राजकुमार कुम्भज की बारह कविताएँ


१-मैं आजकल हकलाता क्यूं हूं ?


Rajkumar-Kumbhajs-poems-deshkaal
मैं आजकल हकलाता क्यूं हूं ?
जब पैदा हुआ था तो मां से डॉक्टरों ने यही कहा था
कि ये बच्चा सेहतमंद है और ज़ुबान का पक्का भी
फिर मैं बात-बात पर आजकल हकलाता क्यूं हूं ?
पता नहीं ये मुझे क्या होने लगा है
मैं जब-जब भी, अब, सच बोलने की कोशिश करता हूं
तो सचमुच हकलाने लगता हूं
पिछले दिनों की बात है कि जब मुझे
एक चुप्पै, बहुतै ही चुप्पै प्रधानमंत्री मिले थे
और एक इन दिनों की बात है कि जब मुझे
एक बड़बोले, बहुत ही बड़बोले प्रधानमंत्री मिले हैं
जो चुप्पै थे, वे सिर्फ चुप्पै ही रहते थे
कुछ और, कुछ और कभी नहीं करते थे
जो बड़बोले हैं वो सिर्फ बड़बोले ही रहते हैं
कुछ और, कुछ और कभी नहीं करते हैं
तब भी, बहुतै ही मारे गए थे अकारण ही
अब भी, बहुतै ही मारे जा रहे हैं अकारण ही
तब भी, बहुतै ही भूखे सोते थे अकारण ही
अब भी, बहुतै ही भूखे सो रहे हैं अकारण ही
तब भी, पूरे काम की पूरी मजूरी नहीं मिली थी
अब भी, पूरे काम की पूरी मजूरी नहीं मिलती है
तब भी, सच हार रहा था और जीत रही थीं साज़िशें
अब भी, सच हार रहा है और जीत रही हैं साज़िशें
मैं खोलना चाहता हूं भेद सब
मैं खेलना चाहता हूं नरमुंडों से
मैं खुलना चाहता हूं ज्वालामुखी की तरह
मैं थूकना चाहता हूं सच, काल के कपाल पर
मैं मूतना चाहता हूं ख़ून, बंजर ज़मीन पर
मैं चूसना चाहता हूं तिजोरियों में जमा शब्द सभी
लेकिन जैसे-जैसे बढ़ता हूं जंगल-जंगल
याद करते हुए इतिहास के गलियारे, हकलाने लगता हूं
मैं आजकल हकलाता क्यूं हूं ?



२ - किया प्रेम

किया प्रेम
किंतु क्या कि किया प्रेम ?
जब भी जाऊंगा छूट कर प्रेम से मृत्यु की तरफ़
थोड़ी गिलास में थोड़ी बोतल में छोड़ जाऊंगा शराब
ये कहता हुआ और याद रखता हुआ कि कुछ किया
कि जितनी पी शराब, उससे कहीं ज़्यादा-ज़्यादा
किया प्रेम
नाश प्रेम, शराब नहीं, कि कुछ किया
नाश फिर-फिर ज़रूरी है ज़रूरी है जीवन में कि कुछ किया
किंतु कहूंगा जब भी तो कहूंगा प्रेम फिर-फिर कि कुछ किया
किया प्रेम
नदी, झरना, पहाड़, प्रेम, बहता हुआ कि कुछ किया
कहता हुआ बहुत-बहुत, बहुत कुछ दुःख भरा हुआ
संगीनों के साये में जीता हुआ पीता हुआ शराब
कि डूब जाऊंगा तो पार हो जाऊंगा कहता हुआ
किया प्रेम

३ - थके-थके से शब्द हैं तो भी

थके-थके से शब्द हैं तो भी
थके-थके से ही हैं शब्दों के संवाहक तो भी
मैं ही नहीं एक अकेला किंतु हैं और-और भी अनेकों
जिनके सीने में अंगार भरी सड़कें
बर्फ़ से ढके हैं द्वीप उधार
बर्फ की चादर लपेट सोया है साहस
फैले हैं, फैले हैं अनलिखे पृष्ठ फैले हैं हर तरफ़
शब्द-दर-शब्द, डर ही डर, बहशी हैं सब  और वे जो अहिंसा के पुजारी, महात्मा, महामानव
सिर्फ़ और सिर्फ़ मौके की प्रतिज्ञा में
प्रतिज्ञा मुझे भी, प्रतिज्ञा में मैं भी
कि जो भी है और है जितने भी वहशी
दे सकूं उन्हें एक कविता, एक दिन
अभी थका-हारा हूं तो क्या हुआ , क्या हुआ
थके-थके से शब्द हैं तो भी
छुक-छुक रेलगाड़ी-सी चल रही है सासें मेरी और ज़िंदा हूं मैं


४-किसी एक देश के अनुभव में

किसी एक देश के अनुभव में
किसी एक राजा ने अपने नागरिकों के लिए
किसी एक सर्दी से बचने के कुछ उपाय किए
उसे सिलवाए कुछ कपड़े
नंगा तन ढंकने की ख़ातिर और अपनी नाप के
बेहद भारी तादात में अपनी नाप के कपड़े
एकदम-एकदम एक ही रंग के
एकदम-एकदम एक ही नाप के
और एकदम-एकदम बेहूदा लबादे जैसे
उसी किसी एक देश के अनुभव में
कहीं कोई रहता था, एक कवी भी, जो नंगा
उसी किसी एक देश के अनुभव में
कहीं कोई रहता था, एक लोहार भी, जो नंगा
उसी किसी एक देश के अनुभव में
कहीं कोई रहता था, एक ट्रैफिक मेन भी, जो नंगा
लोहार ने बनाया तराशा हथियार
कवी ने सुनाया सुझाया कोई राग-भैरवी
ट्रैफिक मेन ने दिखाई गलियां सुंदरतम्
लोहार ने बनाया था हथियार जो
कवि ने किया इस्तेमाल वो
पकड़ा गया वो कवि आवारगिर्दी के अपराध में
बीच-बाज़ार, बीच-सड़क, बीच-सत्यनिष्ठा
किसी एक देश के अनुभव में



५-अच्छे दिनों की बात में

अच्छे दिनों की बात में
जो संदेश छुपा था अच्छे दिनों का
उस संदेश को समझने में
कुछ वक़्त लगा जनता-जनार्दन को
कि अच्छे दिन आए तो किसके ?
सरकारी ख़र्चे पर विदेश यात्राएं
सरकारी ख़र्चे पर परिधान-पॉलिटिक्स का प्रपंच
सरकारी ख़र्चे पर स्व-छबि निर्माण
अच्छे दिनों की याद में
शहीद हो गए कई-कई अच्छे दिन
तब जाकर पता चला
कि आए तो आए आख़िर किसके अच्छे दिन ?
सरकारी इश्तहारों की तस्वीरों में
दिखाया गया शेर
मगर शेर वह नितांत सरकारी
नितांत सरकारी उस शेर की दहाड़
दिखाई सुनाई नहीं देती है कहीं भी
अच्छे दिनों की बात में
अच्छे दिनों की प्रतीज्ञा का रुदन है
अच्छे दिनों की प्रतीज्ञा के रुदन में
अच्छे दिनों की प्रतीज्ञा छूपी है
और जो प्रतीज्ञा छुपी है इन दिनों में
उसके अच्छे दिन कभी नहीं, कहीं नहीं
अच्छे दिनों का घोटाला है ये तो
गर्मागर्म तवे पर सींक रही रोटी
और सींक रही रोटी के लिए तरस रहे आदमी का
यही है, यही है एक मला-मला-सा तारतम्य यही है
कि यहां और वहां
अच्छे दिनों जैसा कुछ नहीं है
कोई एक शेर की तस्वीर है १वान जैसी
१वान में शेर जैसी दहाड़ नहीं है
अच्छे दिनों की बात में

६-सिर ऊपर

आता हूं कहते हुए
जाता है जो मिला भर बारिश में
भीग रहा था उसका दंमोक्त सिर
सिर ऊपर लटक रही थी तलवार धूप की
सुखा देने को बूंद-बूंद

७-जो बेचारा हरिराम

राम और हे राम
हे राम और हरे राम
हरेराम और हारे राम का फ़र्क
सिर्फ़ और सिर्फ़ समझ सकता है तो वही
जो हरा है, हरि है, और राम है अभी भी
और है हारा भी अभी तक
लेकिन कहां गया वह इसी बीच
जो बेचारा हरिराम?

८-इस वीराने में

इस विराने में वीरान-सी वीरानी है कोई
और ब्रह्मांड भर में ब्रह्मांड तक की
सनसनी से भी बड़ी कोई सनसनी
पसर गई है
शिशुओं के शव हैं झूला झूलते हुए
स्त्रियों से बलात्कार का उत्सव है
पोरूष की नपुंसकता है, ज१न भी
और वे चार जने अभागे
जो निकले हैं रोटी की तलाश में
तलाश में ही पाए गए मिट्टी का ढेर
मगर मिट्टी के ढेर से ही पैदा होती है
फ़सलें और चिंगारियां
ये तो बड़ा ही अजब-गज़ब तमाशा है
कि फ़सलें और चिंगारियां
इस वीरान में!
इसी एक वीराने में रहता था कहीं
कोई एक कवि
जो मरीज़ नहीं था मधुमेह का
किंतु पर्याप्त परहेज़ पर ही रहता था
शकरकंद खाने से
इस वीराने में

९-नदी को बहने दो

नदी को बहने दो
नदी को बहने देने से ही निकलता है रास्ता
नदी में सिर्फ पानी ही नहीं बहता
बहती नदी में बहता है दुनिया भर का प्रेम भी
और जब बहती है दुनिया
तो बहती दुनिया में बहता है दुनिया भर का दुःख और सच भी
बहती नदी में बहता है तभी
बहती दुनिया का सुसंगत सच भी
किंतु एक सच्चा-सच्चा सच है ये भी
कि क्यों हाज़िर-नाज़िर फ़िर-फ़िर
और क्यों कायम-मुकाम विसंगतियां अनेकों अनेक?
नदी को बहने दो
सूर्य को बढ़ने दो
शेर को गुर्राने दो
बर्फ पिघलने से ही नदी, नदी में नाव, नाव में कवि
कवि विचारों का किंतु हासिल तत्काल
नहीं कुछ भी...?
में बांचता हूं मेरा मैं
मैं सोचता हूं योजनाएं नित नई-नई
और हारता हूं मेरा मैं
मैं चुनता हूं मित्रताएं नित नई-नई
और हारता हूं मेरा मैं
उफ़! ये ग्रीष्म, ग्रीष्म का प्रकोप
पता नहीं कहां ले जाएगा मुझे?
मुझे एक टुकड़ा बर्फ़ चाहिए
मुझे एक गिलास शराब चाहिए
मुझे एक मुट्ठी बंद थोडा प्रेम चाहिए
मेरी मुट्ठी समुद्र नहीं, छोटा सा चुल्लू है
नदी को बहने दो

१०-हर हाल जीतेगा आदमी

जिन राहों पर सूना है
उन राहों पर मेरी चहल क़दमी दून है
जहां सूरज की रोशनी नमूना है
वहां मेरी हाज़िरी बेधड़क अलून है
प्रथ्वी छोटी है, पंख बड़े हैं
जो समुद्र के सामने खड़े हैं
हर हाल जीतेगा आदमी



११-कथावाचक सही है

मैं गलत हूं
कि महक रही है रातरानी
कथावाचक सही है
कि दहक रहा है सूर्ख गुलाब
क्या दहकता है
और महकता है क्या
ये सब तय करता है
कथावाचक ही
कथावाचक को तय करती है
सरकार
कथावाचक का गलत हो जाना
सरकार का गलत हो जाना है
गलत कैसे हो सकती है सरकार?
सरकार द्वारा तय किया गया
कथावाचक भी
कैसे हो सकता है गलत
मैं ही गलत हूं
जो सोचता हूं
कि महक रही है रातरानी
कथावाचक सही है

१२-इतिहास नहीं बदलता है

इतिहास नहीं बदलता है
बदलती हैं तारीख़े, बदलते हैं चेहरे
बदलता हूं मैं
तारीख़ें और चेहरे और इतिहास
इतिहास और इतिहास बदल देने के लिए
मानाकि चीज़ें नहीं बदलती हैं बेवज़ह
मानाकि इतिहास भी नहीं बदलता है बेवज़ह
मानाकि चेहरे भी नहीं बदलते हैं बेवज़ह
तो ज़ाहिर हुआ कि इतिहास नहीं बदलता है बेवज़ह
मैं इतिहास बदलना चाहता हूं
मैं इतिहास बदलता हूं किंतु बदलता नहीं हूं मैं
किंतु कहूं सच-सच तो वह है यही-यही
कि मैं करता हूं कोशिशें हज़ार-हज़ार
किंतु इतिहास नहीं बदलता है

Written By राजकुमार कुम्भज









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