युद्ध पिपासुओं ये तस्वीरें देखो और सोचो


उमरान दक़नीश की तस्वीर किसी को भी झिंझोड़ सकती है। एक मासूम सा चेहरा, इस बात से अनजान कि हुआ क्या है और जो कुछ हुआ है उसके मायने क्या हैं, एंबुलेंस में हतप्रभ सा बैठा है। कुछ देर तक उसके जिस्म में कोई हरकत नहीं होती, मानो वह खुद एक फ्रेम में जड़ दिया गया है। फिर धीरे से उसका हाथ चेहरे पर जाता है और जब लौटता है तो उसमें ख़ून लगा होता है। लेकिन ये ख़ून भी मानो उसकी चेतना पर कोई असर नहीं डालता, उसे बेचैन नहीं करता या वह ख़ौफ़ में चीख नहीं पड़ता। वही पत्थर जैसे भाव उसके चेहरे पर मौजूद रहते हैं।

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निश्चय ही ऐसी जड़ता किसी भयानक हादसे की वजह से पहुंचे मानसिक आघात से ही पैदा हो सकती है। लेकिन बच्चे के इस रूप ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है। बहुत से लोग तो समझ ही नहीं पा रहे कि बच्चे की इस अवस्था को किस तरह से बयान करें। कुछ दुखी हैं, कुछ अत्यधिक विचलित हैं तो कुछ युद्ध की विभीषका को का अंदाज़ा लगा रहे हैं।



इसके पहले पिछले साल एक और बच्चे की तस्वीर ने दुनिया भर में कुछ इसी तरह के भावनाएं जगाई थीं। वह तस्वीर थी समुद्र तट पर बड़े उस सीरियाई बच्चे की जो अपने परिवार के साथ शरण की तलाश में यूरोप आ रहा था। अलान कुर्दी नामक ये बच्चा भी युद्ध का ही शिकार हुआ था।


बरसों पहले अफगानिस्तान युद्ध के दौरान भी एक अफगानी की बच्ची की तस्वीर ने इसी तरह दुनिया भर को हिला दिया था। दस-बारह साल की उस बच्ची की नीली आँखें अंदर तक भेदने वाली थीं। वे आँखें मानो पूछती थीं कि हमारा कसूर क्या है, हमें किस बात की सज़ा दी जा रही है?



किसी भी जंग का बुरा असर यूँ तो सभी पर पड़ता है मगर सबसे ज़्यादा पीड़ा झेलते हैं महिलाएं और बच्चे। महिलाएं तो हर किस्म के जुल्म की शिकार होती हैं, जबकि बच्चों का पूरा जीवन ही दाँव पर लग जाता है। उनका बचपन युद्ध की बलि चढ़ जाता है। पढ़ाई-लिखाई, सेहत सब पर बुरा असर पड़ता है।

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युद्ध पिपासुओं की समझ में ये सब नहीं आता। वे उन्माद में, घृणा में आकर हिंसक होते हैं और युद्ध करने पर आमादा हो जाते हैं। उन्हें इस बात की परवाह नहीं होती कि इसका आने वाली पीढ़ी पर क्या असर पड़ेगा।
उम्मीद करनी चाहिए कि इन बच्चों की तस्वीरें ऐसे उन्मादियों को सोचने के लिए विवश करेंगीं।

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