वे जब सूचना के जन अधिकार अभियान के कार्यकर्ता हुआ करते थे तो अरविंद केजरीवाल से मिलना जुलना होता था। फिर जब सूचना के अधिकार का कानून बन गया तो केजरीवाल ने दिल्ली जैसे महानगर में काम करने के लिए “परिवर्तन” नाम की संस्था बनाई। गांवों में काम करने वाले लोगों से सीधे मिलने और बात की बात से प्रचार करके काम चला सकते हैं। महानगर में मीडिया की सहायता के बिना लोगों तक पहुंचा नहीं जा सकता। केजरीवाल ने इसलिए दिल्ली के मीडिया से संबंध बनाए और उससे मिले सहयोग के कारण उनके काम का असर भी हुआ। भले लोगों की सिफारिश पर उन्हें मेग्सेसे भी मिल गया। अब वे सूचना के अधिकार आंदोलन के नेता हो गये। अब वे पब्लिक कॉज रिसर्च फाउंडेशन के जरिये सूचना के अधिकार को बढ़ाने वाले लोगों को राष्ट्रीय पुरस्कार देने वाले हैं।
अच्छा है। लेकिन इससे अपने को उत्तेजित होने की जरूरत नहीं थी। यह कागद कारे इसलिए लिख रहा हूं कि अरविंद केजरीवाल ने यह पुरस्कार तय करने के लिए जो समिति बनाई है, उसमें ऐसे अखबार और उसके मालिक संपादक को भी रखा है, जिसने इस लोकसभा चुनाव में सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार किया। भ्रष्टाचार तो हिंदी इलाके के और भी बल्कि देश भर के अखबारों ने किया। पैसे लेकर उम्मीदवारों के प्रचार को खबर बनाकर छापा और पाठकों को बताया तक नहीं कि ये खबरें उनकी नहीं, उम्मीदवार के प्रचार के विज्ञापन हैं। उम्मीदवारों को अपना खर्च सीमा में रखने और काले पैसे से मनचाहा प्रचार पाने की सुविधा हुई। चुनाव कवरेज के लिए हिंदी इलाके में घूमने वाले समझदार और जानकार पत्रकारों का अंदाज है कि उत्तर प्रदेश के इस अखबार ने इस चुनाव में कोई दो सौ करोड़ रुपये का काला धन बनाया है।
काला धन तो देश के और भी धंधेबाज बनाते हैं और इससे ज्यादा ही बना लेते हैं। मनमोहन सिंह की उदारवादी नीतियों के बावजूद पिछले 18 साल में देश के उद्योग व्यापार को ईमानदार होने की प्रेरणा और प्रोत्साहन नहीं मिला है। काला धन कथित समाजवाद के जमाने से ज्यादा बन रहा है। लेकिन आजतक भ्रष्टाचार केवल नेताओं का उजागर और चर्चित होता है। उदारवादी पूंजीवाद की पवित्र गैयाएं हैं- उद्योग और व्यापार- और उनके भ्रष्टाचार पर ना अखबार बात करते हैं ना चैनल। मुझे कुछ वर्षों से शंका हो रही थी कि हमारी मीडिया को हमारी पूंजी ने अपना सहयोगी बना लिया है और अपने सहोदरों के भ्रष्टाचार पर बात करना हमारा शिष्टाचार नहीं है। लेकिन इस चुनाव के दौरान मुझे अच्छी तरह समझ आ गया कि काले धन के धंधे में हमारा उद्योग-व्यापार और हमारे नेता ही शामिल नही हैं बल्कि हमारा मीडिया भी बराबर का सहयोगी और भागीदार हो गया है। उम्मीदवारों ने अखबारों और चैनलों को खुलकर पैसा दिया, काला पैसा। और अखबारों और चैनलों ने बिना किसी पत्रकारीय आचार विचार के उन्हें खूब प्रचार दिया।
अब काले धन का धंधा इतना सर्वव्यापी है तो मैं हिंदी के एक अख़बार के पीछे क्यों पड़ा हूं? इसलिए कि एक तो वह अख़बार है और दूसरे, अख़बार होते हुए भी चुनाव के समय लोकतंत्र और वोटर के प्रति अपनी जिम्मेदारी को सरासर ठेंगा दिखा कर काले धन के धंधे में पड़ा है और तीसरे, जनता के सूचना के अधिकार के गंगाजल में अपने हाथ धोने की कोशिश में लगा है। अरविंद केजरीवाल से मैंने यही पूछा कि भाई, जो कानून भ्रष्टाचार का भंडा फोड़ने के लिए बानया गया है और जो लोगों के सही सूचना पाने के अधिकार को उनका मौलिक अधिकार बनाता है उसके आंदोलन और पुरस्कारों से आप एक ऐसे अख़बार और उसके मालिक संपादक को कैसे जोड़ते हो जिसने पूरे चुनाव भर जनता के सूचना के अधिकार का खुद होकर उल्लंघन किया, भ्रष्टाचार में लिप्त रहा और अपनी इन करतूतों पर परदा डालने के लिए मतदाता जागरण अभियान चलाता रहा जिसमें आप और हमारी अरुणा राय भी शामिल हो गईं?
उत्तर प्रदेश से चुनाव लड़ने वाले लगभग सभी उम्मीदवारों को इस अख़बार के व्यवहार और ब्लैकमेली हरकतों से शिकायत रही। कम से कम दो उम्मीदवारों ने तो अपने चुनाव प्रचार में इस अख़बार को अपने विरोध का सीधा और खुला निशाना बनाया। लखनऊ में अटल बिहारी वाजपेयी की सीट से लड़ने वाले भारतीय जनता पार्टी के लालजी टंडन और समाजवादी पार्टी की तरफ से देवरिया से लड़ने वाले मोहन सिंह। भाजपा और सपा दोनों ने इस अख़बार के एक-एक मालिक को राज्यसभा में भेजा है। मोहन सिंह ने खुली सा में पूछा कि वे बताएं कि उनको राज्यसभा में भेजने के पार्टी ने कितने पैसे लिये थे जो आज पे हमारी ख़बरें छापने के पैसे मांग रहे हैं। लालजी टंडन अटलजी के पुराने सहयोगी रहे हैं और उन्हें लखनऊ से चुनाव लड़वाते रहे हैं। वे जानते हैं कि समझदार राजनीति और अच्छा जनसंपर्क क्या होता है। लेकिन उन्हें भी भरी सभा और खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहना पड़ रहा है। लालजी टंडन ने आखिर तक इस अखबार का पैकेज नहीं खरीदा और जनता के समर्थन से जीत कर आए।
अब सूचना के अधिकार का कानून और उसकी भावना का तकाजा है कि इस अख़बार से पूछा जाए कि दुनिया के किसी भी लोकतंत्र में चुनाव के समय अख़बार की पहली और सबसे बड़ी जिम्मेदारी मानी जाती है कि वह वोटरों को निष्पक्ष और उचित रूप से सही और सच्ची जानकारी दे ताकि वे वोट देने का सही फैसला कर सकें। हर लोकतंत्र में जिम्मेदार और स्वतंत्र प्रेस का यह पहला पत्रकारीय कर्तव्य है है। अपनी ख़बरों की जगह उम्मीदवारों के प्रचार को बेचकर अख़बार ने पाठकों के सूचना के अधिकार को खारिज किया है। वह बताए कि क्यों? फिर हर लोकतंत्र में स्वतंत्र प्रेस की ख़बरों की जगह को पवित्र माना जाता है क्योंकि पाठक भरोसा करता है कि अख़बार सच्ची और सही ख़बर देगा। दुनिया में हर पाठक अख़बार ख़बर के लिए खरीदता है, विज्ञापन के लिए नहीं। सब समझदार मानते हैं कि पाठक और अख़बार के इस भरोसे के बिना अख़बार और पत्रकारिता टिके नहीं रह सकते। इस अखबार से पूछना पड़ेगा कि यह विश्वास उसने क्यों तोड़ा?
मैं जानता हूं कि अख़बार कहेगा – जैसा कि ऐसा धंधा करने वाले दूसरे अख़बार भी कहते हैं – कि हम आखिर एक व्यावसायिक गतिविधि हैं। जैसा सूचना का अधिकार है वैसा ही रोजी और मुनाफा कमाने का अधिकार है। बिना पूंजा, बिना कमाई और मुनाफे के कोई अख़बार चल नहीं सकता। सही है। लेकिन अख़बार अनिवार्य रूप से लोकहित का कार्य है और लोकहित की व्यापारिक गतिविधि भी मुनाफे की ऐसी अंधी दौड़ नहीं हो सकती जिसमें ख़बर की पवित्र जगह काले धन में बेटी जाए। आखिर व्यापार-व्यवसाय भी नियम कायदे से ही चल सकते हैं। अख़बार माल है और ख़बरें सब्जी-मच्छी की तरह बिकती हों तो उन पर माल के स्टैंडर्ड लगाए ही जाएंगे। तंबाकू बेचना भी व्यवसाय है. फिर क्यों चेतावनी छापना ही पर्याप्त नहीं माना गया और अब बीड़ी-सिगरेट की डिबिया पर फोटू छापना पड़ रहा है। आपने क्यों नहीं लिखा कि यह हमारी ख़बर नहीं उम्मीदवार का विज्ञापन है। माल में भी बताना तो पड़ता ही है कि उसमें क्या-क्या है।
पत्रकारिता और व्यवसाय दोनों के कानून-कायदे आप तोड़ें और अपने पाठक के प्रति नहीं काला धन देने वाले उम्मीदवार के प्रति जिम्मेदार हों तो आप प्रेस को मिली स्वतंत्रता पर दावा कैसे कर सकते हैं? चलिये एक बार मान लें कि ये सवाल पत्रकारिता और व्यवसाय के हैं और उनके उत्तर अरविंद केजरीवाल और अरुणा राय से नहीं मांगे जाने चाहिये। लेकिन अरुणा राय ने सूचना के अधिकार का आंदोलन राजस्थान के गरीब और अनपढ़ किसानों और मजदूरों के लिए चलाया था। उसमें इतनी आग थी को वह देश भर में फैल गया। आखिर पहले अटलजी और फिर मनमोहन सिंह की सरकार को कानून बनाना पड़ा। कोई अख़बार व्यापारिक गतिविधि हो सकता है, लेकिन सूचना के अधिकार का आंदोलन तो पूरी तरह लोकहित में लोकसेवा की भावना से चलाया गया और चलता है। पैसे आंदोलन को भी चाहिये लेकिन आजतक किसी जन आंदोलन ने नहीं कहा कि हम मुनाफे के हो और चल रहे हैं। लोक संघर्ष का यह स्थान लोकहित का पवित्र स्थान है। इसे आप उन लोगों और संस्थानों को कैसे सौंप सकते हैं जिनका दावा है कि वे मुनाफा बनाने के लिए हैं और ऐसा करने में वो शुभ-अशुभ और नैतिक-अनैतिक का कोई विचार नहीं रखना चाहते?
लेकिन अख़बार आजकल पाठकों को सही और सच्ची सूचना देने और सार्वजनिक मामलों में उन्हें ठीक राय बनाने में मदद करने अपने कर्त्तव्य की दो कौड़ी चिंता नहीं करते। वे ख़बरों की जगह विज्ञापन छाप कर पैसे कमाने में लगे हैं। वे जानते हैं कि ऐसा करने में लोक सेवा और लोकहित की पवित्र लोकतांत्रिक जगह उनके हाथ से जाती रहती है। पाठक और देश का कुल सभ्य समाज उनका वह सम्मान और उनमें वह विश्वास नहीं रखता जो पहले के लोकहित सेवक और रक्षक अख़बारों और पत्रकारों का करता था। इसलिए अख़बार आजकल सार्वजनिक हितों के आंदोलनों में भागीदारी करना चाहते हैं ताकि उनकी पुण्याई इन्हें गंगा स्नान का पुण्य दे सके। और इसे वे नई पत्रकारिता कहते हैं। पुरानी पत्रकारिता, पत्रकारिता के जरिये ही लोकहित और लोकसेवा करती थी और इसी को अपना काम मानती थी। नई पत्रकारिता व्यवसाय अपना पहला काम और मुनाफे को अपना पहला प्रयोजन मानती है। जिस तरह उद्योग-व्यापार अपनी सामाजिक जिम्मेदारी निभाने के लिए कुछ कमाई आंदोलनों और समाज सुधार में दे देते हैं वैसे ही नई पत्रकारिता – लीड इंडिया, मतदाता जन जागरण और घूंस को घूंसा जैसे अभियान चलाती है। यह काली कमाई करते हुए गंगा में डुबकी लगाना है।
आपने देखा कि टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस लोकसभा चुनाव में लीड इंडिया अभियान चलाया 26/11 की घटना पर मुंबई के मध्यवर्ग की प्रतिक्रिया देखकर। क्या असर हुआ? जिस दक्षिण मुंबई में ताज और ओबराय जैसे होटल और नरीमन गेस्ट हाउस था और जहां ऐसे भयानक आतंकवादी हमले हुए थे, वहां उतने लोग भी वोट देने नहीं आए, जितने पिछले चुनाव में आए थे। अंग्रेजी पढ़ने-लिखने वाले महानगरीय समाज ने भारत का नेतृत्व करना तो दूर, लोकतंत्र की जिम्मेदारी भी नहीं ली। वही मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने और राहुल के यंग ब्रिगेड में भी वही वंशवादी चेहरे आगे दिखे। मतदाता जनजागरण और घूंस को घूंसा का भी यही हश्र हुआ। लोग जानते हैं कि कौन भ्रष्टाचारी गंगा में हाथ धो रहे हैं। गंगा किसी को हाथ धोने से मना थोड़े करती है!
नई पत्रकारिता ने पत्रकारिता छोड़ कर पुण्याई को कमाई बनाने का निश्चय किया है। पत्रकारिता और जन आंदोलनों को उनकी सही भूमिका में रखना आप नागरिक का कर्त्तव्य है.