हिन्दी की रचनात्मकता अपने लिए बरसों बाद एक भिन्न शिल्प की तलाश कर रही है। जो संस्मरण होना चाहिए था वह संस्मरण नहीं है, समीक्षा भी है, जो कहानी होनी चाहिए वह बीज उपन्यास भी है, ज...
"जिस लाहौर नहीं वेख्या…. नाटक…. राजनीतिक नाटक नहीं है। हां यह संभव है कि विभाजन की पृष्ठभूमि होने के कारण राजनीति की अण्डरटोन सुनाई दे जाती हों। किन्तु कहीं भी राजनीति इस नाटक क...
'ई लेखकों ' और 'हिन्दी लेखकों ' में एक दूसरे के प्रति बेगाना भाव है। हमारे यहां कलम और कम्प्यूटर के बीच महा-अंतराल है। आज अधिकांश 'हिन्दी लेखक' 'ई लेखक' को जानते तक नहीं हैं। यह...
हुआ यूं कि मेरे अस्सी वर्ष पूरे होने पर अशोक वाजपेयी ने रजा फाउंडेशन की ओर से मेरा सम्मान किया. वहां उदय प्रकाश ने पिछड़ी जातियों के उत्थान की बात करते हुए कुछ ऐसी बातें कहीं जो...
प्रख्यात कथाकार और साहित्यिक पत्रिका “हंस” के संपादक राजेंद्र यादव ने हिंदी साहित्य में “जातिवादी विमर्श” का एटम बम पटका है। उन्होंने कहा है कि ब्राम्हणों के पास अमूर्त चीज़ों क...
पहले प्रभाष जोशी ने ब्राम्हणों की खूबियाँ बताईं और फिर एक दूसरे अंदाज़ में राजेंद्र यादव ने भी अपने अस्सीवें जन्मदिन पर आयोजित कार्यक्रम में ऐसा ही कुछ कह दिया। ज़ाहिर है कि हंग...
जनवादी लेखक संघ कमाल का संगठन है यह संगठन सामयिक संसार के साथ संवाद कम से कम करता है। विगत छह महीनों में इस संगठन की साहित्यिक पत्रिका 'नयापथ' के दो 'युवा अंक' आए हैं। इन ...