सबसे ख़तरनाक है सपनों का मर जाना

पंजाब के क्रांतिकारी कवि अवतार सिंह पाश की एक-एक कविता सत्ता और व्यवस्था से संघर्ष का ज़िंदा दस्तावेज़ है। वे शहीद भगत सिंह की परंपरा के सिपाही थे और 1988 में सिख उग्रवादियों ने उनकी हत्या कर दी थी। उस समय उनकी उम्र केवल 38 साल थी। उनको याद करते हुए पेश है उनकी सर्वाधिक चर्चित कविता।



Dreams go to die is most dangerous-अवतार सिंह पाश
मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती

पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती

ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती

बैठे-बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है

हमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है

सबसे ख़तरनाक नहीं होता

कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है

जुगनुओं की लौ में पढ़ना

मुट्ठियां भींचकर बस वक्त निकाल लेना बुरा तो है

सबसे ख़तरनाक नहीं होता



सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना

तड़प का न होना

सब कुछ सहन कर जाना

घर से निकलना काम पर

और काम से लौटकर घर आना

सबसे ख़तरनाक होता है

हमारे सपनों का मर जाना

सबसे ख़तरनाक वो घड़ी होती है

आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो

आपकी नज़र में रुकी होती है

सबसे ख़तरनाक वो आंख होती है

जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्‍बत से चूमना भूल जाती है

और जो एक घटिया दोहराव के क्रम में खो जाती है

सबसे ख़तरनाक वो गीत होता है

जो मरसिए की तरह पढ़ा जाता है

आतंकित लोगों के दरवाज़ों पर

गुंडों की तरह अकड़ता है

सबसे ख़तरनाक वो चांद होता है

जो हर हत्‍याकांड के बाद

वीरान हुए आंगन में चढ़ता है

लेकिन आपकी आंखों में

मिर्चों की तरह नहीं पड़ता



सबसे ख़तरनाक वो दिशा होती है

जिसमें आत्‍मा का सूरज डूब जाए

और जिसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा

आपके जिस्‍म के पूरब में चुभ जाए


मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती

पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती

ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती ।



-अवतार सिंह पाश-




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