही नहीं थी कि अपने से कुछ करता। आप तो जानते ही हैं कि केंद्र की मर्ज़ी के बिना राज्यपाल की औकात दो टके की होती है और वह जब चाहे किसी को भी राजभवन से बाहर फेंक सकता है। तो मैं तो सब कुछ कर रहा था, मगर अब उनकी नई माँग आ गई कि दिल्ली सरकार को बर्खास्त करो, बस यही मैं नहीं कर सकता था, क्योंकि ये अति हो जाती।

आप जब सब कुछ कर रहे थे तो ये भी कर देते। इतनी सारी अतियाँ आपने कीं हैं तो एक और सही?
ये बहुत बड़ी अति हो जाती। केंद्र सरकार को तो चिंता नहीं है मगर मुझे तो है। अभी उत्तराखंड और अरूणाचल प्रदेश में जो कुछ हुआ है उसके बाद तो किसी चुनी हुई सरकार को बर्खास्त करना आसान नहीं था। फिर दिल्ली में तो कोई ऐसा संवैधानिक संकट भी नहीं था कि उसकी आड़ में ऐसा खेल कर दिया जाता।

बहाने तो ढूँढ़े जा सकते थे, गढ़े जा सकते थे और आप तो गढ़ भी रहे थे। बहुत मोटी फाइल बना रखी होगी आपने आप के गुनाहों की?
आप ठीक कह रहे हैं। मगर अभी भी वह इतनी मोटी नहीं थी कि उसके आधार पर इतना बड़ा क़दम उठाया जाता। मैने आग्रह किया था कि कुछ समय दीजिए, वह भी हो जाएगा, मगर मोदीजी जल्दी में थे। बोले ये काम करो नहीं तो मुझे किसी और से करवाना पड़ेगा।

आप ये सब बता रहे हैं लेकिन काँग्रेस तो कह रही है कि बीजेपी और आप में डील हो गई है?.
अगर डील हो गई होती तो मुझे हटना ही क्यों पड़ता? बस मेरा रोल थोड़ा बदल जाता, विलेन से करैक्टर रोल में आ जाता। लेकिन मुझे ऐसा लगता नहीं है। केजरीवाल मोदी की आखों की किरकिरी हैं, वे उन्हें फूटी आँखों नहीं देखना चाहते, इसलिए चाहते हैं कि जितनी जल्दी हो सके उन्हें निपटा दिया जाए। वे नहीं चाहते कि ख़तरा बड़ा हो। अगर आप ने पंजाब में सरकार बना ली तो उसके हौंसले और बढ़ जाएंगे और वह मोदी तथा उनकी सरकार को खिलाफ़ और भी बड़ा मोर्चा खोल देंगे। केजरीवाल भी जानते हैं कि मोदी से डील करने का मतलब है राजनीतिक हाराकीरी। इसलिए काँगेस के इस आरोप में दम नहीं है।

क्या आपको बतौर उपराज्यपाल जो कुछ किया उसका अफ़सोस है, कहीं कोई आत्मग्लानि?
देखिए अपराधबोध और आत्मग्लानि जैसी चीज़ों को अगर हम इतना गंभीरता से लेंगे तो राजनीति में नहीं रह सकते। इस तरह सोचा जाए तो मोदीजी का दिल कब का बैठ जाना चाहिए था। इमोशनल होने से कुछ नहीं हो सकता। सियासत मे कभी-कभी आपको हिस्से में डर्टी जॉब्स भी आते हैं और आपको वे करने पड़ते हैं और वे मैंने भी किए। सियासत में रहना है या सियासत से फ़ायदा लेना है तो आगे भी करने पड़ेगे और मैं करूँगा। मोदीजी या सोनियाजी जो भी भूमिका देंगे मैं उन्हें मंज़ूर करूँगा और पूरी ईमानदारी से निभाऊंगा भी। 

आपको दिल्ली सरकार और केजरीवाल का भविष्य कैसा दिखलाई पड़ रहा है?
देखिए, मैं कोई नजूमी या ज्योतिषी तो हूँ नहीं कि कोई भविष्यवाणी करूँ, मगर इतना कह सकता हूँ कि केजरीवाल बहुत जोखिम उठाते हैं और इसके फ़ायदे नुकसान दोनों हैं। या तो उनके हाथ में जो कुछ है सब चला जाएगा या फिर वे कुछ ऐसा कर गुज़रेंगे जो उन्हें बहुत ऊँचाई तक ले जा सकता है।

और मोदीजी के बारे में क्या कहेंगे?
मोदीजी बड़ा काम करना चाहते हैं, मगर कई तरह की खामियाँ उनके व्यक्तित्व में हैं। परिस्थितियों ने उन्हें असाधारण मौका दिया है और अगर वे संकुचित मानसिकता से ऊपर उठकर काम करेंगे तो निश्चय ही इतिहास में उनका नाम दर्ज हो सकता है। हालाँकि उनके व्यवहार को परखते हुए मेरे मन में ढेर सारी आशंकाएं हैं।

आपने कहा है कि आप किताब लिखेंगे। कैसी होगी वह किताब?
देखिए, अपने कार्यकाल में मैंने इस समय के दो बड़े नेताओं की लड़ाई को बहुत करीब से देखा है और इस प्रक्रिया में उनके चरित्र का भी अध्ययन करता रहा हूँ। चूँकि मैं दोनो की लड़ाई के दौरान केंद्रीय भूमिका निभा रहा था इसलिए मुझे उनके उजले और स्याह दोनों पहलुओं का पता है।

लेकिन ये किताब तभी मुकम्मल होगी जब आप उसे पूरी ईमानदारी से लिखेंगे। अगर आप लेखक के बजाय नेता बनकर लिखेंगे तो शायद न्याय नहीं कर पाएंगे?
आप सही कह रहे हैं। इसीलिए पसोपेश में भी हूँ कि लिखूँ या न लिखूँ या क्या लिखूँ और क्या छोड़ूँ। ये भी सोच रहा हूँ कि क्या इसे कुछ साल के लिए ठंडे बस्ते में रख दूँ।

अभी लिखिए, क्योंकि उसका उद्देश्य तो तभी पूरा होगा। बाद में तो एक कहानी बनकर रह जाएगी।
मेरे इस सुझाव पर कुछ बोलने के बजाय वे मुस्करा दिए। ये मुस्कराहट शातिराना थी, जो अकसर नेता अपने राज़ छुपाने कि ले इस्तेमाल करते हैं। मैं समझ गया कि वे राजभवन से निकलने की तैयारी करते समय भी खेल खेल रहे हैं और ये अगला काम मिलने तक जारी रहेगा।

बस यही नहीं कर सका इसलिए जाना पड़ा-नजीब जंग

Written by-डॉ. मुकेश कुमार


डॉ. मुकेश कुमार










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