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मंगलेशजी, ये अँधकार युग नहीं है
जगदीश्वर चतुर्वेदी

मंगलेश डबराल सहृदय कवि‍ हैं। प्रमुख हिंदी कवि‍यों में उनकी गणना होती है। हाल ही उनका लेख 'चरनदास चोर नहीं'(लेख जनसत्ता में प्रकाशित हो चुका है ) नजरों के सामने से गुजरा। यह लेखक...

निरर्थक विवादों को छोड़ सार्थक बहस ...
रमेश उपाध्याय

हिन्दी भाषा और साहित्य का विकास न होने देना चाहने वाली शक्तियां आजकल यह देखकर परम प्रसन्न होंगी कि वे जो चाहती हैं, हिन्दी वाले स्वयं कर रहे हैं। कुछ दिन पहले वर्धा के महात्मा ग...

इस काइयाँपन से बाज आइए रूश्दी साहब!
जगदीश्वर चतुर्वेदी

अशोक वाजपेयी साहि‍त्‍य के धुरंधर वि‍द्वान हैं। परमादरणीय हैं। लेकि‍न लि‍खते हैं 'मासूमि‍यत' और 'चालाकी' के साथ। हाल ही में उन्‍होंने 'जनसत्ता'(6 सि‍तम्‍बर 2009) के स्तंभ 'कभी कभ...

हिंदी की नहीं विवादों की अकादमी
ओंकारेश्वर पांडे

हिंदी अकादमी में चल रहे महाभारत में कई चीज़ें दाँव पर लगी हैं। इसमें अकादमी के काम करने का ढंग, राजनीतिक और प्रशासनिक हस्तक्षेप, विभिन्न साहित्यिक गुटों की वैचारिक लड़ाईयाँ ...

समय को पहाचानने और उससे दो-दो हाथ क...
सत्यनारायण पटेल

(महोदय, मैं आपको अपना साक्षात्कार भेज रहा हूँ। मेरे से यह साक्षात्कार हँस मासिक पत्रिका द्वारा लिया गया था। कुछ इस तरह कि उन्होंने प्रश्नों की एक सूची भेजी थी और साथ में एक ...

कौन है यह नामवर के भेस में?
राजेन्द्र यादव

(साहित्यिक पत्रिका हंस का वार्षिक आयोजन वरिष्ठ समालोचक नामवर सिंह के विवादास्पद वक्तव्य के साथ ख़त्म हुआ था। इस कार्यक्रम में वे एकदम से फट पड़े थे और एक के बाद एक ऐसी बातें कही...

प्रगतिशील होने की क़ीमत चुकानी पड़ती...
सत्यनारायण पटेल

ख़ुद को वामपंथी या प्रगतिशील रचनाकार या कार्यकर्ता कहना बहुत आसान है। लेकिन इससे कई गुना कठिन है, इस राह पर सतत चलते रहना। वामपंथी रचनाकार या कार्यकर्ता होने की बहुत बड़ी क़ीमत च...

इस दीवाली में प्रलेस का भी कचड़ा सा...
काशीनाथ

जब पता चला कि बाबा ज्ञानरंजन (बाबा ज्ञानरंजन इसलिए कि हमारे शहर में एक बड़ी जमात उनको इसी नाम से पुकारती है.) ने प्रगतिशील लेखक संघ से इस्तीफा दे दिया है तो तकलीफ हुई फिर सोचा क...

इसे क्षमायाचना का अंतिम पाठ न समझें
उदयप्रकाश

हिंदी के सुप्रतिष्ठित कहानीकार एवं कवि उदयप्रकाश ने गोरखपुर में योगी आदित्यनाथ के हाथों से सम्मान क्या ले लिया मानो बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया हो। हिंदी लेखकों का एक बड़ा वर...

इसे मेरी क्षमायाचना का अंतिम पाठ न ...
उदयप्रकाश

यंत्रणा और आत्मद्वंद्व के अंधेरे दिन

मैंने और मेरे परिवार ने, एक...
अब हलफ़नामा दर्ज़ करना शायद ज़रूरी ...
विश्वरंजन

इधर प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान के द्वारा 10-11 जुलाई, 2009 को रायपुर में प्रमोद वर्मा के साहित्यिक अवदान तथा समकालीन आलोचना पर केंद्रित आयोजित 2 दिवसीय संगोष्ठी को लेकर कुछ विव...

जयप्रकाश जी, आपका मानस क्या है..?
मुकेश कुमार

वैसे तो आपके मानस को समझने के लिए देशकाल.कॉम के स्तंभकार उदयप्रकाश के लेख पर आपकी प्रतिक्रिया ही काफी होनी चाहिए थी। जिस तरह से आप सरकार के प्रवक्ता बनकर सामने आए हैं, उससे कोई ...

धर्म का मर्म नहीं समझते हिंदी के कू...
जगदीश्वर चतुर्वेदी

बुद्धि‍जीवि‍यों में धर्म 'इस्‍तेमाल करो और फेंको'से ज्‍यादा महत्‍व नहीं रखता। वे इसके साथ उपयोगि‍तावादी संबंध बनाते हैं। धर्म इस्‍तेमाल की चीज नहीं है। धर्म मनुष्‍यत्‍व की आत्‍म...

राजेंद्र यादव के नाम खुला पत्र
प्रेम जनमेजय

आदरणीय श्री राजेंद्र यादव जी,
परनाम,

साहित्य के इस तथाकथित असार संसार में ‘हंस’ को पढ़ने/देखने के, ‘जाकि रही भावना जैसी, प्रभु मूरति देखी तिन तैसी’ के अंदाज में अनेक ...

 
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