विचारों को नियंत्रित करने के लिए संघ की नई रणनीति


हाल ही आरएसएस के लेखकों-बुद्धिजीवियों की एक बैठक में आरएसएस के नेताओं ने अपने लेखकों-बुद्धिजीवियों को यह आदेश  दिया कि वामपंथी लेखकों की तरह ज्यादा से ज्यादा लेखकों को प्रभावित करो, ऐसा साहित्य लिखो जिससे आम जनता हमारे करीब आए और युवा लेखक पैदा हों जो संघ की विचारधारा का प्रचार करें।

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संघ के नेता जानते हैं कि संघ की विचारधारा में लेखक-बुद्धिजीवी पैदा करने की क्षमता नहीं है। यह मूलतःबांझ विचारधारा है। संघ सत्ता पा सकता है,लेकिन लेखक तैयार नहीं कर सकता। लेखन के लिए स्वतंत्र दिमाग, स्वतंत्र विचार और लेखक के पास जोखिम उठाने की मनोदशा का होना बेहद जरूरी है। संघ के साथ जुड़कर कोई भी लेखक स्वाभाविक स्वतंत्र लेखन नहीं कर सकता। संघ में रहकर स्वतंत्र चिंतन-मनन,सवाल खड़े करना  और रोज नए वैचारिक संघर्षों में शामिल होना संभव नहीं है।

हिन्दुत्व बंद प्रकृति की विचारधारा है, यह स्वतंत्रता के निषेध पर आधारित है। स्वतंत्रता के बिना बेहतरीन लेखन संभव नहीं है। अनेक वाम संगठनों में भी यह समस्या है कि वे लेखक के स्वतंत्र चिंतन से परेशान होते हैं। वे उस चिंतन से जरूर परेशान होते हैं जो उनकी सांगठनिक विचारधारा के विरोध में हो। इसलिए वाम संगठनों के साथ भी लेखक का कभी-कभार पंगा हो जाता है।



वैसे वाम संगठनों में तुलनात्मक तौर पर लेखक के पंगे कम होते हैं, क्योंकि वाम संगठन  बड़े फलक में लेखक को सोचने और लिखने की स्वतंत्रता देते हैं। यही वजह है कि सांगठनिक विचारधारा और लेखकीय स्वातंत्र्य में जब अंतर्विरोध पैदा होता है तो वाम संगठन अपने लेखक को त्याग देते हैं। लेकिन आरएसएस जैसे संगठन की तो समस्या और भी गहरी है। वे तो हर चीज को हिन्दुत्व के नजरिए से देखते हैं। यह अपने-आपमें समस्यामूलक है। अच्छा वामपंथी उसे माना जाता है जो पार्टीलाइन से बंधा रहे। इसी तरह अच्छा संघी लेखक वह है जो संघी लाइन से बंधा रहे। यह सांगठनिक लाइन से बंधने का अर्थ है लेखन की मौत, स्वतंत्र लेखन का अंत।

इस समय हालात यह है कि आरएसएस के पक्ष में जो लोग लिख रहे हैं उनको सत्ता की ओर से व्यापक सम्मान-सत्कार मिल रहा है। इनाम-पद आदि भी मिल रहे हैं। इस समय जिस तरह के वैचारिक हमले हो रहे हैं उनके खिलाफ बुद्धिजीवियों–लेखकों और शिक्षकों की ओर से सबसे कम बोला जा रहा है। खासकर शिक्षकों में सन्नाटा पसरा हुआ है, वे पद और इनाम का लालच देकर लेखकों-शिक्षकों को अपनी ओर खींचने की कोशिश कर रहे हैं। विश्वविद्यालय-कॉलेज शिक्षकों में हिन्दुत्व की विचारधारा के प्रति आकर्षण साफ दिखाई दे रहा है। अधिकांश शिक्षक उनके द्वारा उठाए मसलों के खिलाफ बोलने से कतरा रहे हैं। संघ के हिंसाचार के खिलाफ उनमें कहीं पर भी आक्रोश नजर नहीं आता, उलटे संघ के साथ जुड़ने का भाव साफ नजर आता है।



शिक्षकों- बुद्धिजीवियों में अपने-आसपास के मसलों पर चुप्पी बेहद चिंतित करने वाला फिनोमिना है। इसके विपरीत संघ के संगठन अ-वास्तिवक घटना को खबर बनाने में मशगूल रहते हैं या फिर गलत सूचनाएं प्रसारित करते रहते हैं।  इनका टीवी से लगातार प्रसारण हो रहा है। शिक्षक-लेखक  टीवी द्वारा प्रक्षेपित सूचनाओं से अभिभूत हैं और उनको सही मानकर चल रहे हैं। यह भी कह सकते हैं जनता की बुद्धि को अपहृत करने लिए टीवी का संघ दुरूपयोग कर रहा है। बुद्धिजीवियों और शिक्षकों का अपने आसपास के घटनाक्रम पर चुप रहना अंततःआरएसएस को वैचारिक मदद कर रहा है।

संघ नियंत्रित मीडिया जिस तरह का डिस-इनफॉर्मेशन प्रचार चला रहा है वह अपने आपमें गंभीर चिंता का विषय है। इस प्रचार का चौतरफा असर देखने को मिल रहा है।यह प्रचार अभियान पंक्चर हो सकता है बशर्ते बुद्धिजीवी -शिक्षक अपने आसपास घटने वाली घटनाओं पर बोलें, लिखें। इस दौरान संघ ने जो मसले उठाएं हैं वे बेहद गंभीर हैं।

आरएसएस की नई रणनीति है ´अघटित घटना´को खबर बनाओ। उसके बाद गलत- सलत सूचनाएं मीडिया में प्रसारित करो। गोरक्षकों के हमले और गोमांस के बहाने अखलाक की हत्या और उसके प्रसंग में चलाया गया समूचा हंगामा, मीडिया मुहिम इसका ताजा उदाहरण है। इस सबका परिणाम यह निकला है कि मीडिया में घटना से संबंधित सत्य एक सिरे से गायब हो गया है। इसी तरह संघ के लोग मीडिया में इतिहास के नाम पर मनमानी बातें कह रहे हैं, मनगढ़ंत बातें बोल रहे हैं, कपोल कल्पित इतिहास पेश कर रहे हैं। इन सबको कायदे से मीडिया को सेंसर करना चाहिए, यह मीडिया आचार संहिता का खुला उल्लंघन है। लेकिन मीडिया उनको सेंसर नहीं कर रहा बल्कि अबाध रूप में प्रसारित कर रहा है, इस तरह के काल्पनिक इतिहास के खिलाफ शिक्षकों का हस्तक्षेप बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है लेकिन मीडिया से लेकर शिक्षा संस्थानों तक  संघ के विचारों के खिलाफ प्रतिवाद नजर ही नहीं आ रहा। संघ ने बड़ी खूबी के साथ समूचे विवाद को धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ मुहिम की आड़ में छिपा दिया है।



सत्य बताने के नाम पर आरएसएस ऐसी चीजों का प्रचार कर रहा है जो कभी घटित ही नहीं हुई हैं। इसने खबरों की प्रामणिकता को खत्म कर दिया है, हर चीज को लेकर भावुकताभरे हमले किए जा रहे हैं। जो संघ के विचारों का विरोध करता है उसे देशद्रोही कहा जा रहा है।असहमत होना राष्ट्रद्रोह की केटेगरी में शामिल कर दिया गया है। इसने बुद्धिजीवियों और शिक्षकों के मन में डर पैदा कर दिया है। इस डर से निकलने की जरूरतहै। टीवी एंकरों से लेकर प्रवक्ताओं तक झूठ को दोहराया जा रहा है, इन सबके खिलाफ रीयल टाइम में हस्तक्षेप करने की जरूरत है।

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