पिंक आख़िर में बॉलीवुड की राह पर क्यों चली गई ?


शूजित सिरकार एवं रश्मि शर्मा निर्मित और अनिरुद्ध रॉय चौधरी निर्देशित फिल्म ‘पिंक’ के अब तक ढेरों रीव्यू आ चुके हैं और लगभग सभी तारीफ़ से भरे हुए हैं। फिल्म तारीफ़ के लायक भी है। एक बहुत ही मौजू और बड़ी चिंता वाले विषय को जिस संजीदगी के साथ इसमे उठाया गया है वह काबिल-ए-तारीफ़ है।

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महिलाओं के पहनने, खाने-पीने, रहन-सहन को लेकर जो धारणाएं मर्दों के समाज ने बना रखी हैं, पिंक उनके अक्श वह कैमरे से खींचकर हमारे सामने रख देती है। ज़ोरदार अभिनय, कसी हुई पटकथा और फिल्म के मूड के हिसाब से फिल्मांकन फिल्म को नई ऊँचाईयाँ दे देता है।

कहने को फिल्म मर्दों के औरतों के संबंध में सोच और व्यवहार पर केंद्रित है, लेकिन वास्तव में वह हमारे समाज का चेहरा उघाड़कर सामने रख देती है। समाज जो अमीर-ग़रीब, में बँटा हुआ है, ताक़तवरों और कमज़ोर में बँटा हुआ है, स्त्री-पुरुषों में बँटा हुआ है।

यही वजह है कि इस फिल्म को देखते हुए दर्शक इसमें खुद को भी देख रहा होता है। अगर दर्शक मर्द है तो वह अपने चरित्र की पड़ताल करने लगता है, उसे संशोधित-परिमार्जित करने लगता है। अगर वह महिला है तो वह समझने की कोशिश करती है कि मर्दों का समाज उसे किस तरह से दबाने की कोशिश करता है और उसे उससे कैसे निपटना है, उसका मुक़ाबला कैसे करना है।

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इतने गंभीर विषय पर बनी फिल्म दर्शकों को अंत तक बाँधे रखती है, ये निर्देशक की बहुत बड़ी कामयाबी मानी जानी चाहिए। इसके पहले शूजित सिरकार के निर्देशन में बनी फिल्म पीकू में बहुत सारे ऐसे प्रसंग थे जो दर्शकों को बीच-बीच में रिलीफ़ देते थे, मगर पिंक में ऐसा कुछ नहीं था। बावजूद इसके वह ऊबता नहीं हैं, हाँ लगातार विचलित जरूर होता रहता है।

इस अच्छी फिल्म की कुछ कमज़ोरियाँ भी हैं। एक बड़ी कमज़ोरी तो ये है कि अपने आख़िरी हिस्से में दूसरे कोर्ट रूम फिल्मी ड्रामों की तरह फार्मूलों की तरफ मुड़ जाती है। कानूनी लड़ाई को इस भाग में इतना हल्का और कमज़ोर बना दिया गया है कि वह दर्शकों को तो खुश कर देता है मगर फिल्म को सचाई से दूर फेंक देता है।
लड़कियों का वकील बलात्कार की कोशिश करने वाले लड़के राजवीर को बड़ी आसानी से उकसाने में कामयाब हो जाता है वह एक चमत्कार जैसा लगता है। ये भी हैरत की बात है कि जज बिना सबूत एवं गवाह के केवल  राजवीर के व्यवहार के आधार पर लड़कियों के पक्ष में फ़ैसला भी सुना देता है।

शक्तिशाली लोग जज को भी सेट करके रखते हैं, मगर यहाँ उन्होंने ऐसा भी नहीं किया। फिर निचली अदालत के फ़ैसले के बाद आगे भी कानूनी लड़ाईयाँ बाक़ी होती हैं, उनकी संभावनाओं को निर्दशक ने क्यों अनदेखा कर दिया या उनके संकेत ही क्यों नहीं दिए।

एक बड़ी खामी ये भी नोट की जा सकती है कि वकील दीपक यानी अमिताभ ने लड़की के अपहरण को अपनी आँखों से देखा और फिर ये भी देखा कि दुष्कर्म के बाद वह किस हाल में लौटकर आती है। वह पुलिस अधिकारी को भी इस बारे में सूचित करते हैं।

मगर इस महत्वपूर्ण प्रकरण को कानूनी लड़ाई से गायब ही कर दिया गया, जबकि यदि रेप के आधार पर एफआईआर की जाती तो लड़के तुरंत गिरफ़्तार होते और मामला खुद-ब-खुद लड़कियों के पक्ष में झुक जाता। होटल में ज़बर्दस्ती की कोशिश के मुक़ाबले दुष्कर्म ब्ड़ा अपराध था, मगर निर्देशक ने उसे हाशिए में डाल दिया। इसने फिल्म को लचर भी बना दिया।

अदालत की जिरह में भी कई बिंदु ऐसे हैं जिन पर अलग से बात की जा सकती है। एक तो यही कि क्या इतने लोगों के बीच में किसी लड़की पर ये बताने के लिए ज़ोर डाला जाना चाहिए कि वह वर्जिन है या नहीं और उसने किस-किस के साथ जिस्मानी रिश्ते बनाए। ये सवाल पुरूष अभियुक्तों से नहीं पूछा गया। हालाँकि इसका जवाब देना उनके लिए आसान ही होता, मगर उनकी मानसिकता का भी खुलासा होता।

फिल्म की एक बड़ी कमज़ोरी अमिताभ का अभिनय भी है। एक तो उनकी उपस्थिति ही फिल्म पर हावी हो जाती है, क्योंकि दर्शकों के दिमाग़ में उनकी सुपर स्टार वाली छवि काबिज़ है। वे उससे किसी बड़े कारनामे की उम्मीद करने लगते हैं और निर्देशक ने उनसे ये करवा भी दिया।

उनका अभिनय प्रभावशाली भी लगता है लेकिन जहां तक फिल्म के संदर्भ में देखा जाए तो वह बहुत ही लाउड है। वह बचाव पक्ष के सामान्य वकील नहीं लगते, बल्कि लड़कियों के तारणहार दिखते हैं। उनके मुक़ाबले में खड़े पीयूष पांडे का अभिनय भी उसी अनुपात में लाउड हो गया है।

फिर भी पिंक भारत में बनने वाला सैकड़ों फिल्मों से अच्छी है और प्रासंगिक भी। सबसे बड़ी बात ये है कि वह जो संदेश देना चाहती है उसे सफलतापूर्वक कम्यूनिकेट करती है।
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