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मंगलेशजी, ये अँधकार युग नहीं है
जगदीश्वर चतुर्वेदी

मंगलेश डबराल सहृदय कवि‍ हैं। प्रमुख हिंदी कवि‍यों में उनकी गणना होती है। हाल ही उनका लेख 'चरनदास चोर नहीं'(लेख जनसत्ता में प्रकाशित हो चुका है ) नजरों के सामने से गुजरा। यह लेखक...

हबीब तनवीर का मरणोत्तर अपमान
कभी-कभार/ अशोक वाजपेयी
हालाँकि हबीब तनवीर की मृत्यु को दो महीने होने आए,उन पर टिप्पणियों और लेखों और कुल मिलाकर,उनके यशोगान का सिलसिला थमा नहीं है। यह हमें बताता है कि हमारे समय के इस मूर्धन्य ने हमारे स...
साहित्य में आशावादी संकेत-स्वयं प्र...
गणेशलाल मीणा, उदयपुर से

हिन्दी की रचनात्मकता अपने लिए बरसों बाद एक भिन्न शिल्प की तलाश कर रही है। जो संस्मरण होना चाहिए था वह संस्मरण नहीं है, समीक्षा भी है, जो कहानी होनी चाहिए वह बीज उपन्यास भी है, ज...

निरर्थक विवादों को छोड़ सार्थक बहस ...
रमेश उपाध्याय

हिन्दी भाषा और साहित्य का विकास न होने देना चाहने वाली शक्तियां आजकल यह देखकर परम प्रसन्न होंगी कि वे जो चाहती हैं, हिन्दी वाले स्वयं कर रहे हैं। कुछ दिन पहले वर्धा के महात्मा ग...

आखिरकार भेड़ें और भेड़िए ही बदलते हैं...
संजय ग्रोवर की कविताएं

जो सयाने समय के पीछे-पीछे चलते थे
और वो भी बड़ी सावधानी से
एक निश्चित फासला बनाए रखते हुए
मगर अवसर देखते ही पूरे कौटिल्य के साथ
चोटी को पौनीटेल में बदल लेने की धूर्तत...

इस काइयाँपन से बाज आइए रूश्दी साहब!
जगदीश्वर चतुर्वेदी

अशोक वाजपेयी साहि‍त्‍य के धुरंधर वि‍द्वान हैं। परमादरणीय हैं। लेकि‍न लि‍खते हैं 'मासूमि‍यत' और 'चालाकी' के साथ। हाल ही में उन्‍होंने 'जनसत्ता'(6 सि‍तम्‍बर 2009) के स्तंभ 'कभी कभ...

आलोचना में लोकतंत्र का मतलब
जगदीश्वर चतुर्वेदी

'उपलब्ध' आलोचना का कच्चा माल है।'अनुपलब्ध' आलोचना का मौलिक तत्व है। आलोचना में जनतंत्र का विकास तब होता है जब आलोचना 'अनुपलब्ध' की तरफ ध्यान देती है। परिवर्तनकामी विच...

हिंदी की नहीं विवादों की अकादमी
ओंकारेश्वर पांडे

हिंदी अकादमी में चल रहे महाभारत में कई चीज़ें दाँव पर लगी हैं। इसमें अकादमी के काम करने का ढंग, राजनीतिक और प्रशासनिक हस्तक्षेप, विभिन्न साहित्यिक गुटों की वैचारिक लड़ाईयाँ ...

ग़ज़ल
-संजय ग्रोवर-
-1- पागलों की इस कदर कुछ बदगु़मानी बढ़ गयी उनके हिस्से की दवा भी हमको खानी पड़ गयी उनको कांधा देने वाली भीड़ थी, भगवान था हमको अपनी लाश आखिर खुद उठानी पड़ गयी भ...
ग़ज़ल/
-प्राण शर्मा-
-1- पालकी में बैठ कर आया करो ऐ जिंदगी हर किसी को हर घड़ी भाया करो ऐ जिंदगी काला काला टीका माथे पर तुम्हारे चाहिए...
आंदोलन एवं विमर्श में घनिष्ठ संबंध ...
पी एन. राजेशकुमार
केरल में समकालीन हिन्दी लेखकों की देन विषय पर त्रिदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी
कैथोलिकेट कालेज, पत्तनम्तिट्टा (केरल) के हिन्दी विभाग के तत्वावधान में दिनांक 27-29 अक्टूबर को ‘समकाल...
कहानी/ उसने कहा था
चंद्रधर शर्मा गुलेरी
चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी "उसने कहा था" हिंदी कथा साहित्य में मील का पत्थर मानी जाती है। इसे नई कहानियों की शुरूआत के रूप में भी रेखांकित किया जाता है। ...
कविता-कुकुरमुत्ता
सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"
आया मौसम खिला फ़ारस का गुलाब, बाग पर उसका जमा था रोबोदाब वहीं गंदे पर उगा देता हुआ बुत्ता उठाकर सर शिखर से अकडकर बोला कुकुरमुत्ता अबे, सुन बे गुलाब भूल मत जो पा...
सबसे ख़तरनाक है सपनों का मर जाना
-अवतार सिंह पाश-
पंजाब के क्रांतिकारी कवि अवतार सिंह पाश की एक-एक कविता सत्ता और व्यवस्था से संघर्ष का ज़िंदा दस्तावेज़ है। वे शहीद भगत सिंह की परंपरा के सिपाही थे और 1988 में सिख उग्रवादियों ने उन...
ग़ज़ल
-आलोक श्रीवास्तव-
विदिशा मध्यप्रदेश के रहने वाले आलोक श्रीवास्तव ने बहुत कम समय में एक शायर और कवि के रूप में अपनी पहचान बनाई है। ऊर्दू के ख्यात शायरों की पुस्तकों का संपादन कर चुके आलोक की रचनाएं स...
ज्ञान और सत्य से भागता हिन्दी का बु...
सुधा सिंह

मार्शल मैकलुहान ने लिखा है कि आधुनिक युग में पुस्तकें यश और अमरत्व प्राप्त करने का जरिया हैं। ऐसा उन्होंने पुस्तक की ताक़त को देखते हुए लिखा था। लेकिन आधुनिक पल्लवग्राही बुद्धीज...

"जिस लाहौर नहीं वेख्या-राजनीतिक नाट...
लंदन से दीप्ति कुमार

"जिस लाहौर नहीं वेख्या…. नाटक…. राजनीतिक नाटक नहीं है। हां यह संभव है कि विभाजन की पृष्ठभूमि होने के कारण राजनीति की अण्डरटोन सुनाई दे जाती हों। किन्तु कहीं भी राजनीति इस नाटक क...

तैयब के चित्र कम बोलते थे, मर्म खोल...
कभी-कभार/अशोक वाजपेयी
कैसा दुस्संयोग है कि इधर एक-दो महीनों के अंदर अनेक मूर्धन्य हमें छोड़कर चले गए। पहले हबीब तनवीर, फिर उस्ताद अली अकबर ख़ाँ। इस सप्ताह के आरंभ में जर्मन कोरियोग्राफर पीना बाउश नहीं र...
' ई लेखक " असली वारिस हैं भारतेन्दु...
जगदीश्वर चतुर्वेदी

'ई लेखकों ' और 'हिन्दी लेखकों ' में एक दूसरे के प्रति बेगाना भाव है। हमारे यहां कलम और कम्प्यूटर के बीच महा-अंतराल है। आज अधिकांश 'हिन्दी लेखक' 'ई लेखक' को जानते तक नहीं हैं। यह...

जातिवाद और बुद्घिजीवी
राजेन्द्र यादव

हुआ यूं कि मेरे अस्सी वर्ष पूरे होने पर अशोक वाजपेयी ने रजा फाउंडेशन की ओर से मेरा सम्मान किया. वहां उदय प्रकाश ने पिछड़ी जातियों के उत्थान की बात करते हुए कुछ ऐसी बातें कहीं जो...

समय को पहाचानने और उससे दो-दो हाथ क...
सत्यनारायण पटेल

(महोदय, मैं आपको अपना साक्षात्कार भेज रहा हूँ। मेरे से यह साक्षात्कार हँस मासिक पत्रिका द्वारा लिया गया था। कुछ इस तरह कि उन्होंने प्रश्नों की एक सूची भेजी थी और साथ में एक ...

मेरे अपने पूर्वग्रह
कभी-कभार/अशोक वाजपेयी
सबके पूर्वग्रह होते हैं-संतों और ईश्वर को छोड़कर। या शायद संतों के भी होते हैं, भले आध्यात्मिक। कुछ लोग उन्हें खुले मन से स्वीकार करते हैं, कुछ उन्हें चतुराई या जतन से दबा-छिपाकर र...
दरअसल/कोसल में विचारों की कमी है।
-श्याम कश्यप-
सभा-सम्मेलन,सेमिनार में जाने की इच्छा नहीं होती। अकादमिक आयोजनों में तो पहले भी अपने भरसक नहीं जाता था। घिसे-पिटे विषय और उनके मूर्खतापूर्ण निष्कर्षों से उबकाई आती थी। ऊब और खीझ तो...
दो बसंत कविताएं
शशिधर खां
इन आँखों को कभी न भाती ये हरियाली हरी-भरी मस्त होएं क्या इस बसंत में मेरी प्याली नहीं भरी दो पाए की खटमल चौकी टूटे खाट बिछाए हैं ना झाँके झोपड़ में जाए हम तो आस लगाए हैं बस...
शि‍वकुमार मि‍श्र का 80 वें वर्ष में...
जगदीश्वर चतुर्वेदी

हिंदी में जन्‍मदि‍न मनाने की परंपरा का दो ही लेखक नि‍र्वाह,नामवर और राजेन्‍द्र यादव। वैसे बाकी लेखक भी जन्‍मदि‍न मनाते तो अच्‍छा होता। ये दोनों हिंदी के सैलीबरेटी लेखक हैं। लेकि...

कौन है यह नामवर के भेस में?
राजेन्द्र यादव

(साहित्यिक पत्रिका हंस का वार्षिक आयोजन वरिष्ठ समालोचक नामवर सिंह के विवादास्पद वक्तव्य के साथ ख़त्म हुआ था। इस कार्यक्रम में वे एकदम से फट पड़े थे और एक के बाद एक ऐसी बातें कही...

अपरंच समाचार ये है कि..........
संपादक

अपरंच समाचार ये है कि मशहूर कथाकार, कवि, फिल्मकार, चित्रकार और पत्रकार उदयप्रकाश अब देशकाल पर एक नियमित स्तंभ लिखने जा रहे हैं। उनके इस स्तंभ का नाम होगा-अप...

उदयप्रकाश की नई कहानी "आवरण"
-देशकाल की ख़ास पेशकश-

उदय प्रकाश निर्विवाद रूप से हमारे दौर के सर्वाधिक महत्वपूर्ण, चर्चित, प्रशंसित, पठित और विवादित कहानीकार हैं। उनके कई कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं और उनकी कई कहानियों पर फि...

कभी-कभार/ “हमें खोजता वह”
-अशोक वाजपेयी-
अपने दुख की बात मत करो.....वह बोल रहा है। हर कहीं उसे मत खोजो.....वह तुम्हें खोज रहा है। एक चींटी का पग पत्ती छूता है, वह उसे महसूस करता है; एक नदी के तल में एक बटिया खिसक...
प्रकाशित संपादकों के लिए एक अप्रकाश...
-संजय ग्रोवर-
पिछले दिनों कुछ पत्र-पत्रिकाओं और वेबज़ीनों पर निर्देश जारी हुए हैं कि लेखकगण अपनी अप्रकाशित और मौलिक रचनाएं ही भेजें। मानाकि मौलिकता एक विवादास्पद और ग़ैरज़रुरी मसला है मगर संपादकों ...
बेकार का विवाद
राजेन्द्र यादव
जाने-माने कथाकार और साहित्यिक पत्रिका हंस के संपादक राजेंद्र यादव ने भगवानदास मोरवाल के विवादास्पद उपन्यास“रेत”को लेकर उठाए जा रहे विवाद पर चिंता ज़ाहिर की है और कहा है कि इस विवाद...
हंस की गोष्ठी में फट पड़े नामवरजी
साहित्य संवाददाता
ऐसे समय में जब राजनीति में राहुल गाँधी और युवा नेतृत्व का चर्चा चल रहा हो तो हंस के सालाना सेमिनार के लिए युवा रचनाशीलता को चुनने के पीछे आख़िर क्या मक़सद हो सकता है,....क्या राजें...
नई पहल का मुकाम
कभी-कभार/ अशोक वाजपेयी
पहले भी मन हुआ था कि कुछ सुझाव देने का वक्त आ गया है। पर इस डर से नहीं दिए कि कहीँ ऐसी सरकार न बन जाए जो उन्हें इसलिए सिरे से खारिज़ कर दे कि वे एक छद्म निरपेक्षतावादी द्वारा दिए ग...
नामवरजी को फिनामिना के रूप में देखन...
जगदीश्वर चतुर्वेदी

वह साहि‍त्‍य में जि‍तना चर्चित है, नेट पाठकों में भी उतना ही चर्चित है। वह व्‍यक्‍ति नहीं फि‍नोमि‍ना है। वह आलोचक है,शि‍क्षक है,श्रेष्‍ठतम वक्‍ता है,हि‍न्‍दी का प्रतीक पुरूष है।...

राजेंद्र यादव का अस्सीवाँ जन्मदिन
देशकाल फोटोफीचर

कथाकार और हंस के संपादक राजेंद्र यादव का जन्मदिन हर साल धूमधाम से मनता है। ये धूम-धड़ाका कुछ अलग ढंग का भी होता है। इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ। कहने को तो उनके जन्मदिन पर उनकी पुत...

अब राजेंद्र यादव ने साहित्य में देख...
साहित्य संवाददाता

प्रख्यात कथाकार और साहित्यिक पत्रिका “हंस” के संपादक राजेंद्र यादव ने हिंदी साहित्य में “जातिवादी विमर्श” का एटम बम पटका है। उन्होंने कहा है कि ब्राम्हणों के पास अमूर्त चीज़ों क...

कहानी/ शतरंज के खिलाड़ी
मुंशी प्रेमचंद

-शतरंज के खिलाड़ी मुंशी प्रेमचंद की अलग मिजाज़ की कहानी है। इसमें उन्होंने वाजिद अली शाह के शासनकाल के दौरान शासक वर्ग की विलासिता और स्वार्थपरता पर चोट की है। उनकी इस कहानी पर ...

चर्चा हमारा/ माँ की छवियों को सलाम
-मैत्रेयी पुष्पा-
पिछले दिनों अजीब माज़रा सामने आया, जब दो राजनैतिक स्त्रियों में महज़ इसलिए ठन गई कि-तू मॉ नहीं है मैं मॉ हूँ। दलील यह थी कि जो माँ नहीं बनती वह दर्दमंद नहीं होती, निपूती और कठकरेज ...
मुझे खेद है,मैं अपने स्टैंड को रिवा...
वरिष्ठ लेखक राजेंद्र यादव से बातचीत

पहले प्रभाष जोशी ने ब्राम्हणों की खूबियाँ बताईं और फिर एक दूसरे अंदाज़ में राजेंद्र यादव ने भी अपने अस्सीवें जन्मदिन पर आयोजित कार्यक्रम में ऐसा ही कुछ कह दिया। ज़ाहिर है कि हंग...

भाषा से खिलवाड़ तो मत कीजिए!
राजेश त्रिपाठी

इन दिनों कुछ तो हिंदी में बुरी तरह से घुसपैठ कर रही अंग्रेजियत और कुछ भाषा के अज्ञान के चलते बड़ा अनर्थ हो रहा है। हमारी वह भाषा जो एक तरह से हमारी मां है, हमारी अभिव्यक्ति का ज...

विवाद
"रेत" पर बवाल और लेखकों की चुप्पी
फिर एक लेखक ख़तरे में है और लेखक बिरादरी सोई हुई है। निशाने पर सुपरिचित उपन्यासकार भगवानदास मोरवाल हैं और उनके ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ रखी है उत्तरप्रदेश की गिहार जनजाति की महिलाओं ने। ...
प्रगतिशील होने की क़ीमत चुकानी पड़ती...
सत्यनारायण पटेल

ख़ुद को वामपंथी या प्रगतिशील रचनाकार या कार्यकर्ता कहना बहुत आसान है। लेकिन इससे कई गुना कठिन है, इस राह पर सतत चलते रहना। वामपंथी रचनाकार या कार्यकर्ता होने की बहुत बड़ी क़ीमत च...

आज का युवा कहाँ है "नया पथ" के युवा...
जगदीश्वर चतुर्वेदी

जनवादी लेखक संघ कमाल का संगठन है यह संगठन सामयि‍क संसार के साथ संवाद कम से कम करता है। वि‍गत छह महीनों में इस संगठन की साहि‍त्‍यि‍क पत्रि‍का 'नयापथ' के दो 'युवा अंक' आए हैं। इन ...

दरअसल/ किसान आत्महत्या न करें तो क्...
-श्याम कश्यप-
नागपुर और वर्धा पहले भी कई बार आ चुका था। इन्दिरा गांधी के दौर में वर्धा से मेरे बुजुर्ग मित्र (तब सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री) वसंत साठे सांसद थे और राजीव गांधी के दौर में वासि...
कभी-कभार/राजेंद्र यादव का आत्मस्वीक...
-अशोक वाजपेयी-
पहला तो यही कि यह उम्मीद करके नहीं गए थे कि इन दिनों शीर्षक से दिल्ली सरकार की हिंदी अकादेमी द्वारा आयोजित कार्यक्रम में कथाकार-संपादक और विचारक राजेंद्र यादव कुछ आत्म स्वीकृतिया...
ज़िन्दा रहने के पीछे अगर सही तर्क न...
-धूमिल-

सुदामा प्रसाद पाँडेय"धूमिल" बीसवीं सदी के प्रमुख कवि थे। अड़तीस साल की उम्र में ही उनकी मृत्यु हो गई थी मगर इस अल्पायु में ही उन्होंने जो कुछ लिखा वह एक अलग छाप छोड़ गया। आज भी ...

मोचीराम
-धूमिल-

सुदामा प्रसाद पाँडेय"धूमिल" बीसवीं सदी के प्रमुख कवि थे। अड़तीस साल की अल्पायु में ही उनकी मृत्यु हो गई थी मगर उनकी कविताएं आज भी लोगों की ज़बान पर रहती हैं। उनकी कविताओं में सम...

एक भाषा हुआ करती है
साहित्य संवादददाता

"आपके शब्द और काव्य ही नहीं, सोच-जो दलितों-पीड़ितों की भाषा में गूँथा है...........हमसे लोकार्पण कराने से धन्य हूँ।"
ये शब्द जानी-मानी पर्यावरण कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने उदयप्...

कहानी/ पूस की रात
प्रेमचन्द

हल्कू ने आकर स्त्री से कहा– सहना आया है। लाओ, जो रुपये रखे हैं, उसे दे दूँ, किसी तरह गला तो छूटे।

मुन्नी झाड़ू लगा रही थी। पीछे फिरकर बोली-तीन ही रुपये हैं, दे दोगे तो क...

“अ से अस्तु का”
कभी-कभार/अशोक वाजपेयी
आम तौर पर किसी पहले पढ़े उपन्यास को दुबारा पढ़ने में एक उलझन ये होती है कि आपको उसकी कथा या चरित्र या घटनाएं या प्रसंग याद आते रहते हैं और उपन्यास के माध्यम से सचाई का जो टुकड़ा पह...
तीन कविताएं
-प्रियदर्शन-
गुस्सा और चुप्पी...... बहुत सारी चीज़ों पर आता है गुस्सा सबकुछ तोड़फोड़ देने, तहस-नहस कर देने की एक आदिम इच्छा उबलती है जिस पर विवेक धीरे-धीरे डालता है ठंडा पानी ...
दो कविताएं
।। विचार ।।
दफ़ना आए थे उन्हें वे लोग पहाड़ों के पार गहरी कब्रों के भीतर लेकिन वहीं हरी-हरी दूब उग आई है। भीतर की नन्हीं-नन्हीं जीवित धुकधुकियाँ भूरी जड़ों की उँगलियाँ पकड़कर बाहर...
साधौ जग बौराना
कायर कौम अमेरिका, फिर काहे ऐंठे मूँ...
अमेरिका के अटार्नी जनरल एरिक होल्डर का कहना है कि अमेरिकी लोग कायर होते हैं। उनके मुताबिक अमेरिकी कायर इसलिए होते हैं क्योंकि वे नस्ली मामलों पर बातचीत करने से घबराते हैं, कतराते ह...
महेश कटारे को कथाक्रम सम्मान
पल्लव कुमार

कथाक्रम-आयोजन का प्रारंभ करते हुए शैलेन्द्र सागर ने अपनी मां को याद किया जिन्होंने पिछले दिनों दुनिया को अलविदा कह दिया था। शैलेन्द्र सागर ने अपनी मां पर बेहद मार्मिक संपादकीय '...

व्यंग्य/ वह जो आदमी है न
हरिशंकर परसाई


निंदा में विटामिन और प्रोटीन होते हैं. निंदा खून साफ करती है, पाचन-क्रिया ठीक करती है, बल और स्फूर्ति देती है. निंदा से मांसपेशियां पुष्ट होती हैं. निंदा पायरिया का तो शर्ति...

कहाँ चीन और कहाँ हम
कभी-कभार/अशोक वाजपेयी

इस पर बहस की गुंज़ाइश है कि हम आर्थिक विकास के मामले में चीन से स्पर्धा कर पा रहे हैं या नहीं। बरत के मुकाबले चीन का आज की दुनिया में अधिक दबदबा है, इसमें शक करने की गुंज़ाइश नह...

आलोक श्रीवास्तव को दुष्यंत कुमार पु...
-कुमार संभव-

मध्यप्रदेशअधिक जानें

कहानी/ टोबा टेक सिंह
-सआदत हसन मंटो-
बंटवारे के दो-तीन साल बाद पकिस्तान और हिंदुस्तान की सरकारों को ख्याल आया कि साधारण कैदियों की तरह पागलों का भी तबादला होना चाहिए। यानी जो मुसलमान पागल हिंदुस्तान के पागलखाने में है...
मेरे वतन के लोगों, मुखातिब मैं तुमस...
-प्राण शर्मा-
मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ क्यों कर रहे हो आज तुम उल्टे तमाम काम अपने दिलों की तख्तियों पे लिख लो ये कलाम तुम बोओगे बबूल तो होंगे ...
इस दीवाली में प्रलेस का भी कचड़ा सा...
काशीनाथ

जब पता चला कि बाबा ज्ञानरंजन (बाबा ज्ञानरंजन इसलिए कि हमारे शहर में एक बड़ी जमात उनको इसी नाम से पुकारती है.) ने प्रगतिशील लेखक संघ से इस्तीफा दे दिया है तो तकलीफ हुई फिर सोचा क...

लेखकों का सम्मान और सरकारी टुच्चापन
अजित राय,लंदन से

इस समय भारत से बाहर हिन्दी भाषा और साहित्य में जो कुछ लिखा पढ़ा जा रहा है उसका सीधा सम्बन्ध अमरीका और ब्रिटेन से है। हिन्दी की नई वैश्विक पीढ़ी का मुख्य आकर्षण अमरीका और ब्रिटेन ह...

व्यंग्य/ साधौ जग बौराना
कल्याणकारी मिशन पर कल्याण सिंह
कल्याण सिहं एक बार फिर कल्याण करने निकल पड़े हैं...इस बार मसाजवादी पार्टी और उनके कर्णधारों का। दरअसल, वे निकले नहीं हैं, उन्हें मसाजवादी नेता अमर सिंह ने निकाला है। वैसे वे भी निक...
हिंदी समय में विचारों की कमी
-देशकाल-
हिंदी में विचार-विमर्श कितना सुस्त और पिछड़ा हुआ है इसका अंदाज़ा आप किसी सेमिनार, परिचर्चा में जाकर लगा सकते हैं। चिंतन और दर्शन के स्तर पर नवीनता की उम्मीद करना रेगिस्तान में पानी...
"अरेबा परेबा" के मराठी अनुवाद को पु...
देशकाल संवाददाता

विख्यात हिंदी कथाकार उदयप्रकाश के बहुचर्चित कहानी संग्रह "अरेबा परेबा" को मराठी के बालशास्त्री जांभेकर पुरस्कार देने की घोषणा की गई है। बाल शास्त्री मराठी पुनर्जागरण के प्रणेताओ...

अभी मरा नहीं है लेखक.......!
-उदयप्रकाश-
हम ऐसे समय में रह रहे हैं जब लेखक की मृत्यु की घोषणा बहुत से विद्वानों द्वारा पहले ही की जा चुकी है। इतिहास के अंत के साथ ही लेखक की मृत्यु की बात भी इतनी बार कही गई है कि ये अब ए...
आलोक, पवन करण को ऋतुराज सम्मान
देशकाल संवाददाता

नई दिल्ली की साहित्यिक संस्था "परंपरा" ने इस बार प्रतिष्ठित 'ऋतुराज सम्मान-2009' के लिए मध्यप्रदेश के युवा ग़ज़लकार आलोक श्रीवास्तव को चुना है. आलोक को यह सम्मान उनके चर्चित ग़ज...

धुनों की अविस्मरणीय यात्रा
मुकेश कुमार

अभी ज़्यादा वक्त नहीं गुज़रा है जब रेडियो पर फिल्मी गानों की उद्घोषणा के समय गाने के बोल के साथ-साथ गायक-गायिका और संगीतकार का नाम भी ज़रूर बताया जाता था। फिल्म संगीत के चाहने व...

सो वो भी आदमी
कभी कभार/ अशोक वाजपेयी
हबीब तरनवीर के देहावसान की ख़बर, यहाँ की बड़ी सुबह, वेनिस में चित्रकार अखिलेश और छोटे भाई उदयन के मोबाइल संदेशों से मिली। इसके पहले भोपाल से किसी हितैषी ने उनकी तबीयत बहुत ख़राब और...
जिन्होंने हमारी “आदमी” से पहचान करा...
-अशोक वाजपेयी-

अधिक जानें

इस तरह मना इंटरनेट में पहली बार किस...
जगदीश्वर चतुर्वेदी

इंटरनेट आधुनि‍क युग की लाइफलाइन है। वैसे ही मुक्‍ति‍बोध आधुनि‍क साहि‍त्‍य की लाइफलाइन है। आधुनि‍क युग की धड़कनों को सुनना,देखना और महसूस है तो आप नेट पर जाइए आपको सामयि‍‍क यथार्...

प्रमोद वर्मा की याद में
कभी-कभार/ अशोक बाजपेयी

वे गजानन माधव मुक्तिबोध और हरिशकर परसाई के सहचर थे, किसी हद तक श्रीकांत वर्मा के भी। मुक्तिबोध को उनके जीवनकाल में यह जताने वाले कि वे एक बड़े लेखक हैं, जो छह-सात लोग थे उनमें स...

कभी-कभार/ अशोक वाजपेयी
फिर पुणे में..........
आयुका यानी इंटर यूनीवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रोफिजिक्स एंड एस्ट्रोनॉमी पुणे में बरसों से सक्रिय है। विश्वविद्यालय के परिसर में उसका चार्ल्स कोरिया द्वारा आकल्पित अपना सुंदर और सुप्रब...
चर्चा हमारा
मैत्रयी पुष्पा
आपको ये जानकर खुशी होगी कि जानी-मानी कथाकार मैत्रेयी पुष्पा देशकाल में पाक्षिक स्तंभ लिखने के लिए सहमत हो गई हैं। जैसा कि आप जानते ही होंगे पुष्पाजी ने चाक,अल्मा कबूतरी और इदन्नमम्...
हाशिए पर पड़े लोगों पर गंभीर पुस्तक ...
डॉ. पल्लव
हाशिए पर पड़े लोगों का उन्नयन किसी भी सजग नागरिक के लिए चिंता का विषय है। समाजशास्त्री के लिए यह चुनौती है कि वह इन लोगों के लिए बेहतर का मार्ग समाज और व्यवस्था को सुझाए। सुप्रसिद्ध...
मनुष्‍य का महाख्‍यान है मुक्‍ति‍बोध
जगदीश्वर चतुर्वेदी

नामवर सिंह नि‍र्विवाद रूप से सबसे बड़े आलोचक हैं। लेकि‍न आलोचना में मुक्‍ति‍बोध की छाया का भी स्‍पर्श क्‍यों नहीं कर पाए ? मुक्‍ति‍बोध ने आलोचना को जि‍स जमीन पर ले जाकर छोड़ा था...

जबाबी गदर थे मुक्‍ति‍बोध
चंचल चौहान

मुक्तिबोध को कला को सिर्फ कला तक सीमित करके देखना उन्हें पसंद नहीं था । कला की सामाजिक पक्षधरताका उदघोष उन्होंने किया और इसी नजरिये से उन्होंने अपने समय के सभी साहित्यिक मसलों ...

मुक्तिबोध को मार्क्सवाद से नज़रिया ...
नित्यानंद तिवारी

जब मुक्तिबोध ने लिखना शुरू किया था, उस समय राजनीतिक दृष्‍टि‍ से समय बड़ा सक्रिय था, निर्णायक था। समाजवादी, मार्क्‍सवादी और मानव स्वातंत्र्यवादी विचारधाराएँ सक्रिय थीं। स्वाधीनता ...

संघर्ष और वि‍वि‍धता का महाकवि‍ मुक्...
मुरली मनोहर प्रसाद सिंह

मुक्तिबोध की रचनाओं के तीन चरण हैं। पहला 1934-35, दूसरा 1953 से 1959 और तीसरा 1959 से 1964 । अगर पहले चरण की कविताओं और कहानियों को साथ-साथ देखा जाए और समान प्रश्‍नों की आवाजाही...

इसे क्षमायाचना का अंतिम पाठ न समझें
उदयप्रकाश

हिंदी के सुप्रतिष्ठित कहानीकार एवं कवि उदयप्रकाश ने गोरखपुर में योगी आदित्यनाथ के हाथों से सम्मान क्या ले लिया मानो बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया हो। हिंदी लेखकों का एक बड़ा वर...

इसे मेरी क्षमायाचना का अंतिम पाठ न ...
उदयप्रकाश

यंत्रणा और आत्मद्वंद्व के अंधेरे दिन

मैंने और मेरे परिवार ने, एक...
मुक्तिबोध की बेमिसाल प्रेम कथा और उ...
जगदीश्वर चतुर्वेदी

हि‍न्‍दी का लेखक अभी भी नि‍जी प्रेम के बारे में बताने से भागता है। लेकि‍न मुक्‍ति‍बोध पहले हि‍न्‍दी लेखक हैं जो अपने प्रेम का अपने ही शब्‍दों में बयान करते हैं। मुक्‍ति‍बोध का अ...

नए जनवादी वि‍कल्‍प का आधार हैं मुक्...
अरुण माहेश्‍वरी

मुक्तिबोध की मृत्यु 1964 में हुई। जीवन में उन्होंने खूब लिखा। नेमीचंद जैन ने छ: खंडों में जो मुक्तिबोध रचनावली संकलित की है, उसके अतिरिक्त भी उनका लिखा काफी कुछ है। खुद नेमी जी ...

दरअसल/ क्रूरता का अट्टहास
-श्याम कश्यप-
दरअसल यह भी एक विचित्र संयोग ही कहा जायेगा। इन दिनों मैं अपने एम.फिल.के छात्रों से संचार (कम्युनिकेशन) के पेपर के अन्तर्गत प्रोपेगंडा (प्रचार) के बारे में चर्चा कर रहा था। इधर चारो...
अशोकजी तो अफसर हैं....
-राजेंद्र यादव-
सुपरिचित कथाकार और साहित्यक पत्रिका हंस के संपादक राजेंद्र यादव का कहना है कि अशोक वाजपेयी अफसर हैं और उन्हें हरेक के बारे में ये कहने का अधिकार है कि वह निकम्मा, मूर्ख और बेकार व्...
जनपक्षरता और पारदर्शिता के आदर्श थे...
शि‍वराम

मुक्‍ति‍बोध के बारे में आज कोई भी पुनर्पाठ अमेरि‍की साम्राज्‍यवाद और सांस्‍कृति‍क राष्‍ट्रवाद को दरकि‍नार करके नहीं बनाया जा सकता है। आज सारी दुनि‍या अमेरि‍की साम्राज्‍यवाद की आ...

मुक्तिबोध ने मार्क्सवाद का अतिक्रमण...
अशोक वाजपेयी

बड़े लेखक के सामने एक समस्‍या नहीं होती ।अनेक समस्‍याएं होती हैं। यह स्‍थि‍ति‍ मुक्‍ति‍बोध की भी है। समस्‍या बहुलता एक स्‍तर पर छायावादी भाषा संस्‍कार की थी ,उस समय के जो छायावा...

मजदूरबोध का महान कवि‍ मुक्‍ति‍बोध
वि‍श्‍वनाथ त्रि‍पाठी

सबसे पहली बात यह कि‍ मुक्‍ति‍बोध अखण्‍ड भाकपा के सदस्‍य थे। शमशेरबहादुर सिंह ने 'चॉंद मुँह टेढ़ा है' की जो भूमि‍का लि‍खी है , उसमें लि‍खा है , वे मजदूरों के जुलूसों में भाग लेते...

अब हलफ़नामा दर्ज़ करना शायद ज़रूरी ...
विश्वरंजन

इधर प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान के द्वारा 10-11 जुलाई, 2009 को रायपुर में प्रमोद वर्मा के साहित्यिक अवदान तथा समकालीन आलोचना पर केंद्रित आयोजित 2 दिवसीय संगोष्ठी को लेकर कुछ विव...

राम की शक्ति पूजा
सूर्यकाँत त्रिपाठी "निराला"

हिंदी साहित्य में सूर्यकाँत त्रिपाठी "निराला" का नाम बीसवीं सदी के सर्वश्रेष्ठ कवियों में सबसे ऊपर आता है। छायावाद और प्रगतिवाद की संधि बेला पर बैठकर उन्होंने ऐसा काव्य रचा जो ह...

घाटे का सौदा और अन्य लघु कथाएं
सआदत हसन मंटो

सआदत हसन मंटो बीसवीं सदी के सबसे बड़े कहानीकारों में से एक हैं। उनकी लेखनी तेज़ाब की तरह चलती है और पानी से भी पतली भाषा मे...

गाँव की बूढ़ी नदी
-सुखदीप उप्पल-
सूख गई गाँव की बूढ़ी नदी जिसके तटों पर दूर तक फैले घने साल वनों के बीच से झाँककर सूरज पौ फटने के दृश्यों का आभास देता सारा गाँव जहाँ नित्य कर्म से निपटता...
वे हि‍न्‍दी को साहि‍त्‍य के शि‍खर प...
महेन्‍द्र 'नेह'

गजानन माधव मुक्तिबोध हमारे समय के उन अग्रणी रचनाकारों में हैं। जिन्होंने देशकाल और परिस्थितियों की त्रासद सचाइयों और उसके साधारण जन पर पड़ने वाले प्रभावों की पड़ताल पूरी शिद्दत से...

सांप्रदायिक स्टीरियोटाइप से नफ़रत थ...
जगदीश्वर चतुर्वेदी

भारत की सबसे बड़ी समस्‍या है साम्‍प्रदायि‍कता। मुक्‍ति‍बोध हि‍न्‍दी का पहला लेखक है जो साम्‍प्रदायि‍क स्‍टीरि‍योटाइप को चुनौती देता है। हि‍न्‍दी में साम्‍प्रदायि‍क स्‍टीरि‍योटाइ...

थाली भर धूप छोड़ गए हरीश भदानी
जलेस की श्रद्धांजलि

हिंदी और राजस्थानी के सुप्रसिध्द कवि, गीतकार और संपादक हरीश भादानी नहीं रहे। 2 अक्तूबर की तड़के सुबह 4 बजे बीकानेर में उन्होंने अंतिम सांस ली। वे कुछ अर्से से बीमार चल रहे थे। उन...

जयप्रकाश जी, आपका मानस क्या है..?
मुकेश कुमार

वैसे तो आपके मानस को समझने के लिए देशकाल.कॉम के स्तंभकार उदयप्रकाश के लेख पर आपकी प्रतिक्रिया ही काफी होनी चाहिए थी। जिस तरह से आप सरकार के प्रवक्ता बनकर सामने आए हैं, उससे कोई ...

स्‍वाधीनता समीक्षा के बड़े आलोचक है...
सुधीश पचौरी

मुक्‍ति‍बोध की चि‍न्‍ता के केन्‍द्रीय वि‍षय हैं प्रेम और सौंदर्य। बुनि‍यादी प्रश्‍न मुक्‍ति‍बोध की कवि‍ता में ही आ गया है-

'समस्‍या एक -
मेरे सभ्‍य नगरों और ग...

मुक्तिबोध हिंदी आलोचना के सर्वोत्तम...
चंचल चौहान

हमारी हिंदी की आधुनिक आलोचना विधा जो कि उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशकों में शुरू हुई थी अब काफी आगे बढ़ चुकी है। वह विश्व के किसी भी साहित्य से पीछे नहीं है। उसका भूमंडलीकरण काफी पह...

सि‍द्धान्‍त और व्‍यवहार का मसीहा मु...
चंचल चौहान

मुक्तिबोध की आलोचना पद्धति में सिद्धांत और व्यवहार साथ साथ चलते हैं । हिंदी के बहुत से आचार्य और आलोचक सिद्धांत बघार कर अपने दायित्व से मुक्त हो जाते हैं। जबकि सिद्धांत तो बहुत ...

कविता ब्रम्हराक्षस
गजानन माधव मुक्तिबोध
शहर के उस ओर खंडहर की तरफ़
परित्यक्त सूनी बावड़ी
के भीतरी
ठण्डे अंधेरे में
बसी गहराइयाँ जल की...
सीढ़ियाँ डूबी अनेकों
उस पुराने घिरे पानी में...
स...
धूर्तता और मूर्खता के जीवंत नायक हम...
जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

मुक्‍ति‍बोध के बारे में एक बात जरूर माननी पड़ेगी कि उनकी नजर पैनी थी, और यथार्थ पर गहरी पकड़ थी। यह बात मैंने कल नि‍खि‍ल दा से कही थी कि हि‍न्‍दी में एक ऐसा भी लेखक था जो साहि‍त...

पटरी से उतर गई है हिंदी में बहस
कभी-कभार/ अशोक वाजपेयी

हिंदी में इस समय छोटी पत्रिकाओं की बहार है। हर डाक में एक आती है। वे दिन गए जब वे उग्र, लेकिन कृशकाय होती थीं। अब वे मोटी-ता...

दुष्यंत की परम्परा का आलोक
-डॉ नामवर सिंह-
ग़ज़ल अब नागरी लिपि में भी लिखी जा रही है। और ख़ूब लिखी जा रही है। दरअसल उर्दू और हिंदी का ये फ़ासला बहुत पहले मिटा दिया गया था। मीर की शायरी का बहुत सा हिस्सा ऐसा है जिसमें हिंदी ...
ढलान पर कौन-नामवर या अशोक?
-विशेष संवाददाता-
सुपरिचित कवि एवं संस्कृतिकर्मी अशोक वाजपेयी ने एक बार फिर भारतीय साहित्य के शिखर पुरूष कहे जाने वाले डा. नामवर सिंह पर हल्ला बोला है। उन्होंने न केवल हल्ला बोला है बल्कि नामवरजी के...
मुक्‍ति‍बोध ने काव्‍य शि‍ल्‍प के नए...
मैनेजर पांडेय

हि‍न्‍दी के प्रख्‍यात आलोचक और जवाहरलाल नेहरू वि‍श्‍ववि‍द्यालय के भ़ू.पू. प्रोफेसर मैनेजर पांडेय से दिल्ली वि. वि. में हिंदी की एसोसिएट प्रोफेसर सुधा सिंह ने देशकाल के लिए म...

इस युग के सबसे बड़े वि‍चारक हैं मुक...
शि‍वकुमार मि‍श्र

स्‍वतंत्र भारत के सबसे बड़ वि‍चारक हैं मुक्‍ति‍बोध। उन्‍हें न तो देवता बनाने जरूरत है और न पूजने की जरूरत है। व्‍यक्‍ति‍गत और साहि‍त्‍यि‍क ईमानदारी में उनका कोई जबाव नहीं है। उन...

इंटरनेट पर मुक्‍ति‍बोध सप्‍ताह (13-...
जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

आज मुक्‍ति‍बोध का जन्‍मदि‍न है। इंटरनेट पर मुक्‍ति‍बोध का आना नयी घटना नहीं है। मुक्‍ति‍बोध के युवा भक्‍तों ने अनेक स्‍थलों पर मुक्‍ति‍बोध का प्रचार कि‍या है। अभी ये लोग मुक्‍ति...

हिन्दी न होती तो हिन्दोस्तां भी नही...
श्रीराम तिवारी

आज टेलीविजन, कम्प्यूटर तथा ब्रॉडबैंड इत्यादि के अत्यधिक प्रचलन से ज्ञान आधारित सूचना तंत्र सहित संपूर्ण वैश्विक उत्पादनों का भूमंडलीकरण हो चुका है। नए-नए ब्लॉगों और वेबसाइट्स पर...

धर्म का मर्म नहीं समझते हिंदी के कू...
जगदीश्वर चतुर्वेदी

बुद्धि‍जीवि‍यों में धर्म 'इस्‍तेमाल करो और फेंको'से ज्‍यादा महत्‍व नहीं रखता। वे इसके साथ उपयोगि‍तावादी संबंध बनाते हैं। धर्म इस्‍तेमाल की चीज नहीं है। धर्म मनुष्‍यत्‍व की आत्‍म...

राजेंद्र यादव के नाम खुला पत्र
प्रेम जनमेजय

आदरणीय श्री राजेंद्र यादव जी,
परनाम,

साहित्य के इस तथाकथित असार संसार में ‘हंस’ को पढ़ने/देखने के, ‘जाकि रही भावना जैसी, प्रभु मूरति देखी तिन तैसी’ के अंदाज में अनेक ...

चर्चा हमारा/ चुनने का अधिकार किसे ह...
-मैत्रेयी पुष्पा-
“चुनाव का अधिकार” यह शब्द स्त्री के खाते में पूरे ज़ोर-शोर से जोड़ा जा रहा है इन दिनों। शायद इसलिए कि आधी आबादी को अपना वोट देना है,जो किसी के जीतने-हारने में निर्णायक भूमिका अदा क...
कविता/ ब्रम्हराक्षस
गजानन माधव मुक्तिबोध
शहर के उस ओर खंडहर की तरफ़ परित्यक्त सूनी बावड़ी के भीतरी ठण्डे अंधेरे में बसी गहराइयाँ जल की... सीढ़ियाँ डूबी अनेकों उस पुराने घिरे पानी में... समझ में आ न सकता हो कि जैसे...
कभी-कभार/ संसार की स्तुति
-अशोक वाजपेयी-
आधुनिकता का एक अभिशाप ये है कि उसने अपनी संदेहपरकता और प्रश्नवाचकता की मूल वृत्ति और उसके स्वरचित आतंक के चलते, हमें सृजनात्मक साहित्य में संसार की सुंदरता या कोमलता की स्तुति करने...
 
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