एक ही झटके में खुल गई पूरी पोल-पट्टी


बस गाल बजाते रहे, एक ही झटके में खुल गई पूरी पोल-पट्टी
एक के बदले दस सिर लाने और लाहौर-इस्लामाबाद पर कब्ज़ा करने का दंभ भरने वालों की ज़ुबानें पर ताला लटक गया है। वे पाकिस्तान पर हमला तो दूर सरहद पार हल्की-फ़ुल्की सैन्य कार्रवाई करने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रहे। यही नहीं, ऐसे किसी सवाल पर वे बगलें झाँकने लगते हैं या बहाने बनाने लगते हैं।

Manohar-Parrikar-PM-Modi-exposed completely
सहयोगी पार्टी शिवसेना ने तंज़ किया है कि ये सरकार तो यूपीए सरकार से भी गई गुज़री निकली, इतने बड़े हमले के बाद भी उधेड़-बुन में लगी हुई है कि क्या करें और क्या न करें? ये प्रधानमंत्री और उनकी सरकार को चिढाने के लिए भी हो सकता है और अपनी राजनीति की धार को कायम रखने के लिए भी। मगर इसमें सचाई भी है।



ग़ौर कीजिए, पिछली सरकार की नरम नीति को सोते-जागते कोसने वालों को अब संयम और शांति से काम लेने की ज़रूरत समझ में आने लगी है। वे कूटनैतिक प्रयासों पर बल देने की बात कर रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि कूटनैतिक मोर्चे पर सक्रियता दिखाकर वे देश के सामने अपनी काबिलियत का लोहा मनवा लेंगे।

अच्छी बात है कि सत्ता में आने के बाद उन्हें एहसास हो रहा है कि ज़िम्मेदारियाँ क्या होती हैं और वे केवल गाल बजानकर पूरी नहीं की जा सकतीं। शायद उन्हें ये भी पता चल गया होगा कि युद्ध के मायने क्या होते हैं और ऐसी किसी कार्रवाई के क्या-क्या नतीजे देश को झेलने पड़ सकते हैं। लच्छेदार बातों से देश को गुमराह करके सत्ता हासिल करना एक बात है मगर ज़िम्मेदारी के साथ देश को चलाना दूसरी।

लेकिन ये समझ सरकार को देर से आई। वैसे तो सत्ता में आने के बाद ही उसके पास स्पष्ट रणनीति होनी चाहिए थी कि वह पाकिस्तान प्रेरित आतंकवाद से कैसे निपटेगी? नरेंद्र मोदी और बीजेपी के दूसरे नेताओं  ने चुनाव प्रचार के दौरान यही आभास दिया था कि वे सर्वज्ञ हैं और सत्ता सँभालते ही सब ठीक कर देंगे।

लेकिन यदि इसे चुनावी बड़बोलापन मान लिया जाए तो उन्हें सरकार बनने के बाद अपने घोषित लक्ष्यों के अनुसार कश्मीर तथा पाकिस्तान के संबंध में नीति बना लेनी चाहिए थी। मगर इसके बजाय वह दिशाहीन होकर कभी कुछ करने लगी, कभी कुछ। यहाँ तक कि पठानकोट पर हमले के बाद भी उसका रवैया नहीं बदला। यही वजह है कि उड़ी पर हुए हमले ने उसे पूरी तरह से बेनकाब कर दिया।

अब वह कह रही है कि पाकिस्तान को अलग-थलग करने के लिए विश्वव्यापी अभियान चलाएगी। ये कोई नई नीति नहीं है। पिछली सरकारें भी ऐसा करती रही हैं, मगर उन्हें ख़ास सफलता नहीं मिली। इस बार भी ज़्यादा उम्मीद करना ठीक नहीं होगा। देश अपने हित-अहित देखकर काम करते हैं। वे बयान तो जारी कर देंगे मगर इससे ज़्यादा कुछ नहीं।

अमेरिका का ही मामला ले लीजिए। उसने पाकिस्तान को चेतावनी तो दे दी है, मगर न तो वह उसे सैन्य साज-ओ-सामान की आपूर्ति रोकने वाला है और न ही आर्थिक मदद। वह उसकी सामिरक रणनीति में अहम स्थान रखता है इसलिए वह इससे आगे जाकर कुछ करेगा, ऐसा मानना खुशफ़हमी पालना होगा। नेपाल, बांग्लादेश आदि जैसे देशों का नैतिक समर्थन भी पाकिस्तान को बदलने में कोई भूमिका नहीं निभाएगा।



सैन्य तैयारियों के मामले में भी उसकी लापरवाहियाँ उजागर हो गई हैं। सुपर जासूस अजीत डोभाल और तमाम गुप्तचर एजंसियाँ हमारे सैन्य ठिकानों से जुड़ी खुफ़िया जानकारियाँ इकट्ठा करने में भी बारंबार नाकाम हो रही हैं और सुरक्षातंत्र एक के बाद एक ऐसी चूकें कर रहा है जो शर्मनाक हैं।

पठानकोट में जिस तरह से पुलिस की मदद से आतंकवादी कैंप में घुसकर हमला करने में कामयाब हुए थे, उसी से समझ जाना चाहिए था कि किस तरह की तैयारियां करनी है, मगर कुछ नही किया गया। अभी भी हाल वही है और कोई हैरत नहीं होनी चाहिए कि फिर से कोई बड़ा हमला हो जाए।

समझ से बाहर है कि जब सुरक्षा के इंतज़ाम ही नहीं हो पा रहे तो हम किस तरह हमले की बात कर रहे हैं? फौज के कमांडर साफ़ कह रहे हैं कि जल्दबाज़ी में कुछ न किया जाए, जिसका एक मतलब ये भी है कि सेना भी तैयार नही है।

वैसे भी युद्ध का विकल्प कई कारणों से आत्मघाती होगा। मुच्छड़ किस्म के फौजियों की रणगर्जना मूर्खतापूर्ण है, उसे नज़्ररअंदाज़ करना ही बेहतर होगा। अब तो कूटनैतिक स्तर पर ही कार्रवाई की जा सकती है। देर-अबेर बातचीत की मेज़ पर भी बैठना ही होगा। लिहाज़ा अब गाल बजाने से बचना चाहिए।

बस गाल बजाते रहे, एक ही झटके में खुल गई पूरी पोल-पट्टी
They got exposed completely while busy making tall claims.

Written by-कौटिल्य तावड़ेकर



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