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मुद्दे पर आपकी राय  
 
सरकार क्या करे....?
बलूचिस्तान के मसले पर सरकार ने अपनी अच्छी भद पिटवा ली है और अब वह किसी तरह से अपना पल्ला झाड़ने में लगी हुई है। ज़ाहिर है कि उसके पास बलूचिस्तान को लेकर कोई स्पष्ट नीति नहीं है और जिस ओर से ज़्यादा दबाव पड़ता है वह उसी तरफ झुक जाती है। मगर वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने अपने स्तंभ समय-सरगम में जो सुझा...
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मीडिया के पतन के लिए कौन है ज़िम्मेदार?
पिछले 5-7 सालों से लगातार ये आरोप लगाए जा रहे हैं कि मीडिया अपने उद्देश्यों से भटक गया है, वह भ्रष्ट हो गया है, उसे देश और समाज की कोई फिक्र नहीं रह गई है, वह बाज़ार के हाथों में बिक गया है और उसका एकमात्र मक़सद मुनाफ़ा कमाना हो गया है। ज़ाहिर है इस तरह के आरोपों में सचाई है, अन्यथा बिना आग के तो धु...
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चुप्पी तोड़िए...।
अगर कोई विचार पश्चिम से आता है तो हम उसे सही मानकर तुरंत स्वीकार लेते हैं। जैसा कि “वाल स्ट्रीट जनरल” में पैसे लेकर ख़बरें छापने वाली रिपोर्ट से ज़ाहिर है। भारतीय पत्रकार ये बात अरसे से लिख और बता रहे हैं मगर उसका कोई नोटिस नहीं लिया गया और अब हाहाकार मचा हुआ है। चलिए किसी भी वजह से सही,मीडिया में व...
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धोखा हैं चुनाव?
पिछले लगभग साठ साल से चुनाव हो रहे हैं,मगर चुनाव में होता क्या है...नक़ली मुद्दे, झूठे वादे,भ्रष्ट प्रत्याशी,जातीय और सांप्रदायिक आधार पर राजनीति,धन और बाहुबल के इस्तेमाल से वोट हासिल करने की तिकड़में..यही सब। इस बार भी वही हो रहा है और एक बार फिर कोई पार्टी या गठबंधन सरकार बनाएगा,देश पर रा करेगा और...
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जूते की जय हो...!
जूता चाहे बुश पर चला हो या फिर चिदंबरम पर, उसने असर ज़रूर दिखाया है। सदी के सबसे बड़े हत्यारे बुश की दुनिया भर में बेइज़्जती हुई तो चिदंबरम पर चले जूते ने दागी नेताओं के टिकट काटने के लिए काँग्रेस को मजबूर कर दिया। यानी जूता विरोध जताने और अपनी बात मनवाने के एक नए हथियार के रूप में सामने आया है। लेक...
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क्या आईपीएल को हिंदुस्तान से बाहर करवाना ज़रूरी था?
ये पहले ही लग रहा था कि धंधेबाज़ों की चली तो आईपीएल होकर रहेगा और वह हो भी रहा है,मगर मुल्क से बाहर क्योंकि सुरक्षा कारणों से बोर्ड को सरकार की मंज़ूरी नहीं मिली। क्या आपको नहीं लगता कि देश के लिए आम चुनाव ज़्यादा ज़रूरी हैं और तमाशा क्रिकेट को ठीक उसी समय करवाने की ज़िद करना ग़लत था। क्या ऐसा जोखिम...
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