सो वो भी आदमी


हबीब तरनवीर के देहावसान की ख़बर, यहाँ की बड़ी सुबह, वेनिस में चित्रकार अखिलेश और छोटे भाई उदयन के मोबाइल संदेशों से मिली। इसके पहले भोपाल से किसी हितैषी ने उनकी तबीयत बहुत ख़राब और उनके वेंटीलेटर पर होने की सूचना दी थी। तभी से मन सशंक था।

नसे जब पिछली बार और अब अंतिम बार दिल्ली में भेंट हुई थी तब वे बहुत कृशकाय और कमज़ोर, लेकिन हमेशा की तरह प्रसन्नचित्त दीख रहे थे। वेनिस में मृत्यु टॉमस मान की एक क्लैसिक मानी जाने वाली एक कहानी है, वेनिस में मृत्यु की ख़बर पाकर यह शीर्षक याद आया। बाद में वेनिस में ही उन दिनों आए सैयद हैदर रज़ा, मनीष पुष्केले आदि को भी दी, सभी गहरे शोक से भर गए। हबीब तरवीर से पहली मुलाकात दिल्ली में हुई थी। जब मैं सेंट स्टीवेंस कॉलेज में छात्र था। उन दिनों वे रंगकर्म के अलावा शायद अपनी जीविका के लिए लिंक साप्ताहिक में संगीत आदि की समीक्षा लिखते थे। उन दिनों शास्त्रीय संगीत की उनकी जानकारी गहरी नहीं थी, पर वे मनोयोग से अमीर खाँ, गंगूबाई हंगल, भीमसेन जोशी आदि को शंकरलाल संगीत समारोह में सुनते थे। उनके पास प्रेस-पास होता था और उनके युवतर संगी होने के कारण मुझे उनके साथ अच्छी जगह बैठने को मिल जाती थी। शास्त्रीय संगीत के प्रति मेरा उत्साह उन दिनों थोड़ा नया और आक्रामक था। सो हमारी संगत अच्छी जमती थी। उस संगत से कई बार कई चमकीले पद भी गढ़ लिए जाते थे। उन्हीं दिनों पहली बार उनके घर खाने पर भी आमंत्रित हुआ, जहां पत्रकार अजीत भट्टाचार्जी से पहली भेंट हुई। हबीब के परिचितों का दायर बहुत बड़ा था और उनके प्रशंसकों का तो उससे कई गुना बड़ा। तब तक उनकी कीर्ति काफी ऊंची और कुछ विवादास्पद भी थी। दिल्ली में इब्राहीम अलकाजी के नेतृत्व में एक नए ढंग का थिएटर आकार ले रहा था जिसमें पश्चिमी रंगमंच जैसा संयम, परिष्कार और ट्रैजिक आभा थी। वह सुशिक्षित और पढ़े-लिखे लोगों का रंगमंच था, जबकि हबीब तनवीर लोक-कलाकारों को लेकर अपना थिएटर कर रहे थे जो शायद पढ़े-लिखे तक नहीं थे और जिन्होंने किसी विद्यालय या संस्थान में रंग-प्रशिक्षण नहीं पाया था। हबीब के पास साधन कम थे, पर उन्होंने साधनो के अभाव को एक तरह की रंग-रणनीति में रूपांतरित कर लिया था। उनका रंगमंच आधुनिक था, पर उसमें आधुनिक रंगमंच के उपकरण, साधन, प्रपंच आदि नहीं थे।

इसलिए यह एक तरह की चुनौती था। ज़िंदगी भर हबीब का रंगकार्य उनकी अद्वितीय दृष्टि,ज़िद और जीवट पर अड़ा रहा। उनसे अधिक, उनसे पहले तो किसी ने निश्चय ही ये पहचान नहीं कराई कि लोक-परंपरा और आधुनिकता में कोई अनिवार्य द्वैत नहीं है, कि मनुष्य के चरम प्रश्नों और इतिहास से निपटने का ठेका शहरी कलाओं की बपौती नहीं है और कि भारत में कलाएं प्रश्नवाचक और उत्सवधर्मी एक साथ हो सकती हैं, होती रही हैं। यह तो सभी जानते हैं कि हबीब ने कई क्लैसिक मसलन, शूद्रक,शेक्सपीयर, मोलिये आदि के नाटकों के अलावा कई लोककथाओं को रंगप्रस्तुतियों में परिणत किया। उनके कई नाटक तो उनकी कार्यशालाओं में ही लिखे और रंगरूपायित किए गए। यह नोट करना भी दिलचस्प है कि उन्होंने सातवें दशक में उभरे अनेक मूर्धन्य नटककारों विजय तेंदुलकर, बादल सरकार, गिरीश कर्नाड, धर्मवीर भारती, मोहन राकेश आदि में से किसी का नाटक कभी भी नहीं किया। यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि हबीब ने जो किया और जो नहीं किया उन दोनों ने मिलकर रंगाधुनिकता का एक वैकल्पिक भारतीय संस्करण प्रस्तुत किया। एक तरह से वे इस संस्करण के प्रधान और पहले रथपति हैं, हमारे समय में। सच तो यह है कि भारतीय रंगमंच और संस्कृति की बीसवीं शताब्दी जिन मूर्धन्यों ने गढ़ी उनमें हबीब निश्चय ही गिने-माने जाते रहेंगे। ऐसा बहुत सारा रंगमंच आज है जो अगर हबीब की ज़िद और जीवट से दिखाई गई दिशा न होती तो संभव न होता। इस अर्थ में वे नायक-रंगकर्मी थे। हबीब का इप्टा से गहरा संबंध रहा था और उस दौरान जिस तरह की मार्क्सवादी आस्था उन्होंने अर्जित की वे उस पर आजीवन निष्ठापूर्वक बने रहे, भले ही उस आस्था की अनेक दुष्कृतियाँ भी दरपेश रहीं। वे मुक्ति और क्रांति में विश्वास करते थे। तरह-तरह के सामाजिक और जन आंदोलनों को हबीब मुखर और सक्रिय सहयोग देते रहे। शिक्षा, वैज्ञानिक चेतना, प्रौढ़ शिक्षा आदि अनेक क्षेत्र हैं जिनसे हबीब का गहरा लगाव रहा। उन्होंने अपनी रंग हैसियत का इस्तेमाल सिर्फ रंगमंच के लिए नहीं,व्यापक सामाजिक उद्देश्यों के लिए भी लगातार किया। कई बार इस कारण उन पर या उनकी प्रस्तुतियों पर कुछ तत्वों ने भौतिक हमले आदि भी किए। पर हबीब अपने रंगमंच की ही तरह अप्रतिहत और कई मायनों में अपराजेय रहे। उनकी वैचारिक निष्ठा जो भी रही हो(और उससे कईयों की असहमति हो सकती है)उनका रंगमंच तीखे सवाल उठाने के साथ-साथ आनंददायी भी था। वे अकसर कहा करते थे कि जिसे देखने में मज़ा न आए वह रंगमंच क्या। संगीत को रंग प्रस्तुतियों में हबीब किसी तरह का माहौल बनाने या पृष्ठभूमि की तरह इस्तेमाल नहीं करते थे। उनके यहाँ संगीत की मौजूदगी लगभग एक चरित्र जैसी होती थी। संगीत कथा को आगे बढा़ता था, प्रश्न पूछता था और टिप्पणी करता था-कुछ-कुछ वैसा ही जैसा ग्रीक ट्रेजेडी मे कोरस की भूमिका होती है।

हबीब की दृष्टि महाकाव्यात्मक थी। आगरा बाज़ार का अंतिम दृश्य कौन भूल सकता है जिसमें उस प्रस्तुति के सारे पात्र मिलकर नज़ीर अकबराबादी की महान कविता आदमीनामा गाते हैं जिसमें यह मिसरा बार-बार आता है “सो वो भी आदमी……”। हबीब ने अपने रंगमंच से हमारे समय में भारत का एक अनूठा “आदमीनामा” ही रचा-विन्यस्त किया। वे न होते तो शायद हम कम जान पाते कि हम सबमें कितने सारे तरह-तरह के आदमी हैं और बावजूद सब कुछ के हम सब पहले-पहल और आख़िरकार आदमी हैं। दूर छत्तीसगढ़ के गाँवों मं लोक-कलाकार रचते-गढ़ते हैं वह आधुनिक है और वे सब भी हम जैसे आदमी हैं। अगले वक्तों के पुराने दोस्त आधुनिक फ्रेंच कविता के बारे में यह धारणा आम है कि वह कुल मिलाकर जटिल और संकीर्ण है। उसमें एक अधिक खुली, अंदर-बाहर दोनों को समेटती हुई कविता-धारा भी सक्रिय है, इस ओर ध्यान दिलाने की कोशिश है एनविल लंदन द्वारा प्रकाशित और रैनी फैल्डमैन और स्टीफेन रोमर द्वारा संपादित और अनूदित 1938-2008 की अवधि से संबद्ध, कवियों का एक सप्तक जो हाल में “इन टू दि डीप” स्ट्रीट शीर्षक से निकला है। सात कवियों में से चारेक तो परिचित हैं, पर तीन नए हैं। सबसे पहले ध्यान गया फिलिप जैकोते पर जिनसे बरसों से परिचित हूँ और एक बार उनके गाँव में कुछ देर के लिए मिल भी आया हूँ। वे मूलत: स्विट्जरलैंड के हैं, पर बरसों से फ्रेंच प्रोवोंस के एक गाँव में एक पुराने किले की चहारदीवारी के अंदर एक पुराने मकान में रहते हैं। उनकी आयु इस समय चौरासी बरस की हो गई है। इस संचयन में उनकी कई नई कविताएं अनुवाद में पढ़ने को मिलीं। उनमें से एक है “अगले वक्तों के पुराने दोस्त......”। उसका आरंभिक अंश यों है- अगले वक्तों के दोस्तों आह हम क्या हो गए हैं, हमारा ख़ून पीला पड़ गया, हमारी उम्मीदें अधबीच में ख़त्म, हमने दुनियादारी और कंजूसी के ढंग अपना लिए, हमारी साँस जल्दी भर आती है-पुराने चौकीदार कुत्ते जिनके पार रखवाली करने या काटने को कुछ ख़ास नहीं बचा- हम अपने पिताओं की तरह दिखना शुरू कर रहे हैं क्या सचमुच कोई रास्ता नहीं है कि हम जीत सकें या कि, कम से कम, समय के सामने बुरी तरह पिटने से और उसका समापन होता है इन पंक्तियों से- लेकिन बहुत ज़्यादा भार है अंधेरी तरफ जिस ओर हमें उतरता मैं देख रहा हूँ और कौन है जो अब भी हर दिन को ठीक बैठा सके उससे जो अदृश्य है, कौन कभी कर सकता है। जैकाते की कविता के केंद्र में विषाद या अवसाद है। वह तरह-तरह से पर अचूक व्यक्त होता रहता है और इस तरह की किसी दुहराव का भाव नहीं जागता। “26 जून की चिट्ठी” शीर्षक कविता का अंश- अब और मत सुनो हमारी परेशानियों का शोरगुल हमारे साथ क्या हुआ इस बारे में मत सोचो, हमारा नाम भूल जाओ। सुनो जो हम बोलते हैं दिन की आवाज़ के द्वारा, और सिर्फ धूप को चमकने दो। जब सब डर हमसे चूस लिए जाएंगे जब मृत्यु हमें सिर्फ पारदर्शिता लगेगी, जब वह निर्मल होगी गर्मियों की रात की हवा की तरह और हमें हलकापन ले जाएगा, उड़ते हुए उन काल्पनिक दीवारों के आर-पार जिन पर हवा टिकती है, जो भी तुम सुनोगे वह नदी की आवाज़ होगा जंगल के पीछे बहती हुई, जो भी तुम देखते वे रात की आँखें होंगी, चमकती हुई... जब हम बोलेंगे बुलबुल की आवाज़ से...
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