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(साहित्य)हिंदी >> कविता >> दुष्यंत की परम्परा का आलोक
 
 
दुष्यंत की परम्परा का आलोक
-डॉ नामवर सिंह- अपनी टिप्पणी दें
ग़ज़ल अब नागरी लिपि में भी लिखी जा रही है। और ख़ूब लिखी जा रही है। दरअसल उर्दू और हिंदी का ये फ़ासला बहुत पहले मिटा दिया गया था। मीर की शायरी का बहुत सा हिस्सा ऐसा है जिसमें हिंदी और उर्दू का फ़र्क नज़र नहीं आता-

हम हुए तुम हुए कि मीर हुए,
इन्हीं ज़ुल्फ़ों के सब असीर हुए।

बोलचाल की ज़ुबान में कुछ ग़ज़लें ग़ालिब के यहां भी मिलती हैं। लेकिन ये चुनौती है कि जिस भाषा में दुष्यंत कुमार ने ग़ज़लें लिखी और उर्दू वाले भी जिसे मानते हैं,उस बोलचाल की भाषा में कुछ ग़ज़लें,कुछ नज़्में और कुछ दोहे जो आलोक ने कहे हैं,वो ख़ूब कहे हैं। इस लिहाज़ से हिंदी-उर्दू का जो फ़ासला है इस नई पीढ़ी ने धीरे-धीरे कम किया है। मिटाया है। और अगर आमीन क आलोक ने उसी दिशा में क़दम बढ़ाया है तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए। ख़ासतौर से आलोक ने जो छोटी बहर की ग़ज़लें कही हैं वो बहुत मुश्किल काम है-

मैं नई शाम की अलामत हूं,
खाक सूरज के मुंह पे मल दूंगा।

सफ़र की आज कैसी इंतेहा है,
मुसाफ़िर लौट जाना चाहता है।

इसी के साथ आलोक ने लंबी बहर की ग़ज़लें भी कही हैं। लंबी बहर की ग़ज़लों को निभा लेना, कुशलता से संभाल लेना भी मुश्किल काम है। आलोक ने ये मुश्किल भी आसान कर ली है।

घर में झीने रिश्ते मैंने लाखों बार उधड़ते देखे,
चुपके-चुपके कर देती है जाने कब तुरपाई अम्मा।

बाबूजी गुज़रे आपस में सब चीज़ें तक़्सीम हुईं, तब-
मैं घर में सबसे छोटा था, मेरे हिस्से आई अम्मा।

ये जो 'तुरपाई' लफ़्ज़ है, ये कविता में पहले कहीं नहीं आया और इसका इतना सुंदर निर्वहन, ये भी अपने आप में अनूठा है। मां का छोटे के हिस्से में आना हमारे समाज की बड़ी सच्चाई है। आलोक ने उसे भी कुशलता से रेखांकित किया है। दरअसल आमीन में ग़ज़लों, नज़्मों और दोहों की जो विविधता है,इस विविधता से ही आमीन अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाती है। और उस ओर इशारा करती है,जो बात शमशेर ने कुछ यूं कही थी-

बात बोलेगी हम नहीं,
भेद खोलेगी, बात ही।

उर्दू का जो पूरा मिज़ाज है,उसका जो विट है वो आलोक की शायरी में नज़र आता है। और जो बात करने या कहने का अंदाज़ है,उसमें ये शायरी है। हिंदी कविताओं में ये बात आ नहीं सकती। इसलिए बातचीत और गुफ़्तगू का वो अंदाज़ जिसमें ये शायरी है,इसे लोकप्रिय भी बनाती है। हिंदी कविता अगर आम पाठकों से दूर है तो इसी अभाव की वजह से कि हम लोग,जो बात कहने का अंदाज़ है उसे नहीं पकड़ पाए। बहुत गंभीर नज़र आएंगे। बिलकुल संजीदा। संजीदगी ने मारा है हिंदी कविता को। हालांकि कुछ लोगों ने कोशिश की है। रघुवीर सहाय ने कोशिश की है। श्रीकांत वर्मा ने कोशिश की है। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना में ये कोशिश दिखाई देती है। व्यंग्य की कविताओं में अपने ढंग से नागार्जुन ने भी ये काम किया है। तो उस कोशिश के चलते 'आमीन' भी एक महत्वपूर्ण संग्रह साबित हुआ है,और दुष्यंत के बाद हिंदी ग़ज़ल में एक जो ठहराव आ गया था उसे 'आमीन के आलोक' ने बहुत हद तक दूर कर दिया है।
 
 manish chauhan
आलोक जी अर्से से ग•ाल-कविताएं लिखते आ रहे हैं। पारिवारिक रिश्तों पर लिखीं उनकी ग•ाल और कविताएं तो बहुत ही मार्मिक हैं। हम उन्हें अनुभूति डॉट कॉम पर भी पढ़ते आ रहे हैं। अब तक आलोचकों की पसंद से दूर रहे आलोक जी के लिए इससे खुशी की बात क्या हो सकती है कि नामवर जी ने उनकी नामवरी की $खातिर उन्हें दुष्यंत की परंपरा से जोड़ दिया। बहुत स्पष्ट है कि आलोचकों की न•ारों तक पहुंचने के लिए एकाध संग्रह छपना •ारूरी है।
manish chauhan
5/19/2009
 nomanqaisar
aalok ji aadaab app ki aamen ek baar nahi baar padhne kee cheez hie aur ye aisee kitab nahi ki jise ek nashist mie padha jaaie balki yeh kaie nashiston mien padhi jane wali kitab hie -kamal yeh hie ki har baar ek naya lutf ek naie lazzat aur ek pur kaf ehsaas hota hie-khastor par maa aur baapu ke hawaale jo nazm hie us maa kee aanchal kee thandak aur baapu jee kee shafqt ke kamee khalne lagtee hie-agar yeh kahaa jaie ki parents kee mohabbaton kaa tamaam kaifiat isme shaamil hie to moballghaa nahin hoga is ke elaawa aur ghazlien bhee achchee balki bahut achchee hin yeh to pahlaa ta-assur hie jo majmua ko sar saree padhte huie hua
nomanqaisar
5/19/2009
 rishabha deo sharma
नामवर सिंह ने दिया है तो प्रमाणपत्र फतवे की तरह अनुल्लन्घ्य माना जाएगा| बधाई! वैसे तेवरी काव्यान्दोलन के माध्यम से भी दुष्यंत की रचना परंपरा को कई सारे कवियों ने हिंदी में आगे ले जाने का काम किया है.
rishabha deo sharma
5/13/2009
 योगेंद्र कृष्णा
आलोक जी को बहुत-बहुत बधाई… मैं तो यह भी कहना चाहूंगा कि "आमीन का आलोक" ग़जल की दुनिया में दुष्यंत के बाद की लंबी खाई को उजागर करता हुआ उसके ऊपर से गुजरने का जोखिम उठाता है…
योगेंद्र कृष्णा
5/13/2009
 shayar
नामवरजी किसको क्या बना दें और पाठकों को भी ‘बना’ दे, कौन नहीं जानता। आलोक की ग़ज़लें अच्छी हैं मगर ऐसा कतई नहीं है जो नामवरजी कह रहे हैं। न कथ्य में न अंदाज़ में । दुष्यंत से ज़्यादा बोल्ड और प्रगतिशील एक ही कवि हुआ है जिसकी भाषा भी आम आदमी की ही भाषा थी। और वे थे कबीर दास। कथ्य की दृष्टि से तो दुष्यंत और आलोक का कोई मेल नहीं है। और दुष्यंत में से कथ्य निकाल दिया जाए तो बचता क्या है ! ं
shayar
5/13/2009
 rachana srivastava
alok ji padh ke bahut achchha laga.aap ko badhai ho saader rachana
rachana srivastava
5/13/2009
 vijay manohar tiwari
Namwarji ne sahi farmaya. aalok ke alfazon me hamare gaon ki mitti ki soundhi sugandh samai hue hai. us bheene se aur bhule bisre se ahsas ko alfaz dena aasaan nahi hai...YE AALOK QAYAM RAHE...
vijay manohar tiwari
5/13/2009
 rohit kr suri
I have listened to aalok's poetry many times and have found his recital's very simple to understand but have had deep lasting impact on our thoughts, his simple words are the soul of his poetry .
rohit kr suri
5/13/2009
 दुष्यंत
न तो आलोक हूँ न बड़ा भाई..पर आपका छोटा भाई हूँ और दुर्भाग्य से दुष्यंत ज़रूर हूँ जिस नाम से आलेख की शुरुआत और अंत हुआ है ..और जहाँ जाता हूँ ..दुष्यंत कुमार मुझसे पहले तैयार मिलते हैं .... नामवर जी के इस कथन 'दुष्यंत के बाद हिंदी ग़ज़ल में एक जो ठहराव आ गया था उसे 'आमीन के आलोक' ने बहुत हद तक दूर कर दिया है।' को सोच समझ रहा हूँ..महसूस कर रहा हूँ.. ये बहुत बड़ी बात है जो नामवर जी के मुंह से निकल कर आप्त वचन हो गयी है.. ये नामवर जी के मुंह से मर्तबा शायद ही किसी और हिन्दी शायर को नसीब हुआ हो..बेहद मुबारक !
दुष्यंत
5/13/2009
 पंकज सुबीर
आलोक जी के बारे में जो कुछ भी नामवर जी ने लिखा है वो एकदम सटीक है । आलोक जी ने हिंदी में ग़ज़लों के मान का बढ़ाया है । वरना तो अरबी और फारसी के टोले शब्‍द लिख कर कुछ कहना ही शायरी होती थी । ऐसी भाषा जिसे न लिखने वाला समझे और न सुनने वाला । कुल लिाकर बात ये कि ये बात बिल्‍कुल ही सही है कि दुश्‍यंत जिस जगह पर सिरा छोड़ते हैं वहीं पर थामते दिखाई देते है आलोक जी । दुष्‍यंत ने हिंदी ग़ज़लों को इस योग्‍य बनाया कि उन ग़ज़लो के शेर भाषणों में कोट किये ज सके । वैसे ही आलोक जी ने भी अपने हिंदी के शेरों को वो ऊंचाई दी है कि वे शेर लेखों में भाषणों में उपयोग हो सकते हैं ।
पंकज सुबीर
5/12/2009
 शरत कुमार
आलोक की रचनाएं पढ़ कर लगा कि आलोक बेहद सहज होकर हमारी-अपनी बात कह रहे हैं. टेलीविजन में काम करते हुए अपने अंदर के इंसान को सरोकारों से इतना जोड़े रखना वाकई काबिलेतारिफ है बशर्ते आदमी दोहरे चरित्र का शिकार न हो. आलोक आप खूब लिखिए और ऐसे हीं लिखिए ताकि गंभीर गजल आम आदमी तक पहुंचे. शरत कुमार.
शरत कुमार
11/25/2009
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