प्रोपेगंडा मशीनरी से चमकता नक़ली विकास


एडोल्फ हिटलर के प्रचार मंत्री गोएबल्स ने सही कहा था कि अगर एक झूठ को सौ बार दोहराया जाए तो वह सच माना जाने लगता है। प्रोपेगंडा का ये बुनियादी सिद्धांत बन चुका है। हमारे राजनीतिज्ञों को इसे सीखने में थोड़ा वक़्त लगा मगर अब वे इसमें पारंगत होते जा रहे हैं। वे सीख गए हैं कि कैसे मीडिया का इस्तेमाल करके किसी झूठ को लोगों के दिमाग़ में स्थापित किया जा सकता है और अपनी तथा अपनी सरकार की छवि को कैसे चमकाया जा सकता है। बस झूठ की पैकेजिंग अच्छी होनी चाहिए और उसकी प्रस्तुति विश्वसनीय तरीकों से होनी चाहिए। बाक़ी का काम अपने आप हो जाता है।
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इस काम के लिए मीडिया सबसे कारगर शस्त्र बन गया है। मीडिया को एक बार साध लिया तो झूठ को सच या सच को झूठ बनाने में कोई मुश्किल पेश नही आती। उसे प्रोपेगंडा मशीनरी में तब्दील करने की चुनौती भर होती है। मगर अब ये उतनी बड़ी चुनौती भी नहीं रही, क्योंकि अगर सही क़ीमत मिले तो मीडिया कुछ भी करने को तैयार रहता है।


मीडिया के प्रोपेगंडा मॉडल का ये प्रयोग हम गुजरात और बिहार में खूब देख चुके हैं। मीडिया ने पहले गुजरात मॉडल को इस तरह से प्रचारित किया मानो वह किसी चमत्कार से कम नहीं हो और अगर उसे राष्ट्रीय स्तर पर लागू किया गया तो देश का कायाकल्प हो जाएगा। ये एक महाझूठ था, जिसे प्रचारित करके वहाँ के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को महिमामंडित किया गया और जिसका नतीजा उनके प्रधानमंत्री बनने के रूप में हमारे सामने आया। लेकिन हम आज जानते हैं कि गुजरात मॉडल का सच क्या है। सचाई वहाँ के मानव विकास सूचकांक में भी देखी जा सकती है और पाटीदार तथा दलित आँदोलनों में भी। अब प्रधानमंत्री के समर्थकों के अलावा किसी को भी इस बारे में कोई शक़ नहीं है कि विकास के झूठे प्रचार से पूरे मुल्क को मूर्ख बनाकर सत्ता हथियायी गई और इसमें मीडिया ने बेहद अहम् भूमिका निभाई।
इसी तरह का मीडियावी मायाजाल बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली जेडीयू-बीजेपी गठबंधन सरकार ने भी रचा था। बिहार ही नहीं पूरे देश में ऐसी छवि गढ़ दी गई कि नीतीश कुमार ने प्रदेश का कायाकल्प कर दिया है और वह तमाम विकसित राज्यों से भी तेज़ गति से तरक्की कर रहा है। फर्ज़ी आँकड़े गढ़े गए जिन्हें बिकाऊ मीडिया ने सच की तरह परोसा। किसी ने उनकी जाँच नहीं की और अगर किसी ने ऐसा करने का दुस्साहस किया भी तो उसे भारी सज़ा दी गई। चाहे प्रिंट मीडिया रहा हो या फिर न्यूज़ चैनल सबके सब नीतीश के सामने नतमस्तक थे। सरकारी आँकड़े कह रहे थे कि अपराधों में कमी नहीं आई है, मगर मीडिया को अमन-चैन दिख रहा था।
इस हथकंडे का इस्तेमाल इस समय उत्तरप्रदेश में होते देखा जा सकता है। पूरे मीडिया ने कुछ ऐसा माहौल बनाकर रख दिया है मानो अखिलेश यादव ने विकास की गंगा बहा दी हो और यूपी अब तरक्की के रास्ते पर सरपट भाग रहा हो। राष्ट्रीय माने जाने वाले चैनल तो मोटा पैसा लेकर ये काम कर रही रहे हैं, मगर क्षेत्रीय मीडिया तो पूरी तरह से समर्पित होकर इसमें जुटा हुआ है। दरअसल, दो साल पहले अखिलेश सरकार को समझ में आ गया था कि अगर मीडिया को न साधा गया तो वह नकारात्मक प्रचार के ज़रिए उसे नकारा साबित कर देगा। मीडिया ने यूपी में जंगल राज का नारा लगाना तो शुरू कर ही दिया था। इसे रोकने के लिए उन्होंने खज़ाना खोल दिया और धीरे-धीरे प्रदेश में मंगल राज कायम होने लगा। उसके इस प्रचार अभियान का ही कमाल है कि मीडिया का उपभोग करने वाले समाज को लगने लगा है कि सचमुच में यूपी में विकास हुआ है।

मीडिया की प्रोपेगंडा मशीन वाली ये भूमिका कमोबेश हर राज्य में देखी जा सकती है। जिन राज्यों में चुनाव होने वाले हैं वहाँ पर तो ख़ास तौर पर ये चल रहा है। मीडिया के लिए वहाँ ये कमाई का मौसम है। विज्ञापन ख़बरों की तरह चलाए जा रहे हैं और खूब चलाए जा रहे हैं। बुलेटिन की शक्ल में उन्हें प्रस्तुत किया जा रहा है। तथाकथित विकास के कार्यक्रम पेड हैं मगर दर्शकों को ये बताया नहीं जाता। दरअसल, क्षेत्रीय मीडिया का बिजनेस मॉडल सरकारों पर निर्भर है यानी सरकार अगर उन्हें पैसे न दें तो वे कंगाल हो जाएं। इसीलिए वे सरकारों पर दबाव बनाते हैं। यहां तक कि ब्लैकमेलिंग पर उतर जाते हैं। सरकारों के पास भी उनसे बनाकर रखने के अलावा कोई चारा नहीं होता इसलिए दोनों के बीच एक समझौता हो जाता है। इससे नुकसान होता है, आम अवाम का और लोकतंत्र का। मगर इसकी चिंता किसे है। प्रेस परिषद, एडिटर्स गिल्ड और न्यूज़ चैनलों के लिए बने संगठन सब चुपचाप इसे देखते रहते हैं।

प्रोपेगंडा मशीनरी से चमकता नक़ली विकास
Fake development is shining with the little help of propaganda machinery

Written by-डॉ. मुकेश कुमार
डॉ. मुकेश कुमार









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