Logo
होम पेज पर जाएं  
 
विज्ञापन





 
(साहित्य)हिंदी >> कविता >> दो कविताएं
 
 
दो कविताएं
।। विचार ।। अपनी टिप्पणी दें
दफ़ना आए थे उन्हें वे लोग
पहाड़ों के पार
गहरी कब्रों के भीतर

लेकिन वहीं हरी-हरी दूब उग आई है।

भीतर की नन्हीं-नन्हीं
जीवित धुकधुकियाँ

भूरी जड़ों की उँगलियाँ पकड़कर
बाहर फूट ही हैं-

आज नहीं तो कल यहाँ फूल खिलेंगे
उड़ेगी सुगंध चारों ओर दिगंत में।

।। धिक्कार।।

बटेर पकड़ रहे हैं वे
जो कोसते थे-
जी भर बहेलियों को कल तक।

बहुत चालाक हैं वे
अपने जाल लिए हुए,
कील-काँटों से लैस रहेंगे पता नहीं कब तक।

उड़ गए हैं उनके
हाथों के तोते-
जब कबूतर पकड़ लिए गए हैं रँगे हाथ।

मतलबी थे वे तो
शुरू से ही,
पता नहीं किस-किस का अब देंगे साथ।

बहुत हैं ज़माने में
ऐसे रँगे सियार,
क्या कीजे,
जब तक थे इधर लगे हमदम-हमसफ़र।

जब गए-
तो चले गए
बैरिकेड के उधर!

न हमें था गुमाँ
न उन्हें है ख़बर!!
 
Advertisement

एक भाषा हुआ करती है
साहित्य संवादददाता

"आपके शब्द और काव्य ही नहीं, सोच-जो दलितों-पीड़ितों की भाषा में गूँथा है...........हमसे लोकार्पण कराने से धन्य हूँ।"
ये शब्द जानी-मानी पर्यावरण कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने उदयप्...

आखिरकार भेड़ें और भेड़िए ही बदलते हैं...
संजय ग्रोवर की कविताएं

जो सयाने समय के पीछे-पीछे चलते थे
और वो भी बड़ी सावधानी से
एक निश्चित फासला बनाए रखते हुए
मगर अवसर देखते ही पूरे कौटिल्य के साथ
चोटी को पौनीटेल में बदल लेने की धूर्तत...

राम की शक्ति पूजा
सूर्यकाँत त्रिपाठी "निराला"

हिंदी साहित्य में सूर्यकाँत त्रिपाठी "निराला" का नाम बीसवीं सदी के सर्वश्रेष्ठ कवियों में सबसे ऊपर आता है। छायावाद और प्रगतिवाद की संधि बेला पर बैठकर उन्होंने ऐसा काव्य रचा जो ह...

ज़िन्दा रहने के पीछे अगर सही तर्क न...
-धूमिल-

सुदामा प्रसाद पाँडेय"धूमिल" बीसवीं सदी के प्रमुख कवि थे। अड़तीस साल की उम्र में ही उनकी मृत्यु हो गई थी मगर इस अल्पायु में ही उन्होंने जो कुछ लिखा वह एक अलग छाप छोड़ गया। आज भी ...

मोचीराम
-धूमिल-

सुदामा प्रसाद पाँडेय"धूमिल" बीसवीं सदी के प्रमुख कवि थे। अड़तीस साल की अल्पायु में ही उनकी मृत्यु हो गई थी मगर उनकी कविताएं आज भी लोगों की ज़बान पर रहती हैं। उनकी कविताओं में सम...

ग़ज़ल
-संजय ग्रोवर-
-1- पागलों की इस कदर कुछ बदगु़मानी बढ़ गयी उनके हिस्से की दवा भी हमको खानी पड़ गयी उनको कांधा देने वाली भीड़ थी, भगवान था हमको अपनी लाश आखिर खुद उठानी पड़ गयी भ...
ग़ज़ल/
-प्राण शर्मा-
-1- पालकी में बैठ कर आया करो ऐ जिंदगी हर किसी को हर घड़ी भाया करो ऐ जिंदगी काला काला टीका माथे पर तुम्हारे चाहिए...
कविता-कुकुरमुत्ता
सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"
आया मौसम खिला फ़ारस का गुलाब, बाग पर उसका जमा था रोबोदाब वहीं गंदे पर उगा देता हुआ बुत्ता उठाकर सर शिखर से अकडकर बोला कुकुरमुत्ता अबे, सुन बे गुलाब भूल मत जो पा...
सबसे ख़तरनाक है सपनों का मर जाना
-अवतार सिंह पाश-
पंजाब के क्रांतिकारी कवि अवतार सिंह पाश की एक-एक कविता सत्ता और व्यवस्था से संघर्ष का ज़िंदा दस्तावेज़ है। वे शहीद भगत सिंह की परंपरा के सिपाही थे और 1988 में सिख उग्रवादियों ने उन...
दुष्यंत की परम्परा का आलोक
-डॉ नामवर सिंह-
ग़ज़ल अब नागरी लिपि में भी लिखी जा रही है। और ख़ूब लिखी जा रही है। दरअसल उर्दू और हिंदी का ये फ़ासला बहुत पहले मिटा दिया गया था। मीर की शायरी का बहुत सा हिस्सा ऐसा है जिसमें हिंदी ...
कविता/ ब्रम्हराक्षस
गजानन माधव मुक्तिबोध
शहर के उस ओर खंडहर की तरफ़ परित्यक्त सूनी बावड़ी के भीतरी ठण्डे अंधेरे में बसी गहराइयाँ जल की... सीढ़ियाँ डूबी अनेकों उस पुराने घिरे पानी में... समझ में आ न सकता हो कि जैसे...
ग़ज़ल
-आलोक श्रीवास्तव-
विदिशा मध्यप्रदेश के रहने वाले आलोक श्रीवास्तव ने बहुत कम समय में एक शायर और कवि के रूप में अपनी पहचान बनाई है। ऊर्दू के ख्यात शायरों की पुस्तकों का संपादन कर चुके आलोक की रचनाएं स...
मेरे वतन के लोगों, मुखातिब मैं तुमस...
-प्राण शर्मा-
मेरे वतन के लोगो मुखातिब मैं तुमसे हूँ क्यों कर रहे हो आज तुम उल्टे तमाम काम अपने दिलों की तख्तियों पे लिख लो ये कलाम तुम बोओगे बबूल तो होंगे ...
तीन कविताएं
-प्रियदर्शन-
गुस्सा और चुप्पी...... बहुत सारी चीज़ों पर आता है गुस्सा सबकुछ तोड़फोड़ देने, तहस-नहस कर देने की एक आदिम इच्छा उबलती है जिस पर विवेक धीरे-धीरे डालता है ठंडा पानी ...
गाँव की बूढ़ी नदी
-सुखदीप उप्पल-
सूख गई गाँव की बूढ़ी नदी जिसके तटों पर दूर तक फैले घने साल वनों के बीच से झाँककर सूरज पौ फटने के दृश्यों का आभास देता सारा गाँव जहाँ नित्य कर्म से निपटता...
दो बसंत कविताएं
शशिधर खां
इन आँखों को कभी न भाती ये हरियाली हरी-भरी मस्त होएं क्या इस बसंत में मेरी प्याली नहीं भरी दो पाए की खटमल चौकी टूटे खाट बिछाए हैं ना झाँके झोपड़ में जाए हम तो आस लगाए हैं बस...
 
©Deshkaal.com. All Right Reserved. Powered By: Web