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(साहित्य)हिंदी >> कविता >> दो बसंत कविताएं
 
 
दो बसंत कविताएं
शशिधर खां अपनी टिप्पणी दें
इन आँखों को कभी न भाती
ये हरियाली हरी-भरी
मस्त होएं क्या इस बसंत में
मेरी प्याली नहीं भरी
दो पाए की खटमल चौकी
टूटे खाट बिछाए हैं
ना झाँके झोपड़ में जाए
हम तो आस लगाए हैं
बस बसंत का नाम सुना है
आपन तो पतझड़ देखे
तप्त हो रही सूरज की किरणें
नंगी पीठों को भुनकर
रात चाँदनी क्या र लेगी
अपनी करूण कथा सुनकर
पता नहीं क्यों कवि कोविद ने
नाम दिया रितुराज इसे
वो क्या जानें पुरबा पछुआ
मारे लात समजा जिसे
ओ बयार ज़रा रुककर बहियो
अभी काम से लौटे हैं
कसम तुम्हारी जाने कब से
इंतज़ार में बैठे हैं।।

-2-

ज़िंदा जलते भाई सड़क पर
हम सब मिलकर गावें फाग
क्यू में खड़े किरासन ख़ातिर
देखें कहाँ लगी है आग
भूलो सारे रिश्ते-नाते
काटो लाल लग्न के ताग
टीवी पर मत देख तमाशा
दौड़ जहाँ लुट रहा सुहाग
कोयल कर्कश स्वर में कूके
मीठी तान सुनाता काग
ये फुलबगिया अब न बचेगी
मुँह से निकल रहा है झाग
खेतों में चिमनी का सरगम
कहाँ पाएं सरसों का साग
रोटी निमक पर भी आफत
ऐसे में क्या राग विहाग
कचरा ढोची नदिया क्या दे
मस्त फिज़ा का कोई सुराग
आसमान से लहू टपकता
बादल निकल गया बेदाग
देख पड़ोस में धुआँ उठा रहा
अरे स्वार्थी अब भई जाग
फूल से चेहरे मुरझाए हैं
खो बैठे हैं बाग पराग
चाहे मारो या गलियाओ
बात कहेंगे हम बेलाग ।।
 
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साहित्य संवादददाता

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राम की शक्ति पूजा
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मोचीराम
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ग़ज़ल
-संजय ग्रोवर-
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ग़ज़ल/
-प्राण शर्मा-
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कविता-कुकुरमुत्ता
सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"
आया मौसम खिला फ़ारस का गुलाब, बाग पर उसका जमा था रोबोदाब वहीं गंदे पर उगा देता हुआ बुत्ता उठाकर सर शिखर से अकडकर बोला कुकुरमुत्ता अबे, सुन बे गुलाब भूल मत जो पा...
सबसे ख़तरनाक है सपनों का मर जाना
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दुष्यंत की परम्परा का आलोक
-डॉ नामवर सिंह-
ग़ज़ल अब नागरी लिपि में भी लिखी जा रही है। और ख़ूब लिखी जा रही है। दरअसल उर्दू और हिंदी का ये फ़ासला बहुत पहले मिटा दिया गया था। मीर की शायरी का बहुत सा हिस्सा ऐसा है जिसमें हिंदी ...
कविता/ ब्रम्हराक्षस
गजानन माधव मुक्तिबोध
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ग़ज़ल
-आलोक श्रीवास्तव-
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मेरे वतन के लोगों, मुखातिब मैं तुमस...
-प्राण शर्मा-
मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ क्यों कर रहे हो आज तुम उल्टे तमाम काम अपने दिलों की तख्तियों पे लिख लो ये कलाम तुम बोओगे बबूल तो होंगे ...
तीन कविताएं
-प्रियदर्शन-
गुस्सा और चुप्पी...... बहुत सारी चीज़ों पर आता है गुस्सा सबकुछ तोड़फोड़ देने, तहस-नहस कर देने की एक आदिम इच्छा उबलती है जिस पर विवेक धीरे-धीरे डालता है ठंडा पानी ...
गाँव की बूढ़ी नदी
-सुखदीप उप्पल-
सूख गई गाँव की बूढ़ी नदी जिसके तटों पर दूर तक फैले घने साल वनों के बीच से झाँककर सूरज पौ फटने के दृश्यों का आभास देता सारा गाँव जहाँ नित्य कर्म से निपटता...
दो कविताएं
।। विचार ।।
दफ़ना आए थे उन्हें वे लोग पहाड़ों के पार गहरी कब्रों के भीतर लेकिन वहीं हरी-हरी दूब उग आई है। भीतर की नन्हीं-नन्हीं जीवित धुकधुकियाँ भूरी जड़ों की उँगलियाँ पकड़कर बाहर...
 
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