ग़ज़ल अब नागरी लिपि में भी लिखी जा रही है। और ख़ूब लिखी जा रही है। दरअसल उर्दू और हिंदी का ये फ़ासला बहुत पहले मिटा दिया गया था। मीर की शायरी का बहुत सा हिस्सा ऐसा है जिसमें हिंदी और उर्दू का फ़र्क नज़र नहीं आता-
हम हुए तुम हुए कि मीर हुए,
इन्हीं ज़ुल्फ़ों के सब असीर हुए।
बोलचाल की ज़ुबान में कुछ ग़ज़लें ग़ालिब के यहां भी मिलती हैं। लेकिन ये चुनौती है कि जिस भाषा में दुष्यंत कुमार ने ग़ज़लें लिखी और उर्दू वाले भी जिसे मानते हैं,उस बोलचाल की भाषा में कुछ ग़ज़लें,कुछ नज़्में और कुछ दोहे जो आलोक ने कहे हैं,वो ख़ूब कहे हैं। इस लिहाज़ से हिंदी-उर्दू का जो फ़ासला है इस नई पीढ़ी ने धीरे-धीरे कम किया है। मिटाया है। और अगर आमीन क

आलोक ने उसी दिशा में क़दम बढ़ाया है तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए। ख़ासतौर से आलोक ने जो छोटी बहर की ग़ज़लें कही हैं वो बहुत मुश्किल काम है-
मैं नई शाम की अलामत हूं,
खाक सूरज के मुंह पे मल दूंगा।
सफ़र की आज कैसी इंतेहा है,
मुसाफ़िर लौट जाना चाहता है।
इसी के साथ आलोक ने लंबी बहर की ग़ज़लें भी कही हैं। लंबी बहर की ग़ज़लों को निभा लेना, कुशलता से संभाल लेना भी मुश्किल काम है। आलोक ने ये मुश्किल भी आसान कर ली है।
घर में झीने रिश्ते मैंने लाखों बार उधड़ते देखे,
चुपके-चुपके कर देती है जाने कब तुरपाई अम्मा।
बाबूजी गुज़रे आपस में सब चीज़ें तक़्सीम हुईं, तब-
मैं घर में सबसे छोटा था, मेरे हिस्से आई अम्मा।
ये जो 'तुरपाई' लफ़्ज़ है, ये कविता में पहले कहीं नहीं आया और इसका इतना सुंदर निर्वहन, ये भी अपने आप में अनूठा है। मां का छोटे के हिस्से में आना हमारे समाज की बड़ी सच्चाई है। आलोक ने उसे भी कुशलता से रेखांकित किया है। दरअसल आमीन में ग़ज़लों, नज़्मों और दोहों की जो विविधता है,इस विविधता से ही आमीन अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाती है। और उस ओर इशारा करती है,जो बात शमशेर ने कुछ यूं कही थी-
बात बोलेगी हम नहीं,
भेद खोलेगी, बात ही।
उर्दू का जो पूरा मिज़ाज है,उसका जो विट है वो आलोक की शायरी में नज़र आता है। और जो बात करने या कहने का अंदाज़ है,उसमें ये शायरी है। हिंदी कविताओं में ये बात आ नहीं सकती। इसलिए बातचीत और गुफ़्तगू का वो अंदाज़ जिसमें ये शायरी है,इसे लोकप्रिय भी बनाती है। हिंदी कविता अगर आम पाठकों से दूर है तो इसी अभाव की वजह से कि हम लोग,जो बात कहने का अंदाज़ है उसे नहीं पकड़ पाए। बहुत गंभीर नज़र आएंगे। बिलकुल संजीदा। संजीदगी ने मारा है हिंदी कविता को। हालांकि कुछ लोगों ने कोशिश की है। रघुवीर सहाय ने कोशिश की है। श्रीकांत वर्मा ने कोशिश की है। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना में ये कोशिश दिखाई देती है। व्यंग्य की कविताओं में अपने ढंग से नागार्जुन ने भी ये काम किया है। तो उस कोशिश के चलते 'आमीन' भी एक महत्वपूर्ण संग्रह साबित हुआ है,और दुष्यंत के बाद हिंदी ग़ज़ल में एक जो ठहराव आ गया था उसे 'आमीन के आलोक' ने बहुत हद तक दूर कर दिया है।