राष्ट्रोन्माद की जीत है ब्रिटेन का अलग होना

ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से बाहर आने के बहुत सारे अर्थ हैं और उनके नतीजे भी हमें कई तरह से देखने को मिलेंगे। लेकिन एक महत्वपूर्ण बात जिस पर सबसे कम चर्चा हो रही है, वह है ब्रिटेन में अति राष्ट्रवादी शक्तियों का उभार। हालाँकि ये विश्वव्यापी प्रवृत्ति है और यूरोप में तो ख़ास तौर पर इसे उभरते हुए देखा जा रहा है। लेकिन ब्रिटेन जैसे उदार लोकतांत्रिक देश में इसका इतना शक्तिशाली होकर उभरना बेहद ख़तरनाक़ संकेत है। 

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रायशुमारी का नतीजा बताता है कि ब्रिटेन में खुलेपन और सबको गले लगाने की जो भावना बहती थी, वह थम चुकी है। यूरोपीय समुदाय से खुद को अलग करने का मतलब ही यही है कि वह अब बंद समाज बनने की दिशा में चल पड़ा है। हालाँकि इसके संकेत लेबर सांसद जो कॉक्स की हत्या से ही मिल गया था, लेकिन तब एक उम्मीद बनी हुई थी कि अगर ब्रिटेन ने यूरोपीय संघ में बने रहने का फैसला ले ले तो शायद इस पर ब्रेक लग जाए, मगर ऐसा हुआ नहीं।

ब्रिटेन को इस स्थिति तक लाने में यूँ तो कई ऐसी चीज़ों की भूमिका भी है, जो उसके वश में नहीं थीं। मसलन, अचानक आई शरणार्थी समस्या ने अलगाव की भावना को बल दिया। लेकिन ये नहीं भूलना चाहिए कि सत्तारूढ कंजरवेटिव पार्टी की भी इसमें भूमिका रही है। पिछले चुनाव में जीत के लिए उसने ही इस मुद्दे को हवा दी थी। वह ब्रिटेन के मतदाताओं में पैदा हो रही असुरक्षा की भावनाओं को भुनाना चाहती थी इसीलिए खुद प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने वादा किया था कि अगर वे सत्ता में वापस लौटे तो यूरोपीय संघ में बने रहने के सवाल पर रायशुमारी करवाएंगे।

लेकिन सत्ता में आने के बाद कैमरन को समझ में आ गया कि उन्होंने जिन को बोतल से निकालकर बड़ा जोखिम का काम किया है। इसीलिए आनन-फानन में उन्होंने यूरोपीय संघ से सौदेबाज़ी करके ये संकेत देने की कोशिश की अब सब ठीक है और ब्रिटेन का संघ में बने रहने में ही फायदा है। मगर इसका कुछ भी असर हुआ नहीं। वे खुद संघ में बने रहने के पक्ष मे चल रहे अभियान का नेतृत्व कर रहे थे मगर कुछ कर नहीं पाए।

नतीजे बताते हैं कि दोनो प्रमुख दलों को नुकसान हुआ है और अति दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी पार्टी की लोकप्रियता बढ़ी है। उसने तो जीत के दिन को इंडिपेंडेंस डे ही घोषित कर दिया है। ऐसे में ये भय होना स्वाभाविक है कि कहीं वह ब्रिटेन में एक निर्णायक ताक़त न बन जाए और कही ऐसा हुआ तो ब्रितानी समाज में कट्टरता और भी बढ़ेगी।

ब्रिटेन के नतीजे यूरोप में अति दक्षिणपंथी, राष्ट्रवादी और फासीवादी दलों के उत्साह को बढ़ाने वाले साबित हो रहे हैं। नीदरलैंड में तो ब्रिटेन की तर्ज़ पर रायशुमारी करवाने की माँग दक्षिणपंथी दल ने कर ही दी है। कई और देश इस रास्ते पर जाने के लिए तैयार बैठे हैं।

एशिया में भारत समेत कई देशों में कट्टर राष्ट्रवादी दल सत्तारूढ हो चुके हैं। अमेरिका मे डोनाल्ड ट्रम्प की बढ़ती लोकप्रियता भी यही संकेत दे रही है। ऐसे में यूरोप का भी दक्षिणपंथ की ओर मुड़ना समूचे विश्व के लिए ख़तरे की घंटी है। राष्ट्रवाद हमेशा टकराव की ओर ले जाता है, जिससे युद्ध की आशंकाएं बढ़ती हैं। मनाइए कि हम तीसरे विश्वयुद्ध की ओर न बढ़ें।

डॉ. मुकेश कुमार
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