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(साहित्य)हिंदी >> मुक्तिबोध सप्ताह
 
 
इस तरह मना इंटरनेट में पहली बार किस...
जगदीश्वर चतुर्वेदी

इंटरनेट आधुनि‍क युग की लाइफलाइन है। वैसे ही मुक्‍ति‍बोध आधुनि‍क साहि‍त्‍य की लाइफलाइन है। आधुनि‍क युग की धड़कनों को सुनना,देखना और महसूस है तो आप नेट पर जाइए आपको सामयि‍‍क यथार्...

मनुष्‍य का महाख्‍यान है मुक्‍ति‍बोध
जगदीश्वर चतुर्वेदी

नामवर सिंह नि‍र्विवाद रूप से सबसे बड़े आलोचक हैं। लेकि‍न आलोचना में मुक्‍ति‍बोध की छाया का भी स्‍पर्श क्‍यों नहीं कर पाए ? मुक्‍ति‍बोध ने आलोचना को जि‍स जमीन पर ले जाकर छोड़ा था...

जबाबी गदर थे मुक्‍ति‍बोध
चंचल चौहान

मुक्तिबोध को कला को सिर्फ कला तक सीमित करके देखना उन्हें पसंद नहीं था । कला की सामाजिक पक्षधरताका उदघोष उन्होंने किया और इसी नजरिये से उन्होंने अपने समय के सभी साहित्यिक मसलों ...

मुक्तिबोध को मार्क्सवाद से नज़रिया ...
नित्यानंद तिवारी

जब मुक्तिबोध ने लिखना शुरू किया था, उस समय राजनीतिक दृष्‍टि‍ से समय बड़ा सक्रिय था, निर्णायक था। समाजवादी, मार्क्‍सवादी और मानव स्वातंत्र्यवादी विचारधाराएँ सक्रिय थीं। स्वाधीनता ...

संघर्ष और वि‍वि‍धता का महाकवि‍ मुक्...
मुरली मनोहर प्रसाद सिंह

मुक्तिबोध की रचनाओं के तीन चरण हैं। पहला 1934-35, दूसरा 1953 से 1959 और तीसरा 1959 से 1964 । अगर पहले चरण की कविताओं और कहानियों को साथ-साथ देखा जाए और समान प्रश्‍नों की आवाजाही...

मुक्तिबोध की बेमिसाल प्रेम कथा और उ...
जगदीश्वर चतुर्वेदी

हि‍न्‍दी का लेखक अभी भी नि‍जी प्रेम के बारे में बताने से भागता है। लेकि‍न मुक्‍ति‍बोध पहले हि‍न्‍दी लेखक हैं जो अपने प्रेम का अपने ही शब्‍दों में बयान करते हैं। मुक्‍ति‍बोध का अ...

नए जनवादी वि‍कल्‍प का आधार हैं मुक्...
अरुण माहेश्‍वरी

मुक्तिबोध की मृत्यु 1964 में हुई। जीवन में उन्होंने खूब लिखा। नेमीचंद जैन ने छ: खंडों में जो मुक्तिबोध रचनावली संकलित की है, उसके अतिरिक्त भी उनका लिखा काफी कुछ है। खुद नेमी जी ...

जनपक्षरता और पारदर्शिता के आदर्श थे...
शि‍वराम

मुक्‍ति‍बोध के बारे में आज कोई भी पुनर्पाठ अमेरि‍की साम्राज्‍यवाद और सांस्‍कृति‍क राष्‍ट्रवाद को दरकि‍नार करके नहीं बनाया जा सकता है। आज सारी दुनि‍या अमेरि‍की साम्राज्‍यवाद की आ...

मुक्तिबोध ने मार्क्सवाद का अतिक्रमण...
अशोक वाजपेयी

बड़े लेखक के सामने एक समस्‍या नहीं होती ।अनेक समस्‍याएं होती हैं। यह स्‍थि‍ति‍ मुक्‍ति‍बोध की भी है। समस्‍या बहुलता एक स्‍तर पर छायावादी भाषा संस्‍कार की थी ,उस समय के जो छायावा...

मजदूरबोध का महान कवि‍ मुक्‍ति‍बोध
वि‍श्‍वनाथ त्रि‍पाठी

सबसे पहली बात यह कि‍ मुक्‍ति‍बोध अखण्‍ड भाकपा के सदस्‍य थे। शमशेरबहादुर सिंह ने 'चॉंद मुँह टेढ़ा है' की जो भूमि‍का लि‍खी है , उसमें लि‍खा है , वे मजदूरों के जुलूसों में भाग लेते...

वे हि‍न्‍दी को साहि‍त्‍य के शि‍खर प...
महेन्‍द्र 'नेह'

गजानन माधव मुक्तिबोध हमारे समय के उन अग्रणी रचनाकारों में हैं। जिन्होंने देशकाल और परिस्थितियों की त्रासद सचाइयों और उसके साधारण जन पर पड़ने वाले प्रभावों की पड़ताल पूरी शिद्दत से...

सांप्रदायिक स्टीरियोटाइप से नफ़रत थ...
जगदीश्वर चतुर्वेदी

भारत की सबसे बड़ी समस्‍या है साम्‍प्रदायि‍कता। मुक्‍ति‍बोध हि‍न्‍दी का पहला लेखक है जो साम्‍प्रदायि‍क स्‍टीरि‍योटाइप को चुनौती देता है। हि‍न्‍दी में साम्‍प्रदायि‍क स्‍टीरि‍योटाइ...

स्‍वाधीनता समीक्षा के बड़े आलोचक है...
सुधीश पचौरी

मुक्‍ति‍बोध की चि‍न्‍ता के केन्‍द्रीय वि‍षय हैं प्रेम और सौंदर्य। बुनि‍यादी प्रश्‍न मुक्‍ति‍बोध की कवि‍ता में ही आ गया है-

'समस्‍या एक -
मेरे सभ्‍य नगरों और ग...

मुक्तिबोध हिंदी आलोचना के सर्वोत्तम...
चंचल चौहान

हमारी हिंदी की आधुनिक आलोचना विधा जो कि उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशकों में शुरू हुई थी अब काफी आगे बढ़ चुकी है। वह विश्व के किसी भी साहित्य से पीछे नहीं है। उसका भूमंडलीकरण काफी पह...

सि‍द्धान्‍त और व्‍यवहार का मसीहा मु...
चंचल चौहान

मुक्तिबोध की आलोचना पद्धति में सिद्धांत और व्यवहार साथ साथ चलते हैं । हिंदी के बहुत से आचार्य और आलोचक सिद्धांत बघार कर अपने दायित्व से मुक्त हो जाते हैं। जबकि सिद्धांत तो बहुत ...

कविता ब्रम्हराक्षस
गजानन माधव मुक्तिबोध
शहर के उस ओर खंडहर की तरफ़
परित्यक्त सूनी बावड़ी
के भीतरी
ठण्डे अंधेरे में
बसी गहराइयाँ जल की...
सीढ़ियाँ डूबी अनेकों
उस पुराने घिरे पानी में...
स...
धूर्तता और मूर्खता के जीवंत नायक हम...
जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

मुक्‍ति‍बोध के बारे में एक बात जरूर माननी पड़ेगी कि उनकी नजर पैनी थी, और यथार्थ पर गहरी पकड़ थी। यह बात मैंने कल नि‍खि‍ल दा से कही थी कि हि‍न्‍दी में एक ऐसा भी लेखक था जो साहि‍त...

मुक्‍ति‍बोध ने काव्‍य शि‍ल्‍प के नए...
मैनेजर पांडेय

हि‍न्‍दी के प्रख्‍यात आलोचक और जवाहरलाल नेहरू वि‍श्‍ववि‍द्यालय के भ़ू.पू. प्रोफेसर मैनेजर पांडेय से दिल्ली वि. वि. में हिंदी की एसोसिएट प्रोफेसर सुधा सिंह ने देशकाल के लिए म...

इस युग के सबसे बड़े वि‍चारक हैं मुक...
शि‍वकुमार मि‍श्र

स्‍वतंत्र भारत के सबसे बड़ वि‍चारक हैं मुक्‍ति‍बोध। उन्‍हें न तो देवता बनाने जरूरत है और न पूजने की जरूरत है। व्‍यक्‍ति‍गत और साहि‍त्‍यि‍क ईमानदारी में उनका कोई जबाव नहीं है। उन...

इंटरनेट पर मुक्‍ति‍बोध सप्‍ताह (13-...
जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

आज मुक्‍ति‍बोध का जन्‍मदि‍न है। इंटरनेट पर मुक्‍ति‍बोध का आना नयी घटना नहीं है। मुक्‍ति‍बोध के युवा भक्‍तों ने अनेक स्‍थलों पर मुक्‍ति‍बोध का प्रचार कि‍या है। अभी ये लोग मुक्‍ति...

 
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