अमिताभ बच्चन भाँड़ हैं भाँड़, जया उनसे ज़्यादा ईमानदार इंसान-काटजू


सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू अमिताभ बच्चन की प्रतिक्रिया से बेहद दुखी हैं। उन्हें लगा था कि अमिताभ उनके ब्लॉग से ख़फ़ा होकर तीखी प्रतिक्रिया करेंगे मगर उन्होंने ये कहकर निराश कर दिया कि उनका दिमाग़ बिल्कुल खल्लास है। यानी जिस इरादे से उन्होंने ब्लॉग लिखा था, वही ध्वस्त हो गया। उन्हें अमिताभ से ये उम्मीद नहीं थी। इलाहाबादी और कॉलेज में एक जूनियर होने के नाते अमिताभ को उनका इतना तो खयाल रखना ही चाहिए था। लेकिन शायद अमिताभ के चरित्र में ही ये नहीं होगा। वे अपनी भला-बुरा पहले देखते हैं।

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बहरहाल, काटजू इस मसले को यहीं नहीं छोड़ना चाहते थे, इसलिए उन्होंने मुझे याद कर लिया। उनका पिछला एनकाउंटर खूब हिट रहा था और उनके पास ढेरों फोन गए थे। उन्हें ये भी पता था कि फ़ेक एनकाउंटर लाखों लोग पढ़ते हैं और बात अमिताभ के पास भी पहुँच जाएगी। ऐसे हुआ तो हो सकता है कि इस बार वे उनकी डिमांड के अनुसार कुछ बोल दें और कुछेक न्यूज़ चैनल उसे आदतन गरम मसाला समझकर तान दें। हमारे संपादक जी को भी गरममसाले की खुजली सताती रहती है। इसीलिए जब मैंने उन्हें काटजू साहब के फोन के बारे में बताया तो उनका एंटिना खड़ा हो गया और मुझे लगभग खदेड़ते हुए रवाना कर दिया।

हमेशा की तरह वे शेक्सपियर की किताब में उलझे हुए थे। मैंने नमस्कार किया तो उन्होंने अपनी चिर-परिचित अविनम्रता का परिचय देते हुए सिर हिलाने भर की ज़हमत उठाकर जवाब दे दिया। मैं भी खुन्नस में तो था ही, बिना किसी भूमिका के शुरू हो गया-

काटजू साहब, ये क्या आपने इतने बड़े एक्टर को लेकर इतनी हल्की बात कर दी? क्या आप जैसे किसी नामी जज को ऐसा करना शोभा देता है?
हल्के आदमी के लिए हल्की बात ही की जाएगी और ये एक जज ही कर सकता है। ये सबके बस की बात नहीं कि इतने मशहूर आदमी के लिए जो सत्ता के इतने करीब बैठा हो मानो उसका भी निवास 7 रेस कोर्स रोड में ही हो...

लोक कल्याण मार्ग....
अरे उसे कोई भी नाम दे दो वह रहेगा रेस कोर्स रोड ही। सियासी घुड़दौड़ वहीं से शुरू होंगी। ख़ैर तो मैं कह ये रहा था कि ये आदमी है हल्का ही। आप उसे बड़ा एक्टर कह रहे हो मगर मेरी नज़र में तो उनकी फिल्में दो कौड़ी की हैं। बतौर एक्टर दुनिया में उनका क्या स्थान है बताइए मुझे, बताइए मुझे? आप पत्रकार लोग होम वर्क तो करते नहीं हो और जिसको चाहे बड़ा एक्टर बनाने लगते हो। एक्टर कहते हैं चार्ली चैपलिन को। अगर हिंदुस्तान में ही नाम लेना हो तो नसीर, ओम पुरी, इरफ़ान वगैरा का नाम ले सकते हो। अमिताभ तो भाँड़ है भाँड़ मेरी नज़र में।

देखिए उनके लाखों चाहने वाले हैं, सब वैसे ही आपसे नाराज़ चल रहे हैं, अब और हो जाएंगे?
तो हो जाएं। उनको खुश करने के लिए क्या मैं झूठ बोलने लगूँ? जैसे अमिताभ दो कौड़ी के एक्टर हैं वैसे ही उनके फैन भी। उन्हें फिल्मों की समझ तो है नहीं, बस स्टारडम और ग्लैमर के दीवाने हैं। और सच बात तो ये है कि वे नशेड़ी हैं। उन्हें नशा चाहिए घटिया मनोरंजन का। वे हक़ीक़त का सामना नहीं कर सकते, मुश्किलों से लड़ नहीं सकते तो उनकी फिल्में देखकर पलायन का रास्ता चुनते हैं। वे इसी में खुश हो लेते हैं कि उनके हीरो ने बुरे लोगों की धुनाई कर दी या उन्हें मार डाला।

तो ठीक है, इतनी परेशानियों से घिरे लोग अगर उनकी फिल्मों में राहत पाते है तो बुराई क्या है?
मेरी समझ में नहीं आता कि आप जैसे लोग पत्रकार कैसे बन जाते हैं। एक वो आदमी है जो रोज़ शाम को बिना अकल की बात किए चीखता रहता है नेशन वांट टू नो, नेशन वांट टू नो कहकर। बेमतलब में लड़ाता रहता है हर किसी को। इस समय दो मुल्कों को लड़ाने में लगा हुआ है। बताइए उस पगले को टाइम्स वाले समझाते भी नहीं हैं। खुद को दुनिया का सबसे बड़ा विद्वान समझता है।
अरे भाई सीधी से बात है कि समस्याओं से भागने से उनका समाधान नहीं होता, उनसे लडने से होता है। अमिताभ की फिल्में उन्हें ज़िंदगी की लड़ाई लड़ने से रोकती हैं। इस तरह वे संघर्ष की विरोधी भी हैं, यथास्थितिवादी भी हैं। ये समाज और देश की तरक्की में बाधक हैं।

लेकिन उनकी सभी फिल्में तो ऐसी नहीं हैं, उन्होंने कुछ अच्छी फिल्में भी की हैं?
कौन सी अच्छी फिल्म की है उसने बताओ मुझे? आप कहोगे आनंद, अभिमान वगैरा तो वे तो डायरेक्टर की वजह से थीं अमिताभ के कारण नहीं। आप नाम लोगे ब्लैक का। मैं कहूँगा उसमें बहुत खराब एक्टिंग की है उसने। ओवरएक्टिंग से भरी हुई है वो। बहुत लाउड है। चलिए मैं अगर मान भी लूँ कि एक-दो फिल्मों में उसने अच्छा काम भी किया होगा तो क्या उसके आधार पर उसे हम अच्छा अभिनेता मान लें।

देखिए अच्छे अभिनेता न होते तो वे इतने मशहूर क्यों होते?
मशहूर तो थोड़े दिनों में सनी लियोनी भी हो जाएगी, तो क्या उसे भी महान मान लोगे? देखो, मशहूर बनाती है इंडस्ट्री, मार्केट। एक अच्छा जज कभी इतना मशहूर नहीं हो सकता क्योंकि उसे कभी इंटस्ट्री या मार्केट प्रोमोट नहीं करेगा। किसी बड़े साइंटिस्ट को या लेखक को किया उसने? मुंशी प्रेमचंद के सामने अमिताभ बच्चन किस खेत की मूली हैं, मगर नहीं, उन्हें सब जानेंगे प्रेमचंद को कुछ ही लोग। तो ये तो धंधे की बात है, जिसके नाम पर चल गया, उसकी सब जय-जय करने लगे।


आप अमिताभ से इतना ख़फ़ा क्यों हैं, मत देखिए उनकी फिल्में और खुश रहिए?
मैं तो उसकी फिल्में देखता हूँ और एक सामान्य दर्शक की तरह देखकर खुश भी हो लेता हूँ, क्योंकि कई वीकनेस तो मुझमें में भी हैं न। लेकिन मैं खफ़ा केवल उनके फिल्मी करियर को लेकर नहीं हूँ।

फिर किसलिए?
असल बात तो वही है जो मैंने कही थी यानी इस शख्स के दिमाग़ में कुछ नहीं है, बिल्कुल खाली है।

चलिए आपने बोल लिया। अब किस्सा ख़त्म?
किस्सा ख़त्म कैसे? अभी तो मुझे बहुत कुछ कहना है।

कहिए क्या कहना चाहते हैं?
दरअसल, ये आदमी ही मुझे नकली लगता है और इसका कैरेक्टर भी थोड़ा ढीला लगता है……

देखिए, अब आप सीमा लाँघ रहे हैं और आपको पता है कि वे आप पर मानहानि का केस ठोंक सकते हैं?
मैं तो चाहता ही हूँ कि वे ऐसा कर दें ताकि मुझे और बोलने का मौक़ा मिले। खैर, मैं जो बात कहना चाहता हूँ वो ये कि उसने अपने जीवन में सिवाय मौकापरस्ती दिखाने के कुछ नहीं किया। पहले राजीव गाँधी के साथ जुड़ा, उन्हें गच्चा दिया। फिर मुलायम, अमर सिंह और सुब्रतो रॉय जैसे लोगों की मंडली में शामिल हो गया, लेकिन उनका भी नहीं हुआ। जब लगा कि वहाँ कुछ नहीं रखा तो पहुँच गया मोदी का गुणगान करने। इसने तो अपने माता-पिता तेजी और हरिवंश राय बच्चन का नाम भी डुबा दिया।

वो कैसे?
बच्चन साहब कितने सेकुलर आदमी थे। उन्होंने लिखा था बैर कराते मंदिर मस्जिद एक कराती मधुशाला। लेकिन उनके साहबज़ादे उन्हीं के हाथ मज़बूत करने में लगे रहते हैं, जिनकी पॉलिसी ही बैर करवाने की है, लड़ाने की है। बताइए कितने शर्मनाक ढंग से उन्होंने मोदी को जन्मदिन की बधाईयाँ दीं। मुझे तो डर है कि किसी दिन ये आदमी बीजेपी में शामिल हो जाएगा और 2019 के चुनाव में उसका प्रचार भी करेगा।

अभी तो चर्चा चल रही है कि मोदीजी उन्हें राष्ट्रपति भी बनवा सकते हैं?
मुझे कोई हैरत नहीं होगी अगर ऐसा हो जाए तो। मोदी जी को ऐसे चापलूस पसंद आते हैं और वे उनका अच्छे से इस्तेमाल करना भी जानते हैं। मगर मुझे ये लगता है कि अगर ऐसा हुआ तो इस देश का क्या होगा। वो तो रसातल में चला जाएगा।

जब जैल सिंह जैसे लोग राष्ट्रपति बन सकते हैं तो अमिताभ क्यों नहीं?
हां, आप ठीक कहते हैं। लगता है थोड़ा-बहुत पढ़ रखा है तुमने भारतीय राजनीति के बारे में। लेकिन मेरा मानना है कि अमिताभ जैल सिंह से भी गए गुज़रे साबित होंगे, क्योंकि इस आदमी के पास रीढ़ की हड्डी है ही नहीं। ये तुरंत साष्टांग दंडवत् हो जाता है।

देखिए उनकी विनम्रता को आप ग़लत ढंग से ले रहे हैं। पूरी दुनिया उनकी विनम्रता की कायल है?
बहुत बनावटी और दिखावटी किस्म की विनम्रता है वो। वो लुभाती ज़रूर है, मगर सच्ची नहीं है। मुझे तो अमिताभ से ज्यादा जया समझदार और ईमानदार इंसान लगती हैं। वे ग़लत लोगों की संगत नहीं करतीं, ग़लत लोगों की तारीफ़ करते उन्हें नहीं देखा-सुना और उनके विचार भी अमिताभ से कहीं ज़्यादा परिपक्व हैं, सुलझे हुए हैं। कलाकार तो वे उनसे बेहतर हैं ही।


अच्छा, एक बात बताइए। अचानक ये आप अमिताभ के पीछे क्यों पड़ गए? वे तो आपको इतना रेस्पेक्ट दे रहे हैं कि आपके खिलाफ़ एक लफ़्ज़ भी उन्होंने नहीं बोला, मगर आप हैं कि उन्हें कहीं भी बख़्श नहीं रहे?
यही तो मेरी और उसकी शख्सियत में फर्क है न। मैं तो खरी-खरी बोलता हूँ क्योंकि मुझे तो मोदीजी से कुछ चाहिए नहीं। मैं तो खुलकर बोलूंगा क्योंकि आज इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। इतिहास में ये दर्ज़ नहीं होना चाहिए कि नाज़ुक मौक़ों पर काटजू चुप रहा।

लोगों का तो कहना है कि आप ये सब सुर्ख़ियों में बने रहने के लिए करते हैं?
ये भी सही है। मैं सुर्ख़ियों में बना रहना चाहता हूं और कौन नहीं बना रहना चाहता। अमिताभ तो इसके लिए क्या-क्या हथकंडे नहीं अपनाता। तेल साबुन से लेकर पोलिया तक सबके विज्ञापनों में घुसा रहता है। और नहीं तो पोती और नातिन के नाम लिखे व्यक्तिगत पत्र को सार्वजनिक करके सुर्ख़ियाँ बटोरता है। लालची तो वो बहुत है ही, सब जगह से बटोरता रहता है, मगर उसका पेट ही नहीं भरता। मैं ऐसा नहीं हूँइसलिए मुझे नहीं लगता मैं कोई ग़लत काम कर रहा हूँ।

काटजू साहब इस बीच मेरे बजाय शेक्सपियर की किताब की तरफ मुखातिब हो चुके थे। मैं समझ गया कि उनका मतलब पूरा हो गया है और अब मुझे निकल लेना चाहिए। मैंने उठते हुए नमस्ते कहा तो उन्होंने बिना देखे ही सिर हिला दिया।







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वैधानिक चेतावनी - ये व्यंग्यात्मक शैली में लिखा गया काल्पनिक इंटरव्यू है। कृपया इसे इसी नज़रिए से पढ़ें।

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