राष्ट्रवाद खूब बिकता है लेकिन....?


हिज्बुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी के एनकाउंटर के बाद मीडिया एक बार फिर उन्मादग्रस्त हो गया है। अंधराष्ट्रवाद का ऐसा बुखार उस पर चढ़ा है कि दिन-रात वह सन्निपात में चीख-पुकार मचाता रहता है। वह जटिल समस्या को सरलीकृत करके पूरी घाटी को इस तरह से पेश कर रहा है मानो वहाँ का हर नागरिक दुश्मन हों और उन्हें दबा-कुचलकर ख़त्म कर दिया जाना चाहिए। उनके इस रवैये ने न केवल कश्मीर में गुस्से को भड़काया, बल्कि उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्ख़ियों में ला दिया। पाकिस्तान तो भला ऐसे मौक़े को क्यों छोड़ता, लिहाज़ा उसने भी इसे दुहना शुरू कर दिया। आलम ये है कि कश्मीर हाथ से फिसलता हुआ दिख रहा है। निस्संदेह, समस्या के बिगड़ने में केंद्र और राज्य की गठबंधन सरकार की अपरिपक्वता एवं अकुशलता का हाथ ज़्यादा है। वानी को नायक बनाने के लिए वह मीडिया को दोषी ठहराने में लगी हैं, मगर सचाई तो ये है कि समस्या से निपटने के तौर-तरीकों ने कश्मीरी अवाम को वानी से एकदम से जोड़ दिया और वह लगातार हीरो बनता चला गया।

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अलबत्ता मीडिया का योगदान भी कम नहीं रहा है। मुख्यधारा का मीडिया हो या फिर सोशल मीडिया हर तरफ राष्ट्रवाद के नाम पर जिस तरह का ज़हर उगला गया उसने हालात को बिगाड़ने में बहुत ब़ड़ी भूमिका निभाई। अगर मुख्यधारा के मीडिया को देखें तो पिछले दो सालों में उग्र नस्लवादी और हिंसक पत्रकारों की एक नई जमात पैदा हो गई है। वैसे आप ये भी कह सकते हैं कि ये पैदा तो बहुत पहले हो गई थी मगर परदे में थी और अब पूरे गाजे-बाजे के साथ प्रकट हो गई है। ये जमात अपने आपको राष्ट्रवादी कहती है। इसकी पहचान है इसकी आक्रामकता, घृणा और हिंसा। ये अज्ञानता के कूप में मंडूक बनकर डुबी हुई है, मगर इसे भ्रम है और अहंकार भी कि कुदरत ने सारी बुद्धि इन्हीं को बख्शी है। ये मुँह खोलते हैं तो आग उगलते हैं। कलम चलाते हैं तो आग लगाने के लिए। ये पत्रकारिता के आदित्यनाथ, गिरिराज सिंह और साध्वी निरंजन भारती हैं। अँग्रेजी में अगर अर्नब गोस्वामी तथा टाइम्स नाऊ इनकी अगुआई करते हैं तो हिंदी में इसकी कमान सुधीर चौधरी और ज़ी टीवी ने सँभाल रखी है।

ये सत्तामुखी तथा सत्तापोषित जमात इस समय अति उत्साह से भरी हुई है और आत्मविश्वास तो बात-बात पर छलकता ही रहता है। ये अपने विरोधी विचारों वाले नेताओं एवं दलों को निशाने पर रखते हैं और सत्ता प्रतिष्ठान को खुश रखने के लिए किसी भी हद तक निर्लज्ज हो सकते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नाटक करने वाले ये लोग किसी विरोधी विचार को बर्दाश्त नहीं करते और तुरंत उसके चरित्र-हनन में जुट जाते हैं। बेशक वे पत्रकार बिरादरी के ही क्यों न हों। तर्कों और सबूतों के साथ बात करने के बजाय ये उन्माद पैदा करने वाली भाषा का इस्तेमाल करते हैं। छद्म राष्ट्रवाद का भावनात्मक उबाल पैदा करके ये मुख्य मुद्दों से ध्यान हटाते हैं या फिर प्रस्तुत मुद्दों का सतहीकरण करने में विश्वास रखते हैं।



मुसलमानों से जुड़े मुद्दे इनमें नई ऊर्जा का संचार कर देते हैं। वे उनकी देशभक्ति पर संदेह पैदा करने वाले प्रश्न खड़े करते हैं, उन्हें इस या उस बहाने कठघरे में खड़ा करते रहते हैं। आतंकवाद इसके लिए चिर-परिचित बहाने के रूप में हमेशा मौजूद रहता है। वे तथ्यों को सुविधानुसार चुनते हैं और बहुत ही चतुराई से पेश करते हैं। हिंदुत्वादियों के वैसे ही अपराध उन्हें अपवाद और नगण्य दिखलाई पड़ते हैं। मानवाधिकारों की बात करने से ही ये उखड़ जाते हैं और इन्हें ये पसंद आता है कि ताक़त के बल पर विधर्मियों को कुचल दिया जाए। ये ख़बरों में एकतरफा होते हैं। विचार-विमर्श के इनके कार्यक्रम एक प्रहसन के सिवा कुछ नहीं होते।

इस जमात की पत्रकारिता एजेंडा पत्रकारिता का ज्वलंत उदाहरण है। मुद्दा कुछ भी हो, उन्हें तो बस उसे अंधराष्ट्वाद का रंग दे देना है। बुरहान वानी की मौत के बाद भी इन्होंने यही किया। उसे राष्ट्रीय एजेंडा बना दिया। ये सत्ता प्रतिष्ठान को माफ़िक बैठता है। अगले साल की शुरूआत में होने जा रहे उत्तरप्रदेश एवं अन्य राज्यों के चुनाव पर उसकी नज़र है। वह चाहता है कि अंधराष्ट्रवाद की भट्ठी सुलगती रहे ताकि उसे रोटियाँ सेंकने में दिक्कत न हो। कार्पोरेट नियंत्रित मीडिया इसमें उसके साथ खड़ा है।





ये सही है कि राष्ट्रवाद बिकता है। पिछले कुछ वर्षों में, ख़ास तौर पर पिछले दो साल में देश को जिस मनोदशा में पहुँचा दिया गया है, उसमें वह और भी बिकाऊ माल बन गया है। मामले को सनसनीखेज़ बनाने और उसे भय, शत्रुता और प्रतिशोध से भरी भावुकता की चाशनी में लपेटकर पेश करने से दर्शक-पाठक संख्या बढ़ती है। ये एक आज़माया हुआ नुस्ख़ा है और मीडिया इसका इस्तेमाल करने में कभी भी नहीं चूकता। ख़ास तौर पर न्यूज़ चैनलों के लिए तो ये लॉटरी लगने जैसा है। मगर ज़ाहिर है कि ये स्वस्थ पत्रकारिता नहीं है। ये पत्रकारिता ही नहीं है। ये प्रवृत्ति पत्रकारिता विरोधी है, लोकतंत्र विरोधी है इसलिए जन विरोधी भी है।

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